भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 434 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 187
  • इलातीर्थके आविर्भावकी कथा * १८५

रूप छोड़कर दिव्य रूप धारण कर लिया और अशोक वृक्षके नीचे खड़ी हो राजाको देखकर हँसने लगी। पतिकी कही हुई बातोंको याद करके वह राजासे बोली—'सुन्दरी इला! तुम अकेली अबला घोड़ेपर चढ़कर पुरुषके वेषमें कहाँ जाती हो, किसके पास जाओगी?' उसके मुखसे 'इला' शब्द सुनकर राजा क्रोधसे मूर्च्छित हो उठे और यक्षिणीको डाँटकर मृगीका पता पूछने लगे। यक्षिणीने पुनः कहा—'इले! इले! अपने-आपको अच्छी तरह देख तो लो, फिर मुझे मिथ्यावादिनी या सत्यवादिनी कहना।' तब राजाने देखा—उनकी छातीमें दो ऊँचे-ऊँचे स्तन उभर आये थे। 'यह मुझे क्या हो गया' यह कहते हुए राजा चकित हो गये। उन्होंने यक्षिणीसे पूछा—'सुव्रते! यह मुझे क्या हो गया—इस बातको आप ठीक-ठीक जानती हैं। अतः बताइये। आप कौन हैं? इसका भी परिचय दीजिये।'

**यक्षिणी बोली—**हिमालयकी श्रेष्ठ गुफामें मेरे पति यक्षराज समन्यु निवास करते हैं। मैं उन्हींकी पत्नी हूँ। जिस शीतल कन्दरामें आप ठहरे हुए हैं, वह हमारा ही घर है। मैं ही मृगी बनकर आपको यहाँतक ले आयी हूँ। यह उमावन है। यहाँके लिये पूर्वकालमें महादेवजी यह वर दे चुके हैं कि जो पुरुष इसमें प्रवेश करेगा, वह स्त्री हो जायगा। अतः आप भी स्त्री हो गये, इससे आपको दुःखी नहीं होना चाहिये। कोई कितना ही प्रौढ़ क्यों न हो, भवितव्यताको कोई नहीं जानता।

इस प्रकार इलाको आश्वासन दे वह सुन्दरी यक्षिणी अन्तर्धान हो गयी। उसने पतिसे सारा हाल कह सुनाया। यक्ष भी यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ। इधर इला गाती और नृत्य करती हुई उमावनमें ही रहने लगी। वह कर्मकी गतिका स्मरण करती हुई स्त्रीस्वभावके अनुसार ही चेष्टा करती थी। एक दिन जब इला नृत्य कर रही थी, बुधने उसे देखा। वे अपने पिताको नमस्कार करनेके लिये जा रहे थे। इलापर दृष्टि पड़ते ही उन्होंने यात्रा स्थगित कर दी और उसके पास आकर कहा—'देवि! तू स्वर्गमें रहकर मेरी प्रिया भार्या हो जा।' इलाने भक्तिपूर्वक बुधकी आज्ञाका अभिनन्दन करके उसे स्वीकार कर लिया। बुध अपने उत्तम स्थानपर ले जाकर इलाके साथ प्रेमपूर्वक विहार करने लगे। उसने भी सब प्रकारकी सेवाओंसे पतिको संतुष्ट किया। इस प्रकार बहुत समय व्यतीत हो जानेपर बुधने प्रसन्न हो अपनी प्रियासे कहा—'कल्याणी! मैं तुझे क्या दूँ? तेरे मनमें जो प्रिय वस्तु हो, उसे माँग ले।' इला सहसा बोल उठी—'पुत्र दीजिये।'

**बुधने कहा—**यह मेरा वीर्य अमोघ तथा प्रेमसे प्रकट हुआ है। अतः तेरे गर्भसे विश्वविख्यात क्षत्रिय-पुत्र उत्पन्न होगा। उससे चन्द्रवंशकी वृद्धि होगी। वह तेजमें सूर्य, बुद्धिमें बृहस्पति, क्षमामें पृथ्वी, युद्धसम्बन्धी पराक्रममें भगवान् विष्णु तथा क्रोधमें अग्निके समान होगा।

समय आनेपर महात्मा बुधका पुत्र उत्पन्न हुआ। उस समय देवलोकमें सब ओर जय-जयकारका शब्द गूँज उठा। उसके जन्मोत्सवमें सभी प्रधान-प्रधान देवता आये। मैं भी बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमें सम्मिलित हुआ। वह बालक जन्म लेते ही उच्च स्वरसे रोया था। अतः वहाँ एकत्रित हुए देवताओं तथा ऋषियोंने एक-दूसरेसे कहा—'इस बालकने पुरु (अत्यन्त उच्च स्वरसे) रव (शब्द) किया है, अतः इसका नाम पुरूरवा होना चाहिये।' सबने संतुष्ट होकर यही नाम रखा। तदनन्तर बुधने अपने पुत्रको क्षत्रियोचित विद्या पढ़ायी और प्रयोगसहित धनुर्वेदका ज्ञान