संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- राजा इन्द्रद्युम्नके द्वारा भगवान् श्रीविष्णुकी स्तुति * १११
मैं बुढ़ापे और सैकड़ों व्याधियोंसे युक्त हो भाँति-भाँतिके दुःखोंसे पीड़ित हूँ तथा अपने कर्मपाशमें बँधकर हर्ष-शोकमें मग्न हो विवेकशून्य हो गया हूँ। अत्यन्त भयंकर घोर संसार-समुद्रमें गिरा हुआ हूँ। यह विषयरूपी जलराशिके कारण दुस्तर है। इसमें राग-द्वेषरूपी मत्स्य भरे पड़े हैं। इन्द्रियरूपी भँवरोंसे यह बहुत गहरा प्रतीत होता है। इसमें तृष्णा और शोकरूपी लहरें व्याप्त हैं। यहाँ न कोई आश्रय है, न कोई अवलम्ब। यह सारहीन एवं अत्यन्त चञ्चल है। प्रभो! मैं मायासे मोहित होकर इसके भीतर चिरकालसे भटक रहा हूँ। हजारों भिन्न-भिन्न योनियोंमें बारंबार जन्म लेता हूँ। जनार्दन! मैंने इस संसारमें नाना प्रकारके हजारों जन्म धारण किये हैं। अङ्गोंसहित वेद, नाना प्रकारके शास्त्र, इतिहास-पुराण तथा अनेक शिल्पोंका अध्ययन किया है। यहाँ मुझे कभी असंतोष मिला है, कभी संतोष। कभी धनका संग्रह किया है, कभी हानि उठायी है और कभी बहुत खर्च किये हैं। जगन्नाथ! इस प्रकार मैंने ह्रास-वृद्धि, उदय और अस्त अनेक बार देखे हैं; स्त्री, शत्रु, मित्र तथा बन्धु-बान्धवोंके संयोग और वियोग भी देखनेको मिले हैं। मैंने अनेक पिता देखे हैं और अनेक माताओंका दर्शन किया है। अनेक प्रकारके जो दुःख और सुख हैं, उनके अनुभवका भी मुझे अवसर मिला है। भाई, बन्धु, पुत्र और कुटुम्बी भी प्राप्त हुए हैं। विष्ठा और मूत्रकी कीचसे भरे हुए स्त्रियोंके गर्भाशयमें भी मैंने निवास किया है। प्रभो! गर्भवासमें जो महान् दुःख होता है, उसका भी मैंने अनुभव किया है। बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्थामें जो अनेक प्रकारके दुःख होते हैं, उनसे भी मैं वञ्चित नहीं रहा। मृत्युके समय, यमलोकके मार्गमें तथा यमराजके घरमें जो दुःख प्राप्त होते हैं, उनको तथा नरकोंमें होनेवाली यातनाओंको भी मैंने भोगा है। कृमि, कीट, वृक्ष, हाथी, घोड़े, मृग, पक्षी, भैंसे, ऊँट, गाय तथा अन्य वनवासी जन्तुओंकी योनिमें मुझे जन्म लेना पड़ा है। समस्त द्विजातियों और शूद्रोंके यहाँ भी मेरा जन्म हुआ है। देव! धनी क्षत्रियों, दरिद्र तपस्वियों, राजाओं, राजाके सेवकों तथा अन्य देहधारियोंके घरोंमें भी मैं अनेक बार उत्पन्न हो चुका हूँ। नाथ! मुझे अनेकों बार ऐसे मनुष्योंका दास होना पड़ा है, जो स्वयं दूसरोंके दास हैं। मैं दरिद्र, धनी और स्वामी भी रह चुका हूँ।*
* जराव्याधिशतैर्युक्तो नानादुःखैर्निपीड़ितः। हर्षशोकान्वितो मूढः कर्मपाशैः सुयन्त्रितः॥
पतितोऽहं महारौद्रे घोरे संसारसागरे। विषयोदकदुष्पारे रागद्वेषझषाकुले॥
इन्द्रियावर्तगम्भीरे तृष्णाशोकोर्मिसंकुले। निराश्रये निरालम्बे निःसारेऽत्यन्तचञ्चले॥
मायया मोहितस्तत्र भ्रमामि सुचिरं प्रभो। नानाजातिसहस्रेषु जायमानः पुनः पुनः॥
मया जन्मान्यनेकानि सहस्राण्ययुतानि च। विविधान्यनुभूतानि संसारेऽस्मिञ्जनार्दन॥
वेदाः साङ्गा मयाधीताः शास्त्राणि विविधानि च। इतिहासपुराणानि तथा शिल्पान्यनेकशः॥
असंतोषाश्च संतोषाः संचयापचया व्ययाः। मया प्राप्ता जगन्नाथ क्षयवृद्ध्युदयेतराः॥
भार्यारिमित्रबन्धूनां वियोगाः संगमास्तथा। पितरो विविधा दृष्टा मातरश्च तथा मया॥
दुःखानि चानुभूतानि यानि सौख्यान्यनेकशः। प्राप्ताश्च बान्धवाः पुत्रा भ्रातरो ज्ञातयस्तथा॥
मयोषितं तथा स्त्रीणां कोष्ठे विण्मूत्रपिच्छले। गर्भवासे महादुःखमनुभूतं तथा प्रभो॥
दुःखानि यान्यनेकानि बाल्ययौवनगोचरे। वार्धके च हृषीकेश तानि प्राप्तानि वै मया॥
मरणे यानि दुःखानि यममार्गे यमालये। मया तान्यनुभूतानि नरके यातनास्तथा॥