संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- मत्स्यमाधवकी महिमा, समुद्रमें मार्जन आदिकी विधि एवं अष्टाक्षर-मन्त्रकी महत्ता * १३९
धूप-मन्त्र
वनस्पतिरसो दिव्यो गन्धाढ्यः सुरभिश्च ते।
मया निवेदितो भक्त्या धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥
ॐ नमो नारायणाय नमः।
‘भगवन्! यह धूप सुगन्धद्रव्योंसे मिश्रित वनस्पतिका दिव्य रस है, अतएव अत्यन्त सुगन्धित है; मैंने भक्तिपूर्वक इसे आपकी सेवामें अर्पित किया है, आप इसे स्वीकार करें। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको बारम्बार नमस्कार है।’
दीप-मन्त्र
सूर्यचन्द्रमसोर्ज्योतिर्विद्युदग्न्योस्तथैव च।
त्वमेव ज्योतिषां देव दीपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥
ॐ नमो नारायणाय नमः।
‘देव! आप ही सूर्य और चन्द्रमाकी, बिजली और अग्निकी तथा ग्रहों और नक्षत्रोंकी ज्योति हैं। यह दीप ग्रहण कीजिये। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको बारम्बार नमस्कार है।’
नैवेद्य-मन्त्र
अन्नं चतुर्विधं चैव रसैः षड्भिः समन्वितम्।
मया निवेदितं भक्त्या नैवेद्यं तव केशव॥
ॐ नमो नारायणाय नमः।
‘केशव! मैंने [मधुर आदि] छः रसोंसे युक्त चार प्रकारका (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य) अन्न आपको भक्तिपूर्वक समर्पित किया है। आप यह नैवेद्य ग्रहण करें। सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीनारायणको बारम्बार नमस्कार है।’
पूर्वोक्त अष्टदल कमलके पूर्वदलमें वासुदेवका, दक्षिणदलमें संकर्षणका, पश्चिमदलमें प्रद्युम्नका, उत्तरदलमें अनिरुद्धका, अग्निकोणवाले दलमें वाराहका, नैर्ऋत्यकोणमें नरसिंहका, वायव्यकोणमें माधवका तथा ईशानमें भगवान् त्रिविक्रमका न्यास करे। फिर अष्टाक्षरदेवके सम्मुख गरुड़की स्थापना करे। भगवान्के वामभागमें चक्र और दक्षिणभागमें शङ्खकी स्थापना करे। इसी प्रकार उनके दक्षिणभागमें महागदा कौमोदकी और वामभागमें शार्ङ्ग नामक धनुषको स्थापित करे। दक्षिणभागमें दो दिव्य तरकस और वामभागमें खड्गका न्यास करे। दक्षिणभागमें श्रीदेवी और वामभागमें पुष्टिदेवीकी स्थापना करे। भगवान्के सामने वनमाला, श्रीवत्स और कौस्तुभ रखे। फिर पूर्व आदि चारों दिशाओंमें हृदय आदिका न्यास करे। कोणमें देवदेव विष्णुके अस्त्रका न्यास करे। पूर्व आदि आठ दिशाओंमें तथा ऊपर और नीचे तान्त्रिक मन्त्रोंसे क्रमशः इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान, अनन्त तथा ब्रह्माजीका पूजन करे। इस प्रकार मण्डलमें स्थित देवेश्वर जनार्दनका पूजन करके मनुष्य निश्चय ही मनोवाञ्छित भोगोंको प्राप्त करता है। इसी विधिसे पूजित मण्डलस्थ भगवान् जनार्दनका जो दर्शन करता है, वह भी अविनाशी विष्णुमें प्रवेश करता है। जिसने उपर्युक्त विधिसे एक बार भी श्रीकेशवका पूजन किया है, वह जन्म-मृत्यु और जरा अवस्थाको लाँघकर भगवान् विष्णुके पदको प्राप्त होता है। ‘नमः’ सहित ॐकार जिसके आदिमें और ‘नमः’ जिसके अन्तमें है, वह ‘ॐ नमो नारायणाय नमः’ यह तेजस्वी मन्त्र सम्पूर्ण तत्त्वोंका मन्त्र कहलाता है। इसी विधिसे प्रत्येकको गन्ध, पुष्प आदि वस्तुएँ क्रमशः निवेदन करनी चाहिये। इसी तरह क्रमशः आठ मुद्राएँ बाँधकर दिखाये। फिर मन्त्रवेत्ता पुरुष ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस मूलमन्त्रका एक सौ आठ या अट्ठाईस अथवा आठ बार जप करे। किसी कामनाके लिये जप करना हो तो उसके लिये शास्त्रोंमें जितना बताया गया हो, उतनी संख्यामें जप करे अथवा निष्कामभावसे जितना