संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
हो सके, उतना एकाग्रचित्तसे जप करे। पद्म, शङ्ख, श्रीवत्स, गदा, गरुड, चक्र, खड्ग और शार्ङ्गधनुष—ये आठ मुद्राएँ बतलायी गयी हैं। जो लोग शास्त्रोक्त मन्त्रोंद्वारा श्रीहरिकी पूजाका विधान न जानते हों, वे 'ॐ नमो नारायणाय'—इस मूलमन्त्रसे ही सदा भगवान् अच्युतका पूजन करें।
भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा और दर्शनका फल, इन्द्रद्युम्नसरोवरके सेवनकी विधि एवं महिमाका वर्णन तथा ज्येष्ठकी पूर्णिमाको दर्शनका माहात्म्य
**ब्रह्माजी कहते हैं—**उपर्युक्त प्रकारसे भक्तिपूर्वक भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाये। इसके बाद समुद्रसे प्रार्थना करे—'सरिताओंके स्वामी तीर्थराज ! आप सम्पूर्ण भूतोंके प्राण और योनि हैं। आपको नमस्कार है। अच्युतप्रिय ! मेरी रक्षा कीजिये।' इस प्रकार उत्तम क्षेत्र समुद्रमें स्नान करके तथा तटपर अविनाशी नारायणकी विधिपूर्वक पूजा करके बलराम, श्रीकृष्ण और सुभद्राको प्रणाम करे। ऐसा करनेवाला पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो सब प्रकारके दुःखोंसे छुटकारा पा जाता है और अन्तमें सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर, जहाँ दिव्य गन्धर्वोंकी संगीतध्वनि होती रहती है, बैठकर अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके श्रीविष्णुके लोकमें जाता है। ग्रहण, संक्रान्ति, अयनारम्भ, विषुवयोग, युगादि तिथियाँ, व्यतीपात, तिथिक्षय, आषाढ़, कार्तिक तथा माघकी पूर्णिमा और अन्य शुभ तिथियोंमें जो वहाँ ब्राह्मणोंको दान देते हैं, वे अन्य तीर्थोंकी अपेक्षा हजारगुना फल पाते हैं। जो लोग वहाँ विधिपूर्वक पितरोंको पिण्डदान करते हैं, उनके पितर अक्षय तृप्ति-लाभ करते हैं। इस प्रकार मैंने समुद्रमें स्नान करनेका उत्तम फल बतलाया। वह सब पापोंको दूर करनेवाला, पवित्र तथा इच्छानुसार सब फलोंका दाता है। यह पुराण-रहस्य नास्तिकको नहीं बतलाना चाहिये। भूतलमें जितने तीर्थ, नदियाँ और सरोवर हैं, वे सब समुद्रमें प्रवेश करते हैं। इसलिये वह सबसे श्रेष्ठ है। सरिताओंका स्वामी समुद्र समस्त तीर्थोंका राजा है। वह सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ और समस्त इच्छित पदार्थको देनेवाला है। जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकारका नाश हो जाता है, उसी प्रकार तीर्थराज समुद्रमें स्नान करनेपर सब पापोंका क्षय हो जाता है। जहाँ साक्षात् भगवान् नारायणका निवासस्थान है, उस तीर्थराज समुद्रके गुणोंका वर्णन कौन कर सकता है। जहाँ निन्यानबे करोड़ तीर्थ रहते हैं, उसकी श्रेष्ठताके विषयमें क्या कहा जा सकता है। इसलिये वहाँ स्नान, दान, होम, जप और देवपूजन आदि जो कुछ भी कर्म किया जाता है, वह अक्षय होता है। वहाँसे उस तीर्थमें जाय, जो अश्वमेध-यज्ञके अङ्गसे उत्पन्न हुआ है। उसका नाम है इन्द्रद्युम्नसरोवर। वह पवित्र एवं शुभ तीर्थ है। बुद्धिमान् पुरुष वहाँ जाकर पवित्र भावसे आचमन करे और मन-ही-मन श्रीहरिका ध्यान करके जलमें उतरे। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करे—
अश्वमेधाङ्गसम्भूत तीर्थ सर्वाघनाशन।
स्नानं त्वयि करोम्यद्य पापं हर नमोऽस्तु ते॥
'अश्वमेध-यज्ञके अङ्गसे प्रकट हुए तथा सम्पूर्ण पापोंके विनाशक तीर्थ! आज मैं तुम्हारे जलमें स्नान करता हूँ। मेरे पाप हर लो। तुमको नमस्कार है।'