संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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भीमरथी और तुङ्गभद्रा—इन तीन नदियोंका जहाँ समागम हुआ है, वह तीर्थ मनुष्योंको मुक्ति देनेवाला है। इसी प्रकार पयोष्णी नदी भी जहाँ तपती (ताप्ती)-में मिली हैं, वह तीर्थ मोक्षदायक है; परंतु ये गौतमी गङ्गा मेरी आज्ञासे सर्वत्र सर्वदा और सब मनुष्योंको स्नान करनेपर मोक्ष प्रदान करेंगी। कोई-कोई तीर्थ किसी विशेष समयमें देवताका शुभागमन होनेपर अधिक पुण्यमय माना जाता है, किंतु गोदावरी नदी सदा ही सबके लिये तीर्थ है। मुनिश्रेष्ठ! दो सौ योजनके भीतर गोदावरी नदीमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ होंगे। ये गङ्गा निम्नाङ्कित नामोंसे प्रसिद्ध होंगी—माहेश्वरी, गङ्गा, गौतमी, वैष्णवी, गोदावरी, नन्दा, सुनन्दा, कामदायिनी, ब्रह्मतेजःसमानीता तथा सर्वपापप्रणाशिनी। गोदावरी मुझे सदा ही प्रिय हैं। ये स्मरणमात्रसे पाप-राशिका विनाश करनेवाली हैं। पाँचों भूतोंमें जल श्रेष्ठ है! जलमें भी जो तीर्थका जल है, वह सर्वश्रेष्ठ माना गया है। तीर्थ-जलमें भी भागीरथी गङ्गा श्रेष्ठ हैं और उनसे भी गौतमी गङ्गा उत्कृष्ट मानी गयी हैं; क्योंकि वे भगवान् शंकरकी जटाके साथ लायी गयी थीं। अतः इनसे बढ़कर कल्याणकारी तीर्थ दूसरा कोई नहीं है। मुने! स्वर्ग, पृथ्वी और पातालमें भी गङ्गा सब मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली हैं।
**ब्रह्माजी कहते हैं—**नारद! इस प्रकार साक्षात् भगवान् शंकरने संतुष्ट होकर महात्मा गौतमको गोदावरीका जो माहात्म्य बतलाया था। वही मैंने तुमको सुनाया है।
भागीरथी गङ्गाके अवतरणकी कथा
**नारदजीने कहा—**सुरश्रेष्ठ! एक ही गङ्गाके आपने दो भेद बतलाये हैं। एक तो वह है, जो गौतम नामक ब्राह्मणके द्वारा लाया गया और दूसरा अंश भगवान् शंकरकी जटामें ही रह गया, जिसे क्षत्रिय राजा भगीरथ ले आये। अतः उसीका प्रसङ्ग मुझे सुनाइये।
**ब्रह्माजी बोले—**देवर्षे! वैवस्वत मनुके वंशमें राजा इक्ष्वाकुके कुलमें सगर नामके एक अत्यन्त धार्मिक राजा हो गये हैं। वे यज्ञ करते, दान देते और सदा धार्मिक आचार-विचारसे रहते थे। उनके दो पत्नियाँ थीं। वे दोनों ही पतिभक्ति-परायणा थीं, किंतु उनमेंसे किसीको भी संतान न हुई। इसलिये राजाके मनमें बड़ी चिन्ता थी। एक दिन उन्होंने महर्षि वसिष्ठको अपने घर बुलाया और विधिपूर्वक उनकी पूजा करके पूछा—‘किस उपायसे मुझे संतान होगी?’ उनकी यह बात सुनकर महर्षि वसिष्ठने कुछ कालतक ध्यान किया। उसके बाद राजासे कहा—‘राजन्! तुम पत्नीसहित सदा ऋषि-महर्षियोंका सेवन करते रहो।’ यों कहकर महर्षि वसिष्ठ अपने आश्रमको चले गये। एक समयकी बात है—राजर्षि सगरके घरपर एक तपस्वी महात्मा पधारे। राजाने उन महर्षिका पूजन किया। इससे संतुष्ट होकर वे बोले—‘महाभाग! वर माँगो।’ यह सुनकर राजाने पुत्र होनेके लिये प्रार्थना की। मुनि बोले—‘तुम्हारी एक पत्नीके गर्भसे एक ही पुत्र होगा, किंतु वह वंशधर होगा; और दूसरी स्त्रीके गर्भसे साठ हजार पुत्र उत्पन्न होंगे।’ वरदान देकर जब मुनि चले गये, तब उनके कथनानुसार यथासमय राजाके हजारों पुत्र हुए। राजा सगरने उत्तम दक्षिणासे युक्त बहुतेरे अश्वमेध-यज्ञ किये। फिर एक अश्वमेध-यज्ञके लिये उन्होंने विधिपूर्वक