संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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मुनियोंने कहा— भगवन्! समुद्रमें जो मार्जन और स्नान-दान आदि किया जाता है, उसका फल बतलाइये।
ब्रह्माजी बोले— मुनिवरो! मार्जनकी विधि सुनो। मार्कण्डेयहृदका स्नान पूर्वाह्नकालमें उत्तम माना गया है। विशेषतः चतुर्दशीको उसमें किया हुआ स्नान सब पापोंका नाश करनेवाला है। समुद्रका स्नान सब समय उत्तम होता है, विशेषतः पूर्णिमाको उसमें स्नान करनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है। मार्कण्डेयहृद, अक्षयवट, श्रीकृष्ण-बलराम, समुद्र तथा इन्द्रद्युम्न—ये पुरुषोत्तमक्षेत्रके पाँच तीर्थ हैं। जब ज्येष्ठ मासकी पूर्णिमाको ज्येष्ठा नक्षत्र हो तब विशेषरूपसे तीर्थराज समुद्रकी यात्रा करनी चाहिये। उस समय मन, वाणी और शरीरसे शुद्ध हो भगवान्में मन लगाये रहे और कहीं मनको न ले जाय। सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे मुक्त रहे, राग और द्वेषको दूर कर दे। कल्पवृक्ष-वट बहुत रमणीय स्थान है, वहाँ स्नान करके एकाग्र चित्तसे तीन बार भगवान् जनार्दनकी परिक्रमा करे। उनके दर्शनसे सात जन्मोंके पापोंसे छुटकारा मिल जाता है। प्रचुर पुण्य तथा अभीष्ट गतिकी प्राप्ति होती है। प्रत्येक युगके अनुसार वटके नाम और प्रमाण बतलाये जाते हैं। वट, वटेश्वर, कृष्ण तथा पुराणपुरुष—ये सत्य आदि युगोंमें क्रमशः वटके नाम कहे गये हैं। सत्ययुगमें वटका विस्तार एक योजन, त्रेतामें पौन योजन, द्वापरमें आधा योजन और कलियुगमें चौथाई योजनका माना गया है। पहले बताये हुए मन्त्रसे वटको नमस्कार करके वहाँ तीन सौ धनुषकी दूरीपर दक्षिण दिशाकी ओर जाय। वहाँ भगवान् विष्णुका दर्शन होता है। उसे मनोरम स्वर्गद्वार कहते हैं। वहाँ समुद्रके जलसे आकृष्ट सर्वगुणसम्पन्न काष्ठ है, उसे प्रणाम करके पूजन करनेपर मनुष्य सम्पूर्ण रोगों तथा पापग्रह आदिकी पीड़ासे मुक्त हो जाता है।
स्वर्गद्वारसे समुद्रपर जाकर आचमन करे तथा पवित्र भावसे भगवान् नारायणका ध्यान करके उनके अष्टाक्षर-मन्त्रसे अङ्गन्यास और करन्यास करे। मनको भुलावेमें डालनेवाले अन्य बहुत-से मन्त्रोंकी क्या आवश्यकता है, 'ॐ नमो नारायणाय'— यह अष्टाक्षर-मन्त्र ही सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। नरसे प्रकट होनेके कारण जलको नार कहते हैं। वह पूर्वकालमें भगवान् विष्णुका अयन (निवासस्थान) रहा है, इसलिये उन्हें नारायण कहते हैं। समस्त वेदोंका तात्पर्य भगवान् नारायणमें ही है। सम्पूर्ण द्विज नारायणकी ही उपासनामें तत्पर रहते हैं। यज्ञों और क्रियाओंकी समाप्ति भी नारायणमें ही है। पृथ्वी नारायणपरक है। जल नारायणपरक है। अग्नि नारायणपरक है और आकाश भी नारायणपरक है। वायु और मनके आश्रय भी नारायण ही हैं। अहंकार और बुद्धि दोनों नारायणस्वरूप हैं। भूत, वर्तमान तथा आनेवाले सभी जीव, स्थूल और सूक्ष्म—सब कुछ नारायणस्वरूप है। शब्द आदि विषय, श्रवण आदि इन्द्रियाँ, प्रकृति और पुरुष—सभी नारायणस्वरूप हैं। जल, स्थल, पाताल, स्वर्गलोक, आकाश तथा पर्वत—इन सबको व्याप्त करके भगवान् नारायण स्थित हैं। अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता, ब्रह्मा आदिसे लेकर तृणपर्यन्त समस्त चराचर जगत् नारायणस्वरूप है। ब्राह्मणो! मैं नारायणसे बढ़कर यहाँ कुछ नहीं देखता। यह दृश्य-अदृश्य, चर-अचर—सब उन्हींके द्वारा व्याप्त है। जल भगवान् विष्णुका घर है और विष्णु ही जलके स्वामी हैं। अतः जलमें सर्वदा पापहारी नारायणका स्मरण करना चाहिये। विशेषतः स्नानके समय जलमें उपस्थित हो पवित्रभावसे नारायणका