भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 434 में से

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१८४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


इलातीर्थके आविर्भावकी कथा

ब्रह्माजी कहते हैं—इलातीर्थके नामसे जिस तीर्थकी प्रसिद्धि है, वह मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला, ब्रह्महत्या आदि पापोंको दूर करनेवाला तथा सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। वैवस्वत मनुके वंशमें इल नामक एक राजा हो गये हैं। वे बहुत बड़ी सेना साथ लेकर शिकार खेलनेके लिये वनमें गये। वहाँ उनकी बुद्धिमें कुछ दूसरा ही निश्चय हुआ। उन्होंने अमात्योंसे कहा—'आप सब लोग मेरे पुत्रद्वारा पालित नगरमें चले जायें। देश, कोश, बल, राज्य तथा मेरे पुत्रकी भी रक्षा करें। महर्षि वसिष्ठ भी हमारे लिये पिताके समान हैं। वे भी अग्निहोत्रकी अग्नियोंको लेकर मेरी पत्नियोंके साथ लौट जायें। मैं अभी इस वनमें ही निवास करूँगा।' 'बहुत अच्छा' कहकर सब लोग चले गये और राजा धीरे-धीरे रत्नमय हिमालय पर्वतपर जाकर वहीं निवास करने लगे। एक दिन उन्होंने उस पर्वतपर एक गुफा देखी, जो नाना प्रकारके रत्नोंसे विचित्र शोभा पा रही थी। उस गुफामें यक्षोंका राजा समन्यु रहता था। उसके साथ उसकी पतिव्रता पत्नी समा भी रहा करती थी। उस समय वह यक्ष मृगरूप धारण करके अपनी पत्नीके साथ विचर रहा था। भाँति-भाँतिके रत्नोंसे चित्रित, उसका वह विशाल गृह सूना पड़ा था। अतः राजा अपनी भारी सेनाके साथ वहीं ठहर गये। वह यक्ष अधर्मके कोपसे पत्नीके साथ मृगरूप धारण करके रहता था। उसने सोचा—'इस राजाने मेरा घर छीन लिया। मैं इसे जीत सकता नहीं और यह माँगनेपर देगा नहीं। अब क्या करूँ?' इसी चिन्तामें पड़कर वह मृगीरूपधारिणी अपनी पत्नीसे बोला—'कान्ते! इस राजाका मन मृगयाके व्यसनमें आसक्त है। यह कैसे विपत्तिमें फँसे—इसके लिये कोई उपाय सोचो। मेरा विचार है कि तुम मनोहर मृगीका रूप धारण करके इसके सामनेसे निकलो और इसे अपनी ओर आकृष्ट करके किसी तरह अम्बिका-वनमें पहुँचा दो। उसके भीतर प्रवेश करते ही यह राजा स्त्री हो जायगा। भद्रे! यह काम तुम्हीं कर सकती हो। मेरे लिये यह उचित न होगा।'

यक्षिणीने पूछा—नाथ! अम्बिका-वन तो बड़ा सुन्दर है। तुम उसमें क्यों नहीं जा सकते? यदि तुम भी चले जाओ तो क्या दोष होगा? यह हमें ठीक-ठीक बताओ।

यक्षने कहा—एक समय पार्वतीने एकान्तमें बैठे हुए भगवान् शंकरसे कहा—'देवेश्वर! स्त्रियोंकी यह स्वाभाविक इच्छा होती है कि उनकी रतिक्रीड़ा सदा गुप्त रहे। इसलिये मुझे ऐसा नियत स्थान दीजिये, जो आपकी आज्ञासे सुरक्षित हो। मैं स्थान वही चाहती हूँ, जो उमावनके नामसे प्रसिद्ध है। उसमें आप, गणेश, कार्तिकेय और नन्दीके सिवा जो कोई भी प्रवेश करे, वह स्त्री हो जाय।' शंकरजीने प्रसन्न होकर कहा—'ऐसा ही हो।' इसलिये उमाके उस वनमें मुझे नहीं जाना चाहिये।

अपने स्वामीका यह वचन सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली वह यक्षिणी विशाल नेत्रोंवाली मृगी बनकर राजाके सामने आयी। यक्ष वहीं ठहर गया। राजाने मृगीको देखा। मृगयामें तो उनकी आसक्ति थी ही। मृगीपर दृष्टि पड़ते ही वे अकेले घोड़ेपर जा बैठे और उसका पीछा करने लगे। वह धीरे-धीरे राजाको अम्बिका-वनतक खींच ले गयी। जब घोड़ेपर बैठे-ही-बैठे उमावनमें प्रविष्ट हो गये, तब यक्षिणीने मृगीका

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