संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* गौतमके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति तथा गौतमी गङ्गाका माहात्म्य * १५३
अधिक पवित्र हैं।' यों कहकर वे अन्तर्धान हो गये। लोकपूजित भगवान् शिवके चले जानेपर गौतमने उनकी आज्ञासे जटासहित सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाको साथ ले देवताओंसे घिरकर ब्रह्मगिरिमें प्रवेश किया। उस समय महाभाग महर्षि, ब्राह्मण तथा क्षत्रिय भी आनन्दमग्न होकर जय-जयकार करते हुए ब्रह्मर्षि गौतमकी प्रशंसा करने लगे।
पवित्र एवं संयत चित्तवाले गौतमने जटाको ब्रह्मगिरिके शिखरपर रखा और भगवान् शङ्करका स्मरण करते हुए गङ्गाजीसे हाथ जोड़कर कहा—'तीन नेत्रोंवाले भगवान् शिवकी जटासे प्रकट हुई माता गङ्गा! तुम सब अभीष्टोंको देनेवाली और शान्त हो। मेरा अपराध क्षमा करो और सुखपूर्वक यहाँसे प्रवाहित होकर जगत्का कल्याण करो। देवि! मैंने तीनों लोकोंका उपकार करनेके लिये तुम्हारी याचना की है और भगवान् शंकरने भी इसी उद्देश्यकी सिद्धिके लिये तुम्हें दिया है। अतः हमारा यह मनोरथ असफल नहीं होना चाहिये।'
गौतमका यह वचन सुनकर भगवती गङ्गाने उसे स्वीकार किया और अपने-आपको तीन स्वरूपोंमें विभक्त करके स्वर्गलोक, मर्त्यलोक एवं रसातलमें फैल गयीं। स्वर्गलोकमें उनके चार रूप हुए, मर्त्यलोकमें वे सात धाराओंमें बहने लगीं तथा रसातलमें भी उनकी चार धाराएँ हुईं। इस प्रकार एक ही गङ्गाके पंद्रह आकार हो गये। गङ्गा देवी सर्वत्र हैं, सर्वभूतस्वरूपा हैं, सब पापोंका नाश करनेवाली तथा सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली हैं। वेदमें सदा उन्हींके यशका गान किया जाता है। जिनकी बुद्धि अज्ञानसे मोहित है, वे मर्त्यलोकके निवासी समझते हैं कि गङ्गा केवल मर्त्यलोकमें ही हैं, पाताल अथवा स्वर्गमें नहीं हैं। भगवती गङ्गा जहाँतक पहुँचकर सागरमें मिली हैं, वहाँतक वे देवमयी मानी गयी हैं। महर्षि गौतमके छोड़नेपर वे पूर्वसमुद्रकी ओर चली गयीं। उस समय देवर्षियोंद्वारा सेवित कल्याणमयी जगन्माता गङ्गाकी मुनिश्रेष्ठ गौतमने परिक्रमा की। इसके बाद उन्होंने देवेश्वर भगवान् त्र्यम्बकका पूजन किया। उनके स्मरण करते ही करुणासिन्धु भगवान् शिव वहाँ प्रकट हो गये। पूजा करके महर्षि गौतमने कहा—'देवदेव महेश्वर! आप सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये मुझे इस तीर्थमें स्नान करनेकी विधि बताइये।'
भगवान् शिव बोले—महर्षे! गोदावरीमें स्नान करनेकी सम्पूर्ण विधि सुनो। पहले नान्दीमुख श्राद्ध करके शरीरकी शुद्धि करे, फिर ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उनसे स्नान करनेकी आज्ञा ले। तदनन्तर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए गोदावरी नदीमें स्नान करनेके लिये जाय। उस समय पतित मनुष्योंके साथ वार्तालाप न करे। जिसके हाथ, पैर और मन भलीभाँति संयममें रहते हैं, वही तीर्थका पूरा फल पाता है। भावदोष (दुर्भावना)-का परित्याग करके अपने धर्ममें स्थिर रहे और थके-माँदे, पीड़ित मनुष्योंकी सेवा करते हुए उन्हें यथायोग्य अन्न दे। जिनके पास कुछ नहीं है, ऐसे साधुओंको वस्त्र और कम्बल दे। भगवान् विष्णुकी तथा गङ्गाजीके प्रकट होनेकी दिव्य कथा सुने। इस विधिसे यात्रा करनेवाला मनुष्य तीर्थके उत्तम फलका भागी होता है।
गौतम! गोदावरी नदीमें दो-दो हाथ भूमिपर तीर्थ होंगे। उनमें मैं स्वयं सर्वत्र रहकर सबकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करता रहूँगा। सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा अमरकण्टकपर्वतपर अधिक उत्तम मानी गयी हैं। यमुनाका विशेष महत्त्व उस स्थानपर है, जहाँ वे गङ्गासे मिली हैं। सरस्वती नदी प्रभासतीर्थमें श्रेष्ठ बतायी गयी हैं। तृष्णा,