भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 143
  • भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा और दर्शनका फल, इन्द्रद्युम्नसरोवरके सेवनकी विधि * १४१

इस प्रकार उच्चारण करके विधिपूर्वक स्नान करे और देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा अन्यान्य लोगोंका तिल-जलसे तर्पण करके आचमन करे। फिर पितरोंको पिण्डदान दे, पुरुषोत्तमका पूजन करे। ऐसा करनेवाला मनुष्य दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। वह सात पीढ़ी ऊपर और सात पीढ़ी नीचेके पुरुषोंका उद्धार करके इच्छानुसार गतिवाले विमानके द्वारा विष्णुलोकमें जाता है। इस प्रकार पाँच तीर्थोंका सेवन करके एकादशीको उपवास करे। जो मनुष्य ज्येष्ठकी पूर्णिमाको भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करता है, वह पूर्वोक्त फलका भागी होकर परम धामको जाता है, जहाँसे पुनः उसका लौटना नहीं होता।

मुनियोंने पूछा— पितामह! आप माघ आदि महीनोंको छोड़कर ज्येष्ठमासकी इतनी प्रशंसा क्यों करते हैं? प्रभो! इसका कारण बतलाइये।

ब्रह्माजी बोले— मुनिवरो! सुनो। अन्य मासोंकी अपेक्षा जो ज्येष्ठमासकी बारंबार प्रशंसा करता हूँ, उसका कारण संक्षेपसे बतलाता हूँ। पृथ्वीपर जो-जो तीर्थ, नदियाँ, सरोवर, पुष्करिणी, तड़ाग, वापी, कूप, ह्रद और समुद्र हैं, वे सब ज्येष्ठके शुक्लपक्षकी दशमीसे लेकर पूर्णिमातक एक सप्ताह प्रत्यक्षरूपसे पुरुषोत्तमतीर्थमें जाकर रहते हैं। यह उनका सदाका नियम है। इसलिये वहाँ स्नान-दान, देवदर्शन आदि जो कुछ पुण्य कार्य उस समय किया जाता है, वह अक्षय होता है। द्विजवरो! ज्येष्ठमासके शुक्लपक्षकी दशमी तिथि दस पापोंको हरती है, इसलिये उसे दशहरा कहा गया है। उस दिन जो लोग अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्राका दर्शन करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें जाते हैं। उत्तरायण और दक्षिणायनके आरम्भके दिन श्रीपुरुषोत्तम, बलराम और सुभद्राका दर्शन करनेवाला मानव वैकुण्ठ-धाममें जाता है। जो मनुष्य फाल्गुनकी पूर्णिमाके दिन एकचित्त हो पुरुषोत्तम श्रीगोविन्दको झूलेपर विराजमान देखता है, वह उनके धाममें जाता है। विषुवयोगके दिन विधिपूर्वक पञ्चतीर्थविधिका पालन करके जो श्रीकृष्ण, बलराम तथा सुभद्राका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें जाता है। जो वैशाख-कृष्णा तृतीयाको चन्दन-चर्चित श्रीकृष्णका दर्शन करता है, वह विष्णु-धाममें जाता है। ज्येष्ठा नक्षत्रसे युक्त ज्येष्ठमासकी पूर्णिमाके दिन जो श्रीपुरुषोत्तमका दर्शन करता है, वह अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके श्रीविष्णुलोकमें जाता है।

जिस दिन राशि और नक्षत्रके योगसे महाज्येष्ठी (ज्येष्ठकी पूर्णिमा) हो, उस दिन यत्नपूर्वक श्रीपुरुषोत्तमतीर्थमें पहुँचना चाहिये। महाज्येष्ठी-पर्वके दिन श्रीकृष्ण, बलराम तथा सुभद्राका दर्शन करके मनुष्य बारह यात्राओंसे भी अधिक फलका भागी होता है। प्रयाग, कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य, पुष्कर, गया, हरिद्वार, कुशावर्त, गङ्गा-सागर-संगम, महानदी, वैतरणी तथा अन्य जितने तीर्थ हैं अथवा अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता, पृथ्वीतलके सब तीर्थ, सब मन्दिर, सब समुद्र, सब पर्वत, सब नदी और सब सरोवरोंमें ग्रहणके समय स्नान-दानसे जो फल होता है, वही महाज्येष्ठीको श्रीकृष्णका दर्शन करनेमात्रसे मनुष्य पा लेता है। अतः महाज्येष्ठीको सर्वथा प्रयत्न करके पुरुषोत्तमतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। सुभद्राके साथ श्रीकृष्ण और बलरामका दर्शन करनेवाला मनुष्य अपने समस्त कुलका उद्धार करके भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।