भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 434 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 151

* तीर्थोंके भेद, वामनका बलिसे भूमिदान-ग्रहण * १४९

और तपस्याके फल देनेवाले और राक्षसकुलका संहार करनेवाले साक्षात् विष्णु हैं। बलवानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी राजा बलि क्षत्रिय-धर्मके अनुसार विजयी होकर भक्तिपूर्वक धनका दान करते हुए अपनी पत्नीके साथ यज्ञकी दीक्षा लेकर बैठे थे और हविष्यका हवन करते हुए यज्ञपुरुषका ध्यान कर रहे थे। शुक्राचार्यजीने वामनजीको पहचानकर तुरंत ही राजा बलिसे कहा—'राजन्! ये जो बौने शरीरवाले ब्राह्मण तुम्हारे यज्ञमें आये हैं, वे वास्तवमें ब्राह्मण नहीं, यज्ञवाहन यज्ञेश्वर विष्णु हैं। प्रभो! इसमें तनिक संदेह नहीं कि ये देवताओंका हित करनेके लिये बालकरूप धारणकर तुमसे कुछ याचना करने आये हैं। अतः पहले मुझसे सलाह लेकर पीछे इन्हें कुछ देना चाहिये।'

यह सुनकर शत्रुविजयी बलिने अपने पुरोहित शुक्राचार्यसे कहा—'मैं धन्य हूँ, जिसके घरपर साक्षात् यज्ञेश्वर मूर्तिमान् होकर पधारते और कुछ याचना करते हैं। अब इसमें सलाह लेनेके योग्य कौन-सी बात रह जाती है।' यों कहकर पत्नी और पुरोहित शुक्राचार्यके साथ राजा बलि उस स्थानपर आये, जहाँ अदितिनन्दन वामनजी विराजमान थे। राजाने हाथ जोड़कर पूछा—'भगवन्! बताइये, आप क्या चाहते हैं?' तब वामनजीने कहा— 'महाराज! केवल तीन पग भूमि दे दीजिये और किसी धनकी मुझे आवश्यकता नहीं है।' 'बहुत अच्छा' कहकर राजा बलिने रत्नजटित कलशसे जल लिया और वामनजीको भूमि संकल्प करके दे दी। सभी महर्षि और शुक्राचार्य चुपचाप देखते रहे। वामनजीने धीरेसे कहा—'राजन्! स्वस्ति, आप सुखी रहें। मुझे मेरी नापी हुई तीन पग भूमि दे दीजिये।' बलिने 'तथास्तु' कहकर ज्यों ही वामनजीकी ओर देखा, वे विराट्रूप हो गये। चन्द्रमा और सूर्य उनकी छातीके सामने आ गये। उन्हें इस रूपमें देखकर स्त्रीसहित दैत्यराज बलिने विनयपूर्वक कहा—'जगन्मय विष्णो! आप अपनी शक्तिभर पैर बढ़ाइये!'

विष्णु बोले—दैत्यराज! देखो, मैं पैर बढ़ाता हूँ।

बलिने कहा—बढ़ाइये, अवश्य बढ़ाइये।

तब भगवान्ने पृथ्वीके नीचे स्थित कच्छपकी पीठपर पैर रखकर पहला पग बलिके यज्ञमें रखा, किंतु उनका दूसरा पग ब्रह्मलोकतक जा पहुँचा। उस समय उन्होंने बलिसे कहा—'दैत्यराज! मेरा तीसरा पग रखनेके लिये तो स्थान ही नहीं है, कहाँ रखूँ? स्थान दो।'

यह सुनकर बलिने हँसते हुए कहा—'जगन्मय देवेश्वर! आपने ही तो जगत्की सृष्टि की है, मैं तो इसका स्रष्टा नहीं हूँ। यदि यह छोटा या थोड़ा हो गया तो इसमें आपका ही दोष है, मैं क्या करूँ। केशव! फिर भी मैं कभी असत्य नहीं बोलता, अतः मेरे सत्यकी रक्षा करते हुए आप अपना तीसरा पग मेरी पीठपर ही रखिये।'

बलिका यह वचन सुनकर वेदत्रयीरूप देवपूजित भगवान् प्रसन्न होकर बोले—'दैत्यराज! मैं तुम्हारी भक्तिसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो, कोई वर माँगो।' तब बलिने जगत्के स्वामी भगवान् त्रिविक्रमसे कहा—'अब मैं आपसे याचना नहीं करूँगा।' तब भगवान्ने स्वयं ही प्रसन्न होकर उन्हें मनोवाञ्छित वर दिया। वर्तमान समयमें रसातलका राज्य, भविष्यमें इन्द्रपद, स्वतन्त्रता तथा अविनाशी यश आदि प्रदान किये। इस प्रकार दैत्यराज बलिको यह सब कुछ देकर भगवान्ने उन्हें पुत्र और पत्नीसहित रसातलमें भेज दिया और इन्द्रको देवताओंका राज्य अर्पित किया। इसी बीचमें उनका जो दूसरा पग मेरे लोकमें पहुँचा था, उसे देखकर मैंने सोचा, 'यह मेरे