भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

करतलगत किये हुए हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है। जो अथर्वशीर्ष, अथर्वस्वरूप, अथर्वपाद और अथर्वकर हैं अर्थात् जिनका सिर आदि सब कुछ अथर्वमय है, उन परमेश्वरको प्रणाम है। ॐ वज्रशीर्ष (वज्रके समान मस्तकवाले) प्रभुको नमस्कार है। जो मधु और कैटभके घातक, महासागरके जलमें शयन करनेवाले और वेदोंका उद्धार करके लानेवाले हैं, उन भगवान्‌को प्रणाम है। जिनके स्वरूप अत्यन्त दीप्तिमान् हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है। इन्द्रियोंके नियन्ता हृषीकेशको प्रणाम है। प्रभो! आप भगवान् वासुदेवको बारंबार नमस्कार है। नारायण! आपको प्रणाम है। लोकहितकारी श्रीहरिको नमस्कार है। ॐ मोहनाशक तथा विश्वसंहारकारी प्रभुको प्रणाम है। जो उत्तम गतिके दाता और बन्धनका अपहरण करनेवाले हैं, त्रिलोकीमें तेजका आविर्भाव करनेवाले और तेजःस्वरूप हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है। जो योगियोंके ईश्वर, शुद्धस्वरूप, सबके भीतर रमण करनेवाले तथा जगत्‌को पार उतारनेवाले हैं, सुख ही जिनका स्वरूप है, जो सुखरूप नेत्रोंवाले तथा सुकृत धारण करनेवाले हैं, उन भगवान्‌को प्रणाम है। वासुदेव, वन्दनीय और वामदेवको नमस्कार है। जो देहधारियोंके देहकी उत्पत्ति करनेवाले तथा भेददृष्टिको भङ्ग करनेवाले हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है। देवगण जिनके श्रीअङ्गकी वन्दना करते हैं, जो दिव्य मुकुट धारण करनेवाले हैं, उन श्रीविष्णुको प्रणाम है। जो निवासके भी निवास हैं तथा निवासस्थानको व्यवहारमें लाते हैं, उन परमात्माको नमस्कार है। ॐ जो वसु (धन)-की उत्पत्ति करनेवाले और वसुको स्थान देनेवाले हैं, उन्हें प्रणाम है। यज्ञस्वरूप, यज्ञेश्वर एवं योगी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। आप संयमी पुरुषोंको योगकी प्राप्ति करानेवाले ईश्वर हैं, आपको प्रणाम है। यज्ञरूप शरीर धारण करनेवाले भगवान् वराहको नमस्कार है। प्रलम्बासूरको मारनेवाले भगवान् संकर्षणको प्रणाम है। जिनकी वाणी मेघके समान गम्भीर है, जो प्रचण्ड वेगयुक्त हल धारण करते हैं, उन बलरामको नमस्कार है। सबको शरण देनेवाले नारायण! आप ही ज्ञानियोंके ज्ञान हैं। आपको नमस्कार है। प्रभो! आपके सिवा नरकसे उद्धार करनेवाला मेरा कोई बन्धु नहीं है। शरणागतवत्सल! मैं सम्पूर्ण भावसे आपके चरणोंमें पड़ा हूँ। केशव! अच्युत! मेरा जो शारीरिक और मानसिक मल है, उसे धोनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है। भगवन्! मैंने समस्त सङ्ग त्यागकर आपकी शरण ली है। केशव! अब आपके ही साथ मेरा सङ्ग हो। इससे मुझे आत्मलाभ होगा। मुझे यह संसार कष्ट एवं आपत्तियोंका घर तथा दुस्तर जान पड़ता है। मैं आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंसे खिन्न हूँ। इसलिये आपकी शरणमें आया हूँ। आपकी मायासे यह समस्त जगत् नाना प्रकारकी कामनाओंद्वारा मोहित हो रहा है। इसमें लोभ आदिका पूरा आकर्षण है। अतः मैंने आपकी शरण ली है। विष्णो! संसारी जीवको तनिक भी सुख नहीं है। यज्ञेश्वर! मनुष्यका मन जैसे-जैसे आपमें लगता जाता है, वैसे-वैसे निष्काम होकर वह परमानन्दको प्राप्त होता रहता है। मैं विवेकशून्य होकर नष्ट हो गया हूँ। सारा जगत् मुझे दुःखी दिखायी देता है। गोविन्द! मेरी रक्षा कीजिये। आप ही संसारसे मेरा उद्धार कर सकते हैं। यह संसार-समुद्र मोहरूपी जलसे परिपूर्ण है। इसके पार जाना असम्भव है। मैं इसमें गलेतक डूबा हुआ हूँ। पुण्डरीकाक्ष! आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो इससे मेरा उद्धार कर सके।

उस विख्यात दिव्य पुरुषोत्तमक्षेत्रमें राजा श्वेतके इस प्रकार स्तुति करनेपर देवाधिदेव

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