भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 139

* मत्स्यमाधवकी महिमा, समुद्रमें मार्जन आदिकी विधि एवं अष्टाक्षर-मन्त्रकी महत्ता * १३७

‘ॐ आं हृदये कृष्णोऽनिरुद्धः सर्वशक्तिसमन्वित इति।’*

इस प्रकार अपने आत्माका चतुर्व्यूहरूपसे चिन्तन करके कार्य आरम्भ करे।

‘मेरे आगे भगवान् विष्णु और पीछे केशव हैं। दक्षिणभागमें गोविन्द और वामभागमें मधुसूदन हैं। ऊपर वैकुण्ठ और नीचे वाराह हैं। बीचकी सम्पूर्ण दिशाओंमें माधव हैं। चलते, खड़े होते, जागते अथवा सोते समय भगवान् नृसिंह मेरी रक्षा करते हैं। मैं वासुदेवस्वरूप हूँ।’ इस प्रकार विष्णुमय होकर पूजन आरम्भ करे। अपने शरीरकी भाँति भगवान्‌के विग्रहमें भी सम्पूर्ण तत्त्वोंका न्यास करे। प्रणवका उच्चारण करके शरीरपर जलके छींटे दे। ‘ॐ फट्’ का उच्चारण सब विघ्नोंका निवारण करनेवाला और शुभ माना गया है। वहाँ सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, वायु और आकाश-मण्डलका चिन्तन करे। कमलके मध्यभागमें विष्णुका न्यास करे। फिर हृदयमें ज्योतिःस्वरूप ॐकारका चिन्तन करके कमलकी कर्णिकामें ज्योतिःस्वरूप सनातन विष्णुकी स्थापना करे। फिर क्रमशः प्रत्येक दलमें अष्टाक्षर-मन्त्रके एक-एक अक्षरका न्यास करे। एक-एक अक्षरके द्वारा तथा समस्त मन्त्रके द्वारा भी पूजन करना अत्यन्त उत्तम माना गया है। सनातन परमात्मा विष्णुका द्वादशाक्षर-मन्त्रसे पूजन करे। इसके बाद भगवान्‌का पहले हृदयमें ध्यान करके बाहर कर्णिकामें भी उनकी भावना करे। उनके ध्यानका स्वरूप इस प्रकार है। भगवान्‌की चार भुजाएँ हैं। वे महान् सत्त्वमय हैं, कोटि-कोटि सूर्योंके समान उनके श्रीअङ्गोंकी प्रभा है और वे महायोगस्वरूप, ज्योतिःस्वरूप एवं सनातन हैं। इसके बाद मन-ही-मन भगवान्‌का स्मरण करते हुए मन्त्रोच्चारणपूर्वक उनका आवाहन आदि करे।

आवाहन-मन्त्र

मीनरूपो वराहश्च नरसिंहोऽथ वामनः।
आयातु देवो वरदो मम नारायणोऽग्रतः॥
ॐ नमो नारायणाय नमः।

‘मीन, वराह, नरसिंह एवं वामन-अवतारधारी वरदायक देवता भगवान् नारायण मेरे सम्मुख पधारें। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको बारम्बार नमस्कार है।’

आसन-मन्त्र

कर्णिकायां सुपीठेऽत्र पद्मकल्पितमासनम्।
सर्वसत्त्वहितार्थाय तिष्ठ त्वं मधुसूदन॥
ॐ नमो नारायणाय नमः।

‘यहाँ कमलकी कर्णिकामें सुन्दर पीठपर कमलका आसन बिछा हुआ है। मधुसूदन! सब प्राणियोंका हित करनेके लिये आप इसपर विराजमान हों। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको बारम्बार नमस्कार है।’

अर्घ्य-मन्त्र

ॐ त्रैलोक्यपतीनां पतये देवदेवाय हृषीकेशाय विष्णवे नमः। ॐ नमो नारायणाय नमः।

‘त्रिभुवनपतियोंके भी पति, देवताओंके भी देवता, इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको बारम्बार नमस्कार है।’

पाद्य-मन्त्र

ॐ पाद्यं पादयोर्देव पद्मनाभ सनातन।
विष्णो कमलपत्राक्ष गृहाण मधुसूदन॥
ॐ नमो नारायणाय नमः।

‘देव पद्मनाभ! सनातन विष्णो!! कमलनयन


* उक्त चार वाक्योंमेंसे एक-एकका उच्चारण करके क्रमशः मस्तक, ललाट, ग्रीवा और हृदयका स्पर्श करे। इनका भावार्थ संक्षेपसे इस प्रकार है—शुक्लवर्ण वासुदेव मस्तकमें हैं। रक्तवर्ण बलरामजी, गरुड़, अग्नि, तेज और सूर्य ललाटमें स्थित हैं। पीतवर्ण प्रद्युम्न तथा वायुसहित मेघ ग्रीवामें हैं। कृष्णवर्ण अनिरुद्ध सम्पूर्ण शक्तियोंके साथ हृदयमें निवास करते हैं।