संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
प्रलयाग्निके समान तेजस्वी तथा दहकते हुए नेत्रोंवाले महापराक्रमी दैत्यशत्रु नृसिंह! आपको नमस्कार है। आप मेरी रक्षा कीजिये। पूर्वकालमें महावाराहरूप धारणकर आपने जिस प्रकार इस पृथ्वीका रसातलसे उद्धार किया था, उसी प्रकार मेरा भी दुःखके समुद्रसे उद्धार कीजिये। कृष्ण! आपके इन वरदायक स्वरूपोंका मैंने स्तवन किया है। ये बलदेव आदि, जो पृथकरूपसे स्थित दिखायी देते हैं, आपके ही अङ्ग हैं। देवेश! प्रभो! अच्युत! गरुड़ आदि पार्षद, आयुधोंसहित दिक्पाल तथा केशव आदि जो आपके अन्य भेद मनीषियोंद्वारा बतलाये गये हैं, उन सबका मैंने पूजन किया है। प्रसन्न तथा विशाल नेत्रोंवाले जगन्नाथ! देवेश्वर! पूर्वोक्त सब स्वरूपोंके साथ मैंने आपका स्तवन और वन्दन किया है। आप मुझे धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष देनेवाला वर प्रदान करें। हरे! संकर्षण आदि जो आपके भेद बताये गये हैं, वे सब आपकी पूजाके लिये ही प्रकट हुए हैं; अतः वे आपके ही आश्रित हैं। देवेश! वस्तुतः आपमें कोई भेद नहीं है। आपके जो अनेक प्रकारके रूप बताये जाते हैं, वे सब उपचारसे ही कहे गये हैं; आप तो अद्वैत हैं। फिर कोई भी मनुष्य आपको द्वैतरूप कैसे कह सकता है। हरे! आप एकमात्र व्यापक, चित्स्वभाव तथा निरञ्जन हैं। आपका जो परम स्वरूप है, वह भाव और अभावसे रहित, निर्लेप, निर्गुण, श्रेष्ठ, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, समस्त उपाधियोंसे निर्मुक्त और सत्तामात्र रूपसे स्थित है। प्रभो! उसे देवता भी नहीं जानते, फिर मैं ही कैसे उसे जान सकता हूँ। इसके सिवा आपका जो अपर स्वरूप है, वह पीताम्बरधारी और चार भुजाओंवाला है। उसके हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा सुशोभित हैं। वह मुकुट और अङ्गद धारण करता है। उसका वक्षः-स्थल श्रीवत्सचिह्नसे युक्त है तथा वह वनमालासे विभूषित रहता है। उसीकी देवता तथा आपके अन्यान्य शरणागत भक्त पूजा करते हैं। देवदेव! आप सब देवताओंमें श्रेष्ठ एवं भक्तोंको अभय देनेवाले हैं। कमलनयन! मैं विषयोंके समुद्रमें डूबा हूँ। आप मेरी रक्षा कीजिये। लोकेश! मैं आपके सिवा और किसीको नहीं देखता, जिसकी शरणमें जाऊँ। कमलाकान्त! मधुसूदन! मुझपर प्रसन्न होइये।*
* प्रलयानलसंकाश नमस्ते दितिजान्तक। नरसिंह महावीर्य त्राहि मां दीप्तलोचन॥
यथा रसातलादुर्वी त्वया दंष्ट्रोद्धृता पुरा। तथा महावराहस्त्वं त्राहि मां दुःखसागरात्॥
तवैता मूर्तयः कृष्ण वरदाः संस्तुता मया। तवेमे बलदेवाद्याः पृथग्रूपेण संस्थिताः॥
अङ्गानि तव देवेश गरुत्माद्यास्तथा प्रभो। दिक्पालाः सायुधाश्चैव केशवाद्यास्तथाच्युत॥
ये चान्ये तव देवेश भेदाः प्रोक्ता मनीषिभिः। तेऽपि सर्वे जगन्नाथ प्रसन्नायतलोचन॥
मयार्चिताः स्तुताः सर्वे तथा यूयं नमस्कृताः। प्रयच्छत वरं मह्यं धर्मकामार्थमोक्षदम्॥
भेदास्ते कीर्तिता ये तु हरे संकर्षणादयः। तव पूजार्थसम्भूतास्ततस्त्वयि समाश्रिताः॥
न भेदस्तव देवेश विद्यते परमार्थतः। विविधं तव यद्रूपमुक्तं तदुपचारतः॥
अद्वैतं त्वां कथं द्वैतं वक्तुं शक्नोति मानवः। एकस्त्वं हि हरे व्यापी चित्स्वभावो निरञ्जनः॥
परमं तव यद्रूपं भावाभावविवर्जितम्। निर्लेपं निर्गुणं श्रेष्ठं कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं सत्तामात्रव्यवस्थितम्। तद्देवाश्च न जानन्ति कथं जानाम्यहं प्रभो॥
अपरं तव यद्रूपं पीतवस्त्रं चतुर्भुजम्। शङ्खचक्रगदापाणिमुकुटाङ्गदधारिणम्॥
श्रीवत्सोरस्कसंयुक्तं वनमालाविभूषितम्। तदर्चयन्ति विबुधा ये चान्ये तव संश्रयाः॥
देवदेव सुरश्रेष्ठ भक्तानामभयप्रद। त्राहि मां पद्मपत्राक्ष मग्नं विषयसागरे॥
नान्यं पश्यामि लोकेश यस्याहं शरणं व्रजे। त्वामृते कमलाकान्त प्रसीद मधुसूदन॥
(४९।८-२२)