भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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पृष्ठ 185
  • सुपर्णा-संगम, पुरूरवस्तीर्थ, पञ्चतीर्थ, शमीतीर्थ, सोम आदि तीर्थोंकी महिमा * १८३

वागीश्वरी देवी आपको विद्या देंगी और रूपवान् अग्निदेव रूप प्रदान करेंगे।

यों कहकर वृद्धाने सरस्वती और अग्निकी प्रार्थना करके गौतमको विद्वान् और सुरूपवान् बना दिया। तब उन्होंने बड़ी प्रसन्नताके साथ वृद्धाको अपनी पत्नी बनाया और कितने ही वर्षोंतक उसके साथ विहार किया। एक दिन वसिष्ठ और वामदेव आदि महर्षि पुण्यतीर्थोंमें भ्रमण करते हुए उस गुफामें आये। गौतम और उनकी पत्नीने वहाँ आये हुए ऋषि-मुनियोंका विधिवत् स्वागत-सत्कार किया। उनमेंसे कुछ लोगोंने गौतमका उपहास करते हुए पूछा—'बूढ़ी माँ! यह तो बताओ, ये गौतम तुम्हारे पुत्र लगते हैं या पोते? कल्याणी! सच-सच बताना। वृद्ध पुरुषके लिये युवती स्त्री विषके समान है और वृद्धा स्त्रीके लिये युवा पुरुष अमृतके समान। प्रिय और अप्रियका संयोग हमने दीर्घकालके पश्चात् यहीं देखा है।' गौतम और उनकी पत्नी दोनों इस परिहासको सुनकर चुप रह गये। आतिथ्य ग्रहण करके सब महर्षि चले गये। उनकी बातोंको याद करके ये दोनों दम्पति बहुत दुःखी हुए। एक दिन स्त्रीसहित गौतमने मुनिवर अगस्त्यजीसे पूछा—'महर्षे ! कौन-सा देश या तीर्थ ऐसा है, जहाँ जानेसे कल्याणकी प्राप्ति होती है?'

अगस्त्यने कहा—ब्रह्मन् ! मैंने मुनियोंके मुखसे सुना है, गोदावरी नदीमें स्नान करनेसे सब कामनाएँ पूर्ण होती हैं।

अगस्त्यकी यह बात सुनकर गौतम उस वृद्धाके साथ गौतमी-तटपर गये और कठोर तपस्या करने लगे। उन्होंने भगवान् शंकर और विष्णुका स्तवन किया तथा पत्नीके लिये गङ्गाजीको भी संतुष्ट किया।

गौतम बोले—शिव ! जिनका हृदय व्यथित है, ऐसे पुरुषोंके लिये संसारमें पार्वतीसहित आप ही शरण हैं—ठीक वैसे ही, जिस प्रकार मरुभूमिके पथिकोंके लिये वृक्ष ही आश्रय होता है। भगवान् श्रीकृष्ण! आप ही छोटे-बड़े सब भूतोंके पापोंका सर्वथा निवारण करनेवाले हैं, जैसे सूखती हुई खेतीको मेघ ही सींचकर हरा-भरा करता है। सुधामयी तरङ्गोंसे सुशोभित गौतमी! तुम वैकुण्ठरूपी दुर्गमें पहुँचनेके लिये सीढ़ी हो। हम अधोगतिमें पड़कर संतप्त हो रहे हैं, माता! तुम हमारे लिये शरण हो जाओ।

सबको शरण देनेवाली गौतमी गङ्गा गौतमके स्तोत्रसे प्रसन्न होकर बोलीं—'ब्रह्मन् ! तुम मन्त्र पढ़ते हुए मेरे जलसे अपनी पत्नीका अभिषेक करो। इससे यह रूपवती हो जायगी। इसके सभी अङ्ग मनोहर होंगे। नेत्रोंमें भी सुन्दरता आ जायगी तथा यह सब प्रकारके शुभ लक्षणोंसे शोभा पाने लगेगी।'

गङ्गाजीके आदेशसे दोनोंने ऐसा ही किया, अतः उनकी कृपासे दोनों पति-पत्नी सुन्दर रूपवाले हो गये। उनके अभिषेकका जो जल था, वह नदीरूपमें परिणत हो गया। वृद्धा नामसे ही उस नदीकी ख्याति हुई। गौतमने जो शिवलिङ्गकी स्थापना की, वह भी वृद्धाके ही नामपर 'वृद्धेश्वर' कहलाया। वहीं मुनिश्रेष्ठ गौतमने वृद्धाके साथ पूर्ण आनन्द प्राप्त किया। तबसे उस तीर्थका नाम 'वृद्धा-संगम' हो गया। वहाँ किया हुआ स्नान और दान सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है।