भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

त्याग कर दे।' महाराजका यह आदेश सुनकर अमात्योंने राजकुमारको तुरंत देशनिकाला दे दिया। असमञ्जा वनमें चला गया। अब राजा सगर चिन्ता करने लगे कि 'हमारे सब पुत्र ब्राह्मणके शापसे रसातलमें नष्ट हो गये। एक बचा था, वह भी वनमें चला गया। इस समय मेरी क्या गति होगी?'

असमञ्जाके एक पुत्र था, जो अंशुमान् नामसे विख्यात हुआ। यद्यपि अंशुमान् अभी बालक था तो भी राजाने उसे बुलाकर अपना कार्य बतलाया। अंशुमान्ने भगवान् कपिलकी आराधना की और घोड़ा ले आकर राजा सगरको दे दिया। इससे वह यज्ञ पूर्ण हुआ। अंशुमान्‌के तेजस्वी पुत्रका नाम दिलीप था। दिलीपके पुत्र परम बुद्धिमान् भगीरथ हुए। भगीरथने जब अपने समस्त पितामहोंकी दुर्गतिका हाल सुना, तब उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने नृपश्रेष्ठ सगरसे विनयपूर्वक पूछा—'महाराज! उन सबका उद्धार कैसे होगा?' राजाने उत्तर दिया—'बेटा! यह तो भगवान् कपिल ही जानते हैं।' यह सुनकर बालक भगीरथ रसातलमें गये और कपिलको नमस्कार करके अपना सब मनोरथ उन्हें कह सुनाया। कपिल मुनि बहुत देरतक ध्यान करके बोले—'राजन्! तुम तपस्याद्वारा भगवान् शंकरकी आराधना करो और उनकी जटामें स्थित गङ्गाके जलसे अपने पितरोंकी भस्मको आप्लावित करो। इससे तुम तो कृतार्थ होगे ही, तुम्हारे पितर भी कृतकृत्य हो जायेंगे।' यह सुनकर भगीरथने कहा—'बहुत अच्छा, मैं ऐसा ही करूँगा। मुनिश्रेष्ठ! बताइये, मैं कहाँ जाऊँ और कौन-सा कार्य करूँ?'

कपिलजी बोले— नरश्रेष्ठ! कैलासपर्वतपर जाकर महादेवजीकी स्तुति करो और अपनी शक्तिके अनुसार तपस्या करते रहो। इससे तुम्हारे अभीष्टकी सिद्धि होगी।

मुनिका यह वचन सुनकर भगीरथने उन्हें प्रणाम किया और कैलासपर्वतकी यात्रा की। वहाँ पहुँचकर पवित्र हो बालक भगीरथने तपस्याका निश्चय किया और भगवान् शंकरको सम्बोधित करके इस प्रकार कहा—'प्रभो! मैं बालक हूँ, मेरी बुद्धि भी बालककी ही है और आप भी अपने मस्तकपर बाल चन्द्रमाको धारण करते हैं। मैं कुछ भी नहीं जानता। आप मेरे इस अनजानपनसे ही प्रसन्न होइये। अमरेश्वर! जो लोग वाणीसे, मनसे और क्रियासे कभी मेरा उपकार करते हैं तथा हितसाधनमें संलग्न रहते हैं, उनका कल्याण करनेके लिये मैं उमासहित आपको प्रणाम करता हूँ। आप देवता आदिके लिये भी पूज्य हैं। जिन पूर्वजोंने मुझे अपने सगोत्र और समानधर्माके रूपमें उत्पन्न किया और पाल-पोसकर बड़ा बनाया, भगवान् शिव उनका अभीष्ट मनोरथ पूर्ण करें। मैं बालचन्द्रका मुकुट धारण करनेवाले भगवान् शंकरको नित्य प्रणाम करता हूँ।'

भगीरथके यों कहते ही भगवान् शिव उनके सामने प्रकट हो गये और बोले—'महामते! तुम निर्भय होकर कोई वर माँगो। जो वस्तु देवताओंके लिये भी सुलभ नहीं है, वह भी मैं तुम्हें निश्चय ही दे दूँगा।' यह आश्वासन पाकर भगीरथने महादेवजीको प्रणाम किया और प्रसन्न होकर कहा—'देवेश्वर! आपकी जटामें जो सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाजी विराजमान हैं, उन्हें ही मेरे पितरोंका उद्धार करनेके लिये दे दीजिये। इससे मुझे सब कुछ मिल जायगा।' तब महेश्वरने हँसकर कहा—'बेटा! मैंने तुम्हें गङ्गा दे दी। अब तुम उनकी स्तुति करो।' महादेवजीका वचन सुनकर भगीरथने गङ्गाजीकी प्राप्तिके लिये भारी तपस्या की और मनको संयममें रखकर भक्तिपूर्वक गङ्गाका स्तवन किया। बालक होनेपर भी भगीरथने अबालकोचित