भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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पृष्ठ 157

* भागीरथी गङ्गाके अवतरणकी कथा * १५५

दीक्षा ग्रहण की और अश्वकी रक्षाके लिये सेनासहित अपने पुत्रोंको नियुक्त किया। अश्व पृथ्वीपर भ्रमण करने लगा। इसी बीचमें कहीं अवसर पाकर इन्द्रने उस अश्वको हर लिया और रक्षकोंको सौंप दिया। राजकुमार घोड़ेको इधर-उधर ढूँढ़ने लगे, परंतु कहीं भी वह उन्हें दिखायी न दिया। तब उन्होंने देवलोकमें जाकर ढूँढ़ा, पर्वतों और सरोवरोंमें खोजा और कितने ही जङ्गल छान डाले; मगर कहीं भी उसका पता न लगा। इसी समय आकाशवाणी हुई—'सगरपुत्रो! तुम्हारा घोड़ा रसातलमें बँधा है और कहीं नहीं है।' यह सुनकर वे रसातलमें जानेके लिये सब ओरसे पृथ्वीको खोदने लगे। क्षुधासे पीड़ित होनेपर वे सूखी मिट्टी खाते और दिन-रात भूमि खोदते रहते। इस प्रकार वे शीघ्र ही रसातलमें जा पहुँचे। सगरके बलवान् पुत्रोंको वहाँ आया सुनकर राक्षस थर्रा उठे और उनके वधका उपाय करने लगे। वे बिना युद्ध किये ही भयभीत हो उस स्थानपर आये, जहाँ महामुनि कपिल सो रहे थे। कपिलजीका क्रोध बड़ा प्रचण्ड था। राक्षसोंने वह घोड़ा ले जाकर तुरंत कपिलजीके सिरहानेकी ओर बाँध दिया और स्वयं चुपचाप दूर खड़े होकर देखने लगे कि अब क्या होता है। इतनेमें ही सगरके पुत्र रसातलमें घुसकर देखते हैं कि घोड़ा बँधा है और पास ही कोई पुरुष सो रहा है। उन्होंने कपिलजीको ही अश्व चुराकर यज्ञमें विघ्न डालनेवाला माना और यह निश्चय किया कि इस महापापीको मारकर हमलोग अपना अश्व महाराजके निकट ले चलें। कोई बोले—'अपना पशु बँधा है, इसे ही खोलकर ले चलें। इस सोये हुए पुरुषको मारनेसे क्या लाभ।' यह सुनकर दूसरे बोल उठे—'हम शूरवीर राजा हैं, शासक हैं। इस पापीको उठायें और क्षत्रियोचित तेजसे इसका वध कर डालें।' फिर क्या था, वे मुनिको कटु वचन सुनाते हुए लातोंसे मारने लगे।

इससे मुनिश्रेष्ठ कपिलको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने सगरपुत्रोंकी ओर रोषपूर्ण दृष्टिसे देखा और भस्म कर डाला। वे सब-के-सब जलकर राख हो गये। नारद! यज्ञमें दीक्षित महाराज सगरको इन सब बातोंका पता न लगा। उस समय तुमने ही जाकर सगरको यह सब समाचार सुनाया। इससे राजाको बड़ी चिन्ता हुई। अब क्या करना चाहिये, यह बात उनकी समझमें न आयी। राजा सगरके एक दूसरा पुत्र भी था, जिसका नाम असमञ्जा था। वह मूर्खतावश नगरके बालकोंको उठाकर पानीमें फेंक देता था। तब पुरवासियोंने एकत्रित होकर राजा सगरको इस बातकी सूचना दी। पुत्रका यह अन्याय जानकर महाराजको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने अपने अमात्योंसे कहा—'यह असमञ्जा बालकोंकी हत्या करनेवाला तथा क्षत्रियधर्मका त्यागी है। अतः यह इस देशका