भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 434 में से

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पृष्ठ 135
  • मत्स्यमाधवकी महिमा, समुद्रमें मार्जन आदिकी विधि एवं अष्टाक्षर-मन्त्रकी महत्ता * १३३

जगद्गुरु श्रीहरि उनकी भक्तिका विचार करके सम्पूर्ण देवताओंके साथ राजाके सामने आये।

नील मेघके समान श्यामवर्ण, कमल-पत्रके समान बड़ी-बड़ी आँखें, हाथोंमें देदीप्यमान सुदर्शन, बायें हाथमें पाञ्चजन्य शङ्ख तथा अन्य हाथोंमें गदा, शार्ङ्गधनुष और खड्ग—यही उनकी झाँकी थी। भगवान्‌ने कहा—'राजन्! तुम्हारी बुद्धि बड़ी उत्तम है। तुममें पापका लेश भी नहीं है। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम अपनी इच्छाके अनुसार कोई उत्तम वर माँगो।'

देवाधिदेव भगवान्‌का यह अमृतमय वचन सुनकर महाराज श्वेतने मस्तक नवाकर उन्हें प्रणाम किया और उन्हींमें मन लगाये हुए कहा—'भगवन्! यदि मैं आपका भक्त हूँ तो मुझे यह उत्तम वरदान दीजिये। ब्रह्मलोकसे भी ऊपर जो अविनाशी वैकुण्ठधाम है, जिसे निर्मल, रजोगुणरहित, शुद्ध एवं संसारकी आसक्तिसे शून्य बताया गया है, मैं उसीको प्राप्त करना चाहता हूँ। जगत्पते! आपकी कृपासे मेरा यह मनोरथ सफल हो।'

श्रीभगवान् बोले—राजेन्द्र! सम्पूर्ण देवता, मुनि, सिद्ध और योगी भी जिस रमणीय और रोग-शोकरहित पदको नहीं प्राप्त होते, उसे ही तुम प्राप्त करोगे। सम्पूर्ण लोकोंको लाँघकर मेरे लोकमें जाओगे। यहाँ तुमने जो कीर्ति प्राप्त की है, वह तीनों लोकोंमें फैलेगी और मैं सदा ही यहाँ निवास करूँगा। इस तीर्थको देवता और दानव आदि सब लोग श्वेतगङ्गा कहेंगे। जो कुशके अग्रभागसे भी श्वेतगङ्गाका जल अपने ऊपर छिड़केगा, वह स्वर्गलोकमें जायगा। जो यहाँ स्थापित श्वेतमाधव नामकी प्रतिमाका दर्शन और उसे प्रणाम करेगा, वह देह त्यागकर भगवान्‌का स्मरण करते हुए शान्त पदको प्राप्त होगा।


मत्स्यमाधवकी महिमा, समुद्रमें मार्जन आदिकी विधि, अष्टाक्षर-मन्त्रकी महत्ता, स्नान, तर्पण-विधि तथा भगवान्‌की पूजाका वर्णन

ब्रह्माजी कहते हैं—श्वेतमाधवका दर्शन करके उनके समीप ही मत्स्यमाधवका दर्शन करे। जो भगवान् पहले एकार्णवके जलमें मत्स्यरूप धारण करके वेदोंका उद्धार करनेके लिये रसातलमें स्थित थे, वे ही मत्स्यमाधव कहलाते हैं। वे भगवान्‌के आदि अवतार हैं। पहले पृथ्वीका चिन्तन करके उसपर प्रतिष्ठित हुए भगवान्‌को प्रणाम करे। ऐसा करनेसे मनुष्य सब दुःखोंसे मुक्त हो जाता है और उस वैकुण्ठधाममें जाता है, जहाँ साक्षात् भगवान् श्रीहरि विराजमान रहते हैं। मुनिवरो! इस प्रकार मैंने मत्स्यमाधवके माहात्म्यका वर्णन किया।

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