संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* मत्स्यमाधवकी महिमा, समुद्रमें मार्जन आदिकी विधि एवं अष्टाक्षर-मन्त्रकी महत्ता * १३५
ध्यान करे और हाथ तथा शरीरमें नामाक्षरोंका न्यास करे। ओंकार और नकारका दोनों हाथोंके अँगूठेमें तथा शेष अक्षरोंका तर्जनी आदिके क्रमसे करतल और करपृष्ठोंतक न्यास करे। 'ॐ' कारका बायें और 'न' कारका दायें चरणमें न्यास करे। कटिके बायें भागमें 'मो' का और दायें भागमें 'ना' का न्यास करे। 'रा' का नाभिदेशमें, 'य' का बायीं भुजामें, 'णा' का दाहिनी भुजामें और 'य' का मस्तकपर न्यास करे। नीचे-ऊपर, हृदयमें, पार्श्वभागमें, पीठकी ओर तथा अग्रभागमें श्रीनारायणका ध्यान करके विद्वान् पुरुष कवचका पाठ आरम्भ करे। 'पूर्वमें गोविन्द, दक्षिणमें मधुसूदन, पश्चिमकी ओर श्रीधर, उत्तरमें केशव, अग्निकोणमें विष्णु, नैर्ऋत्यमें अविनाशी माधव, वायव्यमें हृषीकेश, ईशानमें वामन, नीचे वाराह और ऊपर भगवान् त्रिविक्रम मेरी रक्षा करें।'
इस प्रकार कवचका पाठ करके निम्नाङ्कित मन्त्रोंका उच्चारण करे—
त्वमग्निर्द्वीपदां नाथ रेतोधाः कामदीपनः।
प्रधानः सर्वभूतानां जीवानां प्रभुरव्ययः॥
अमृतस्यारणिस्त्वं हि देवयोनिरपां पते।
वृजिनं हर मे सर्वं तीर्थराज नमोऽस्तु ते॥
'नाथ! आप अग्नि हैं, मनुष्य आदि सब जीवोंके वीर्यका आधान और कामका दीपन करनेवाले हैं। सम्पूर्ण भूतोंमें प्रधान हैं तथा जीवोंके अविनाशी प्रभु हैं। समुद्र! आप अमृतकी उत्पत्तिके स्थान तथा देवताओंकी योनि हैं। तीर्थराज! आप मेरे सब पाप हर लें। आपको नमस्कार है।'
इस प्रकार विधिवत् उच्चारण करके स्नान करना चाहिये, अन्यथा वह स्नान उत्तम नहीं माना जाता। वैदिक मन्त्रोंसे अभिषेक और मार्जन करके जलमें डुबकी लगा तीन बार अघमर्षण-मन्त्रका जप करे। जैसे अश्वमेध यज्ञ सब पापोंको दूर करनेवाला है, वैसे ही अघमर्षण-सूक्त सब पापोंका नाशक है। स्नानके पश्चात् जलसे निकलकर दो निर्मल वस्त्र धारण करे। फिर प्राणायाम, आचमन एवं संध्योपासन करके ऊपरकी ओर फूल और जल डालकर सूर्योपस्थान करे। उस समय अपनी दोनों भुजाएँ ऊपरकी ओर उठाये रखे। तदनन्तर गायत्री-मन्त्रका एक सौ आठ बार जप करे। गायत्रीके अतिरिक्त सूर्यदेवतासम्बन्धी अन्य मन्त्रोंका भी एकाग्रचित्तसे खड़ा होकर जप करे। फिर सूर्यकी प्रदक्षिणा और उन्हें नमस्कार करके पूर्वाभिमुख बैठकर स्वाध्याय करे। उसके बाद देवता और ऋषियोंका तर्पण करके दिव्य मनुष्यों और पितरोंका भी तर्पण करे। मन्त्रवेत्ता पुरुषको चाहिये कि चित्तको एकाग्र करके तिलमिश्रित जलके द्वारा नामगोत्रोच्चारणपूर्वक पितरोंकी तृप्ति करे। पहले देवताओंका तर्पण करनेके पश्चात् ही द्विज पितरोंके तर्पणका अधिकारी होता है। श्राद्ध और हवनके समय एक हाथसे सब वस्तुएँ अर्पित करे, परन्तु तर्पणमें दोनों हाथोंका उपयोग करना चाहिये। यही सदाकी विधि है। बायें और दायें हाथकी सम्मिलित अञ्जलिसे नाम-गोत्रके साथ 'तृप्यताम्' बोलकर मौनभावसे जल दे।* अपने अङ्गोंमें स्थित तिलके द्वारा देवताओं और पितरोंका तर्पण न करे। वैसे तिलोंके साथ दिया हुआ जल रुधिरके तुल्य होता है। उसे देनेवाला पापका भागी होता है। मुनिवरो! यदि दाता जलमें स्थित होकर पृथ्वीपर जल दे तो वह व्यर्थ होता है, किसीके
* श्राद्धे हवनकाले च पाणिनैकेन निर्वपेत्। तर्पणे तूभयं कुर्यादेष एव विधिः सदा॥
अन्वारब्धेन सव्येन पाणिना दक्षिणेन तु। तृप्यतामिति सिञ्चेत्तु नामगोत्रेण वाग्यतः॥
(६०।५५-५६)