संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 111, कुल 434 में से
संदर्भ में पढ़ें* राजा इन्द्रद्युम्नके द्वारा भगवान् श्रीविष्णुकी स्तुति * १०९
प्रसन्नता हुई। वहाँ कोई भी मनुष्य मलिन, दीन अथवा भूखा नहीं रहा। उस यज्ञमें किसी प्रकारका उपद्रव, ग्लानि, आधि, व्याधि, अकाल-मृत्यु, दंशन, ग्रहपीड़ा अथवा विषका कष्ट नहीं हुआ। इस प्रकार राजाने अश्वमेध-यज्ञ तथा पुरुषोत्तमप्रासाद-निर्माणका कार्य विधिपूर्वक पूर्ण किया।
राजा इन्द्रद्युम्नके द्वारा भगवान् श्रीविष्णुकी स्तुति
**ब्रह्माजी कहते हैं—**अश्वमेध-यज्ञके अनुष्ठान और प्रासाद-निर्माणका कार्य पूर्ण हो जानेपर राजा इन्द्रद्युम्नके मनमें दिन-रात प्रतिमाके लिये चिन्ता रहने लगी। वे सोचने लगे—कौन-सा उपाय करूँ, जिससे सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले लोकपावन भगवान् पुरुषोत्तमका मुझे दर्शन हो। इसी चिन्तामें निमग्न रहनेके कारण उन्हें न रातमें नींद आती न दिनमें। वे न तो भाँति-भाँतिके भोग भोगते और न स्नान एवं शृङ्गार ही करते थे। वाद्य, सुगन्ध, संगीत, अङ्गराग, इन्द्रनील, महानील, पद्मराग, सोना, चाँदी, हीरा, स्फटिक आदि मणियाँ, राग, अर्थ, काम, वन्य पदार्थ अथवा दिव्य वस्तुओंसे भी उनके मनको संतोष नहीं होता था। पत्थर, मिट्टी और लकड़ीमेंसे इस पृथ्वीपर सर्वोत्तम वस्तु कौन है ? जिससे भगवान् विष्णुकी प्रतिमाका निर्माण ठीक हो सकता है ? इस प्रकारकी चिन्तामें पड़े-पड़े उन्होंने पाञ्चरात्रकी विधिसे भगवान् पुरुषोत्तमका पूजन किया और अन्तमें इस प्रकार स्तवन आरम्भ किया—
‘वासुदेव ! आपको नमस्कार है। आप मोक्षके कारण हैं। आपको मेरा नमस्कार है। सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी परमेश्वर ! आप इस जन्म-मृत्युरूपी संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये। पुरुषोत्तम ! आपका स्वरूप निर्मल आकाशके समान है। आपको नमस्कार है। सबको अपनी ओर खींचनेवाले संकर्षण ! आपको प्रणाम है। धरणीधर ! आप मेरी रक्षा कीजिये। हेमगर्भ (शालग्रामशिला) की-सी आभावाले प्रभो! आपको नमस्कार है। मकरध्वज ! आपको प्रणाम है। रतिकान्त ! आपको नमस्कार है। शम्बरासुरका संहार करनेवाले प्रद्युम्न ! आप मेरी रक्षा कीजिये। भगवन् ! आपका श्रीअङ्ग अञ्जनके समान श्याम है। भक्तवत्सल ! आपको नमस्कार है। अनिरुद्ध ! आपको प्रणाम है। आप मेरी रक्षा करें और वरदायक बनें। सम्पूर्ण देवताओंके निवासस्थान ! आपको नमस्कार है। देवप्रिय ! आपको प्रणाम है। नारायण ! आपको नमस्कार है। आप मुझ शरणागतकी रक्षा कीजिये। बलवानोंमें श्रेष्ठ बलराम ! आपको प्रणाम है। लाङ्गलायुध ! आपको नमस्कार है। चतुर्मुख ! जगद्धाम ! प्रपितामह ! मेरी रक्षा कीजिये। नील मेघके समान आभावाले घनश्याम ! आपको नमस्कार है। देवपूजित परमेश्वर ! आपको प्रणाम है। सर्वव्यापी जगन्नाथ ! मैं भवसागरमें डूबा हुआ हूँ, मेरा उद्धार कीजिये।*
* वासुदेव नमस्तेऽस्तु नमस्ते मोक्षकारण। त्राहि मां सर्वलोकेश जन्मसंसारसागरात् ॥
निर्मलाम्बरसंकाश नमस्ते पुरुषोत्तम। संकर्षण नमस्तेऽस्तु त्राहि मां धरणीधर ॥
नमस्ते हेमगर्भाय नमस्ते मकरध्वज। रतिकान्त नमस्तेऽस्तु त्राहि मां शम्बरान्तक ॥
नमस्तेऽञ्जनसंकाश नमस्ते भक्तवत्सल। अनिरुद्ध नमस्तेऽस्तु त्राहि मां वरदो भव ॥
नमस्ते विबुधावास नमस्ते विबुधप्रिय। नारायण नमस्तेऽस्तु त्राहि मां शरणागतम् ॥
नमस्ते बलिनां श्रेष्ठ नमस्ते लाङ्गलायुध। चतुर्मुख जगद्धाम त्राहि मां प्रपितामह ॥
नमस्ते नीलमेघाभ नमस्ते त्रिदशार्चित। त्राहि विष्णो जगन्नाथ मग्नं मां भवसागरे ॥
(४९। १–७)