संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- राजा इन्द्रद्युम्नके द्वारा अश्वमेध-यज्ञ तथा पुरुषोत्तम-प्रासाद-निर्माणका कार्य * १०७
अनुसार तुम सब लोग हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेना तथा अमात्यों एवं पुरोहितोंके साथ चलो।' ऐसी आज्ञा पाकर दूत राजाओंके पास गये और सबको महाराजकी आज्ञा सुना दी। दक्षिण, पश्चिम, उत्तर और पूर्व देशोंके रहनेवाले, दूर और समीप निवास करनेवाले, पर्वत तथा भिन्न-भिन्न द्वीपोंके निवासी नरेश महाराज इन्द्रद्युम्नका आदेश सुनकर रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सेनाके साथ बहुत धन लेकर भारी संख्यामें एकत्रित हुए। राजाओंको अमात्यों और पुरोहितोंसहित आया देख महाराजको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोले— 'नृपवरो! मैं आपलोगोंसे कुछ निवेदन करना चाहता हूँ, सुनें। यह भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला कल्याणमय क्षेत्र है। मैं यहाँ अश्वमेध-यज्ञ करना और भगवान् विष्णुका मन्दिर बनवाना चाहता हूँ; किंतु मैं इसे कैसे पूर्ण कर सकता हूँ, इस चिन्तासे मेरा चित्त व्याकुल हो रहा है। यदि आपलोग भलीभाँति मेरी सहायता करें तो मेरा
सब कार्य सम्पन्न हो सकता है।'
महाराज इन्द्रद्युम्नके यों कहनेपर सब राजाओंको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने महाराजकी आज्ञासे धन, रत्न, सुवर्ण, मणि, मोती, कम्बल, मृगचर्म, सुन्दर बिछौने, हीरे, पुखराज, माणिक, लाल, नीलम, हाथी, घोड़े, रथ, हथिनी, भाँति-भाँतिके द्रव्य, भक्ष्य, भोज्य तथा अनुलेप आदि पदार्थोंकी वर्षा की। राजा इन्द्रद्युम्नने देखा, यज्ञकी सब सामग्री एकत्रित हो गयी है और यज्ञकर्मके ज्ञाता, वेद-वेदाङ्गोंमें पारंगत, शास्त्रज्ञानमें निपुण तथा सब कर्मोंमें कुशल ऋषि, महर्षि, देवर्षि, तपस्वी, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी, स्नातक तथा अग्निहोत्रपरायण ब्राह्मण भी उपस्थित हैं; तब उन्होंने अपने पुरोहितसे कहा—'ब्रह्मन्! कुछ विद्वान् ब्राह्मण, जो वेदोंके पारंगत पण्डित हों, जाकर अश्वमेध-यज्ञकी सिद्धिके लिये उत्तम स्थान देखें।' राजाके यों कहनेपर विद्वान् पुरोहितने यज्ञकर्ममें कुशल ब्राह्मणोंको आगे करके शिल्पियोंके साथ प्रस्थान किया और उस देशमें, जहाँ धीवरोंका गाँव था, विधिपूर्वक यज्ञशाला बनवायी। उसमें गली-कूचे और छतरियाँ भी बनवायी गयीं थीं। सैकड़ों महल बनाये गये थे। सारा यज्ञमण्डप सुवर्ण, रत्न तथा श्रेष्ठ मणियोंसे विभूषित हो इन्द्रभवनके समान रमणीय दिखायी देता था। खंभोंपर सुवर्णसे चित्रकारी की गयी थी। दरवाजे बहुत बड़े-बड़े बने हुए थे। यज्ञके प्रत्येक भवनमें शुद्ध सुवर्णका उपयोग किया गया था। धर्मात्मा पुरोहितने भिन्न-भिन्न देशोंके निवासी राजाओंके लिये अन्तःपुर भी बनवाये थे। नाना देशोंसे आये हुए ब्राह्मणों और वैश्योंके लिये भी उन्होंने अनेक शालाएँ बनवायी थीं। महाराज इन्द्रद्युम्नका प्रिय करनेके लिये समस्त राजा अनेक प्रकारके रत्न लेकर वहाँ आये थे। साथ ही उनकी स्त्रियाँ भी