भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 434 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 138
१३६* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

पास नहीं पहुँचता। जो मनुष्य स्थलमें खड़ा होकर जलमें जल देता है, उसका दिया हुआ जल भी पितरोंको नहीं मिलता, व्यर्थ जाता है। अतः जलमें कदापि पितरोंको जल न दे, बल्कि वहाँसे निकलकर पवित्र देशमें जलद्वारा तर्पण करना चाहिये। न जलमें, न पात्रमें, न कुपित होकर और न एक हाथसे ही जल दे। जो पृथ्वीपर नहीं दिया जाता, वह जल पितरोंतक नहीं पहुँचता। मैंने पितरोंके लिये अक्षय स्थानके रूपमें पृथ्वी ही दी है, अतः उनकी प्रीति चाहनेवाले पुरुषोंको पृथ्वीपर ही जल देना चाहिये। पितर भूमिपर ही उत्पन्न हुए, भूमिपर ही रहे और भूमिमें ही उनके शरीरका लय हुआ। अतः भूमिपर ही उनके लिये जल देना चाहिये। अग्रभागसहित कुशोंको बिछाकर उसपर मन्त्रोंद्वारा देवताओं और पितरोंका आवाहन करना चाहिये। पूर्वाग्र कुशोंपर देवताओंका और दक्षिणाग्र कुशोंपर पितरोंका आवाहन करना उचित है।

देवताओं और अन्यान्य पितरोंका तर्पण करनेके पश्चात् मौनभावसे आचमन करके समुद्रके तटपर एक हाथका चौकोर मण्डल बनाये। उसमें चार दरवाजे रहें। उसके भीतर कर्णिकासहित अष्टदल कमलकी आकृति बनाये। इस प्रकार मण्डल बनाकर उसमें अष्टाक्षर-मन्त्रकी विधिसे अजन्मा भगवान् नारायणका पूजन करे। अब शरीर-शुद्धिकी उत्तम विधि बतलाता हूँ। चक्ररेखासहित अकारका हृदयमें ध्यान करे। वह तीन शिखाओंसहित प्रज्वलित हो पापोंका दाह करता है और सब पापोंका नाश करनेवाला है, ऐसी भावना करनेके बाद मस्तकमें 'रा' का चिन्तन करना चाहिये। वह चन्द्रमण्डलके मध्यभागमें स्थित और शुक्लवर्णका है तथा अमृतकी वर्षा करके पृथ्वीको आप्लावित कर रहा है, इस प्रकार चिन्तन करनेसे पाप धुल जाते और साधकका शरीर दिव्य हो जाता है। तदनन्तर अपने बायें पैरसे आरम्भ करके क्रमशः सब अङ्गोंमें अष्टाक्षर-मन्त्रका न्यास करे। वैष्णव-पञ्चाङ्गन्यास तथा चतुर्व्यूहन्यास भी करे। साधकको मूलमन्त्रके द्वारा कर-शुद्धि भी करनी चाहिये। इसकी विधि यों है। दोनों हाथोंकी आठ अँगुलियोंमें अँगूठोंद्वारा एक-एक अक्षरका न्यास करना चाहिये। पहले बायें हाथमें, फिर दायें हाथमें। ॐकारसहित शुक्लवर्णा पृथ्वीका बायें पैरमें न्यास करे। नकारका वर्ण श्याम और देवता शम्भु हैं। उसका न्यास दक्षिण पैरमें है। मोकारको कालस्वरूप माना गया है। इसका न्यास कटिके वामभागमें होता है। नाकार सर्वबीजस्वरूप है। उसकी स्थिति कटिके दक्षिणभागमें है। राकार तेजका स्वरूप बताया गया है। उसका स्थान नाभिप्रदेशमें होता है। यकारका देवता वायु है, उसका न्यास बायें कंधेमें है। णाकारको सर्वव्यापी समझना चाहिये। उसकी स्थिति दायें कंधेमें है। यकारकी स्थिति सिरमें है, जहाँ सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं। तात्पर्य यह कि यकारका न्यास मस्तकमें करना चाहिये।

वैष्णव-पञ्चाङ्गन्यास

'ॐ विष्णवे नमः शिरः', 'ॐ ज्वलनाय नमः शिखा', 'ॐ विष्णवे नमः कवचम्', 'ॐ विष्णवे नमः स्फुरणं दिशोबन्धाय', 'ॐ हुं फट् अस्त्रम्'।*

चतुर्व्यूहन्यास

'ॐ शिरसि शुक्लो वासुदेव इति', 'ॐ आं ललाटे रक्तः संकर्षणो गरुत्मान् वह्निस्तेज आदित्य इति', 'ॐ आं ग्रीवायां पीतः प्रद्युम्नो वायुमेघ इति',


* उक्त मन्त्रोंमेंसे पहले तीन मन्त्रोंको पढ़कर हाथकी अँगुलियोंसे क्रमशः मस्तक, शिखा तथा दोनों बाहु-मूलोंका स्पर्श करे। चौथेसे सब ओर चुटकी बजाये और पाँचवेंको पढ़कर ताली बजाये।

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण · पृष्ठ 138, कुल 434 में से · BharatKosha