संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
भगवती उमा ही हैं। उनका रूप सदा चन्द्रमाके समान ही मनोरम है। जिनके प्रसादसे ब्रह्मा आदि चराचर जीवोंकी बुद्धि, नेत्र, चेतना और मनमें सदा सुखकी प्राप्ति होती है, वे जगद्गुरु शिवकी सुन्दरी शक्ति शिवा वाणीकी अधीश्वरी हैं। आज ब्रह्माजीका भी मन मलिन हो रहा है, फिर अन्य जीवोंकी तो बात ही क्या—यह सोचकर जगन्माता उमाने अनेक उपायोंसे सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करनेके लिये गङ्गाका अवतार धारण किया है। श्रुतियोंको देखकर तथा सब प्रमाणोंसे भगवान् शंकरकी प्रभुतापर विश्वास करके लोग जो धर्मोंका अनुष्ठान करते और उनके फलस्वरूप जो उत्तम भोग भोगते हैं, यह भगवान् सदाशिवकी ही विभूति है। वैदिक अथवा लौकिक कार्य, क्रिया, कारक और साधनोंका जो सबसे उत्तम एवं प्रिय साध्य है, वह अनादि कर्त्ता शिवकी प्राप्ति ही है। जो सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म, परप्रधान, सारभूत और उपासनाके योग्य है, जिसका ध्यान तथा जिसकी प्राप्ति करके श्रेष्ठ योगी पुरुष मुक्त हो जाते—पुनः संसारमें जन्म नहीं लेते, वे भगवान् उमापति ही मोक्ष हैं। माता पार्वती! भगवान् शंकर जगत्का कल्याण करनेके लिये जैसे-जैसे अपार मायामय रूप धारण करते हैं, वैसे-ही-वैसे तुम भी उनके योग्य रूप धारण करती हो। इस प्रकार तुममें पातिव्रत्य जाग्रत् रहता है।
गौतमजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर वृषभाङ्कित ध्वजावाले साक्षात् भगवान् शिव उनके सामने प्रकट हुए और प्रसन्न होकर बोले—'गौतम! तुम्हारी भक्ति, स्तुति तथा उत्तम व्रतसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ। माँगो, तुम्हें क्या दूँ? जो वस्तु देवताओंके लिये भी दुर्लभ हो, वह भी तुम माँग सकते हो।'
गौतमने कहा—जगदीश्वर! समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाली इन पावन देवीको, जो आपकी जटामें स्थित और आपको परम प्रिय हैं, ब्रह्मगिरिपर छोड़ दीजिये। ये समुद्रमें मिलनेतक सबके लिये तीर्थरूप होकर रहें। इनमें स्नान करनेमात्रसे मन, वाणी और शरीरद्वारा किये हुए ब्रह्महत्या आदि समस्त पाप नष्ट हो जायें। चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, अयनारम्भ, विषुवयोग, संक्रान्ति तथा वैधृतियोग आनेपर अन्य पुण्यतीर्थोंमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है, वह इनके स्मरणमात्रसे ही प्राप्त हो जाय। ये समुद्रमें पहुँचनेतक जहाँ-जहाँ जायें, वहाँ-वहाँ आप अवश्य रहें। यह श्रेष्ठ वर मुझे प्राप्त हो तथा इनके तटसे एक योजनसे लेकर दस योजनतककी दूरीके भीतर आये हुए महापातकी मनुष्य भी यदि स्नान किये बिना ही मृत्युको प्राप्त हो जायें तो वे भी मुक्तिके भागी हों।
**ब्रह्माजी कहते हैं—**गौतमकी यह बात सुनकर भगवान् शंकर बोले—'इससे बढ़कर दूसरा कोई तीर्थ न तो हुआ है न होगा; यह बात सत्य है, सत्य है, सत्य है और वेदमें भी निश्चित की गयी है कि गौतमी गङ्गा (गोदावरी) सब तीर्थोंसे