संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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बड़े मनोहर दिखायी देते हैं। वहाँके लोग बड़े हृष्ट-पुष्ट होते हैं और वहाँ रहनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र शान्तभावसे पृथक्-पृथक् अपने धर्मोंमें तत्पर दिखायी देते हैं। ब्राह्मणोंके मुखसे छहों अङ्ग, पद और क्रमसे युक्त वैदिक वाणी निकलती रहती है। कोई अग्निहोत्रमें लगे रहते हैं और कोई उपासनामें। वे समस्त शास्त्रोंके अर्थ समझनेमें कुशल, यज्ञकर्ता एवं प्रचुर दक्षिणा देनेवाले होते हैं। वहाँ चबूतरों, सड़कों, वनों, उपवनों, सभामण्डपों, महलों और देवमन्दिरोंमें महान् जनसमुदाय एकत्रित होकर इतिहास, पुराण, वेद, वेदाङ्ग, काव्य एवं शास्त्रोंकी कथा सुनते रहते हैं। उस देशकी स्त्रियोंको अपने रूप और यौवनपर गर्व होता है। वे सभी उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न होती हैं। उस क्षेत्रमें संन्यासी, वानप्रस्थ, सिद्ध, स्नातक, ब्रह्मचारी, मन्त्रसिद्ध, तपस्यासिद्ध और यज्ञसिद्ध पुरुष निवास करते हैं। इस प्रकार राजाने उस क्षेत्रको परम शोभायमान देखा, इसलिये मनमें यह निश्चय किया कि यहीं रहकर परम देव, परम अपार, परमपद, अनन्त, अपराजित, सर्वेश्वरेश्वर, जगद्गुरु, सनातन भगवान् श्रीविष्णुकी आराधना करूँगा। यहीं भगवान्का मानस तीर्थ पुरुषोत्तमक्षेत्र है, यह बात मुझे मालूम हो गयी; क्योंकि यहाँ कल्पवृक्षस्वरूप विशाल वटवृक्ष खड़ा है। यहीं इन्द्रनीलमणिकी बनी हुई मणिमयी प्रतिमा है, जिसे भगवान्ने स्वयं छिपा दिया है। क्योंकि यहाँ दूसरी कोई प्रतिमा नहीं दिखायी देती। मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे सत्यपराक्रमी जगदीश्वर भगवान् विष्णु मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दें। मैं अनन्य भावसे भगवान्में मन लगाकर यहाँ यज्ञ, दान, तपस्या, होम, ध्यान, पूजन तथा उपवास आदिके द्वारा विधिपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करूँगा। साथ ही यहाँ श्रीविष्णु भगवान्के मन्दिर बनानेका कार्य भी प्रारम्भ करूँगा।
द्विजवरो! यह सोचकर महाराज इन्द्रद्युम्नने वहाँ भगवान्का मन्दिर बनवानेके लिये कार्य आरम्भ किया। उन्होंने ज्योतिषशास्त्रके पारंगत समस्त आचार्योंको बुलाकर बड़ी प्रसन्नताके साथ यत्नपूर्वक भूमिका शोधन कराया। इस कार्यमें ज्ञानसम्पन्न ब्राह्मणों, वेद-शास्त्रके पारंगत अमात्यों, मन्त्रियों तथा वास्तुविद्याके विद्वानोंका भी सहयोग प्राप्त था। उन सबके साथ भलीभाँति विचार करके शुभ दिन और शुभ मुहूर्तमें, जब कि उत्तम चन्द्रमा और नक्षत्रोंका योग था तथा ग्रहोंकी भी अनुकूलता थी, राजाने श्रद्धापूर्वक अर्घ्य दिया। उस समय जय-जयकार तथा मङ्गलमय शब्द हो रहे थे, भाँति-भाँतिके वाद्योंकी मनोहर ध्वनि गूँज रही थी। वेद-मन्त्रोंके गम्भीर घोष और मधुर संगीत हो रहे थे। फूल, लाजा, अक्षत, चन्दन, भरे हुए कलश तथा दीपक आदिके द्वारा पूजा-कार्य सम्पन्न किया गया था। इस प्रकार अर्घ्य-दान दे महाराज इन्द्रद्युम्नने शूरवीर कलिङ्गराज, उत्कलराज और कोसलराजको बुलाकर कहा—'राजाओ! तुम सब लोग एक ही साथ मन्दिरके निमित्त शिला ले आनेके लिये जाओ। अपने साथ प्रधान-प्रधान शिल्पियोंको भी, जो शिला खोदनेके काममें निपुण हों, ले लो। विन्ध्याचल बहुत विस्तृत पर्वत है। वह अनेकों कन्दराओंसे सुशोभित है। उसके सभी शिखरोंको भलीभाँति देखकर सुन्दर-सुन्दर शिलाएँ कटवाओ और उन्हें छकड़ों तथा नावोंपर लादकर ले आओ, विलम्ब न करो।'
इस प्रकार राजाओंको शिलाके लिये जानेकी आज्ञा दे महाराजने अमात्यों और पुरोहितोंसे कहा—'सर्वत्र शीघ्रगामी दूत भेजे जायँ और वे पृथ्वीके समस्त राजाओंके पास जाकर मेरी यह आज्ञा सुना दें—'राजाओ! महाराज इन्द्रद्युम्नकी आज्ञाके