भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 434 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 215
  • श्रीरामतीर्थकी महिमा * २१३

गौतमी ब्रह्मा, विष्णु और शिवके लिये भी माननीय तथा वन्दनीय है।

श्रीराम बोले—अहो, गङ्गाका कैसा अद्भुत प्रभाव है! तीनों लोकोंमें इनकी कहीं उपमा नहीं है। हम धन्य हैं कि इन त्रिभुवनपावनी गङ्गाका दर्शन पा सके।

यों कहकर श्रीरामने बड़े हर्षके साथ महादेवजीकी स्थापना की और यत्नपूर्वक षोडशोपचारसे छत्तीस कलाओंवाले महादेवजीकी आवरणसहित पूजा करके हाथ जोड़ उनकी स्तुति करने लगे।

श्रीराम बोले—मैं पुराणपुरुष शम्भुको नमस्कार करता हूँ। जिनकी असीम सत्ताका कहीं पार या अन्त नहीं है, उन सर्वज्ञ शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। अविनाशी प्रभु रुद्रको नमस्कार करता हूँ। सबका संहार करनेवाले शर्वको मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ। अविनाशी परमदेवको नमस्कार करता हूँ। लोकगुरु उमापतिको प्रणाम करता हूँ। दरिद्रताका विनाश करनेवाले शिवको नमस्कार करता हूँ। रोगोंका अपहरण करनेवाले महेश्वरको प्रणाम करता हूँ। जिनका रूप चिन्तनका विषय नहीं है, उन कल्याणमय शिवको नमस्कार करता हूँ। विश्वकी उत्पत्तिके बीजभूत भगवान् भवको प्रणाम करता हूँ। जगत्‌का पालन करनेवाले परमात्माको नमस्कार करता हूँ। संहारकारी रुद्रको बारंबार प्रणाम करता हूँ। पार्वतीजीके प्रियतम अविनाशी प्रभुको नमस्कार करता हूँ। नित्य, क्षर-अक्षरस्वरूप शंकरको प्रणाम करता हूँ। जिनका स्वरूप चिन्मय है और अप्रमेय है, उन भगवान् त्रिलोचनको मैं मस्तक झुकाकर बारंबार नमस्कार करता हूँ। करुणा करनेवाले भगवान् शिवको प्रणाम करता हूँ तथा संसारको भय देनेवाले भगवान् भूतनाथको सर्वदा नमस्कार करता हूँ। मनोवाञ्छित फलोंके दाता महेश्वरको प्रणाम करता हूँ। भगवती उमाके स्वामी श्रीसोमनाथको नमस्कार करता हूँ। तीनों वेद जिनके तीन नेत्र हैं, उन त्रिलोचनको प्रणाम करता हूँ। त्रिविध मूर्तिसे रहित सदा शिवको नमस्कार करता हूँ। पुण्यमय शिवको प्रणाम करता हूँ। सत्-असत्‌से पृथक् परमात्माको नमस्कार करता हूँ। पापोंका अपहरण करनेवाले भगवान् हरको प्रणाम करता हूँ। जो सम्पूर्ण विश्वके हितमें लगे रहते हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार करता हूँ। जो बहुत-से रूप धारण करते हैं, उन भगवान् शंकरको प्रणाम करता हूँ। जो संसारके रक्षक तथा सत् और असत्‌के निर्माता हैं, उन्हें नमस्कार करता हूँ। जो सम्पूर्ण विश्वके स्वामी हैं, उन विश्वनाथको प्रणाम करता हूँ। हव्य-कव्यस्वरूप यज्ञेश्वरको नमस्कार करता हूँ। सम्पूर्ण लोकोंका सर्वदा कल्याण करनेवाले जो भगवान् शिव आराधना करनेपर उत्तम गति एवं सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करते हैं, उन दानप्रिय इष्टदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। भगवान् सोमनाथको प्रणाम करता हूँ। जो स्वतन्त्र न रहकर भक्तोंके पराधीन रहते हैं, उन विजयशील उमानाथको मैं नमस्कार करता हूँ। विघ्नराज गणेश तथा नन्दीके स्वामी पुत्रप्रिय भगवान् शिवको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ। संसारके दुःख और शोकका नाश करनेवाले देवता भगवान् चन्द्रशेखरको मैं बारंबार नमस्कार करता हूँ। जो स्तुति करने योग्य और मस्तकपर गङ्गाको धारण करनेवाले हैं, उन महेश्वरको नमस्कार करता हूँ। देवताओंमें श्रेष्ठ उमापतिको प्रणाम करता हूँ। ब्रह्मा आदि ईश्वर, इन्द्र आदि देवता तथा असुर भी जिनके चरण-कमलोंकी पूजा करते हैं, उन भगवान्‌को मैं नमस्कार करता हूँ। जिन्होंने पार्वतीदेवीके मुखसे निकलनेवाले वचनोंपर दृष्टिपात करनेके लिये मानो तीन नेत्र धारण कर रखे हैं,

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण · पृष्ठ 215, कुल 434 में से · BharatKosha