संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
जन्मदाता भगवान् विष्णुका चरण है, जो सौभाग्यवश मेरे घरपर आ पहुँचा है। इसके लिये मैं क्या करूँ, जिससे मेरा कल्याण हो? मेरे पास जो यह श्रेष्ठ कमण्डलु है, इसमें भगवान् शंकरका दिया हुआ पवित्र जल है। यह जल उत्तम, वरदायक, शान्तिकारक, शुभद, भोग और मोक्षका दाता, विश्वके लिये मातृरूप, अमृतमय, पवित्र औषध, पावन, पूज्य, ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, गुणमय तथा स्मरणमात्रसे लोकोंको पवित्र करनेवाला है। यह जल मैं अपने पिताको अर्घ्यरूपसे अर्पित करूँगा।' यह सोचकर मैंने वह जल भगवान्के चरणोंमें अर्घ्यरूपसे चढ़ा दिया। वह मन्त्रयुक्त अर्घ्यजल भगवान् विष्णुके चरणोंमें गिरकर मेरुपर्वतपर पड़ा और चार भागोंमें बँटकर पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तर दिशामें पृथ्वीपर जा पहुँचा। दक्षिणमें गिरे हुए जलको भगवान् शंकरने जटाओंमें रख लिया। पश्चिममें जो जल गिरा, वह फिर कमण्डलुमें ही चला आया। उत्तरमें गिरे हुए जलको भगवान् विष्णुने ग्रहण किया तथा पूर्वमें जो जल गिरा, उसे देवताओं, पितरों और लोकपालोंने ग्रहण किया; अतः वह जल अत्यन्त श्रेष्ठ कहा जाता है। भगवान् विष्णुके चरणोंसे निकलकर दक्षिण दिशामें गया हुआ जल, जो भगवान् शंकरकी जटामें स्थित हुआ, पर्वके समय शुभोदय करनेवाला है। उसके प्रभावका स्मरण करनेसे समस्त अभिलषित वस्तुओंकी प्राप्ति होती है।
गौतमके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति, शिवका गौतमको जटासहित गङ्गाका अर्पण तथा गौतमी गङ्गाका माहात्म्य
ब्रह्माजी कहते हैं— महामते! भगवान् शंकरकी जटामें जो दिव्य जल आकर स्थित हुआ, उसके दो भेद हुए; क्योंकि उसे पृथ्वीपर उतारनेवाले दो व्यक्ति थे। उस जलके एक भागको तो व्रत, दान और समाधिमें तत्पर रहनेवाले गौतम नामक ब्राह्मणने भगवान् शिवकी आराधना करके भूतलतक पहुँचाया, जो सम्पूर्ण लोकमें विख्यात हुआ; तथा दूसरा भाग बलवान् क्षत्रिय राजा भगीरथने इस पृथ्वीपर उतारा। इसके लिये उन्हें नियमोंका पालन करते हुए तपस्याद्वारा भगवान् शंकरकी आराधना करनी पड़ी थी। इस प्रकार एक ही गङ्गाके दो स्वरूप हो गये।
एक समयकी बात है, महर्षि गौतम कैलासपर्वतपर गये और मौनभावसे कुशा बिछाकर उसपर बैठे; फिर पवित्र होकर इस स्तोत्रका गान करने लगे।
गौतम बोले— भोगकी अभिलाषा रखनेवाले जीवोंको मनोवाञ्छित भोग प्रदान करनेके लिये