भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२१४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


उन भगवान्को प्रणाम करता हूँ। पञ्चामृत, चन्दन, उत्तम धूप, दीप, भाँति-भाँतिके विचित्र पुष्प, मन्त्र तथा अन्न आदि समस्त उपचारोंसे पूजित भगवान् सोमको मैं नमस्कार करता हूँ।

तदनन्तर भगवान् शंकरने प्रकट होकर श्रीराम और लक्ष्मणसे कहा—'तुम्हारा कल्याण हो, वर माँगो।'

**श्रीराम बोले—**सुरश्रेष्ठ! महेश्वर! जो लोग इस स्तोत्रके द्वारा भक्तिपूर्वक आपकी स्तुति करें, उनके सम्पूर्ण कार्य सिद्ध हो जायँ। शम्भो! जिनके पितर नरकके समुद्रमें डूबे हों, उनके वे पितर यहाँ पिण्ड आदि देनेसे पवित्र हो स्वर्गलोकमें चले जायँ। जन्मभरके कमाये हुए मानसिक, वाचिक और शारीरिक पाप यहाँ स्नान करनेमात्रसे तत्काल नष्ट हो जायँ। जो लोग यहाँ याचकोंको भक्तिपूर्वक थोड़ा भी दान दें, वह सब अक्षय होकर दाताओंके लिये उत्तम फल देनेवाला हो।

यह सुनकर शंकरजी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने 'एवमस्तु' कहकर श्रीरामचन्द्रकी बातका अनुमोदन किया। सुरश्रेष्ठ भगवान् शिवके अन्तर्धान हो जानेपर श्रीराम अपने अनुगामियोंके साथ धीरे-धीरे उस प्रदेशमें गये, जहाँसे गोदावरी नदी प्रकट हुई हैं। तबसे वह तीर्थ श्रीरामतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। जहाँ लक्ष्मणने स्नान और शंकरका पूजन किया, वह लक्ष्मणतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ और जहाँ सीताने स्नानादि किया, वह सीतातीर्थके नामसे कहलाया। सीतातीर्थ नाना प्रकारकी समस्त पापराशिको निर्मूल करनेमें समर्थ है। जिसके चरणोंसे त्रिभुवनपावनी गङ्गा प्रकट हुईं, उन्होंने ही जहाँ स्नान किया, उस तीर्थकी विशिष्टताके विषयमें क्या कहा जा सकता है। अतः श्रीरामतीर्थके समान कहीं कोई भी तीर्थ नहीं है।

पुत्रतीर्थकी महिमा

**ब्रह्माजी कहते हैं—**गौतमी-तटपर जो विख्यात पुत्रतीर्थ है, वह पुण्यतीर्थ कहलाता है। उसकी महिमाके श्रवणमात्रसे मनुष्य सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है। नारद! मैं उसके स्वरूपका वर्णन करता हूँ, सावधान होकर सुनो। जब दिति एवं दनुके पुत्र दैत्य और दानवोंका देवताओंद्वारा क्षय होने लगा, तब दिति पुत्र-वियोगके दुःखसे मनमें स्पर्धा लेकर अपनी बहन दनुके पास आयी और इस प्रकार कहने लगी—'भद्रे! हम दोनोंके ही पुत्र क्षीण होते जा रहे हैं। हम संसारमें कौन ऐसा गुरुतर कार्य करें, जिससे हमारा यह संकट दूर हो। देखो, अदितिका वंश कितना संगठित और उत्तम है। उसका कभी क्षय नहीं होता। वह उत्तम राज्य, सुयश और विजय-लक्ष्मीसे सुशोभित है। अदितिकी संतानोंका वैभव और अभ्युदय देखकर मैं दुबली होती जा रही हूँ। सम्भव है, जीवित न रह सकूँ। अदितिके महान् ऐश्वर्यपर दृष्टि डालते ही मैं अवर्णनीय दुरवस्थाका अनुभव करने लगती हूँ। दावानलमें प्रवेश कर जाना भी सुखद है, किंतु स्वप्नमें भी सौतकी समृद्धि नहीं देखी जाती।

**दनु बोली—**भद्रे! तुम अपने गुणोंसे पतिदेव कश्यपजीको संतुष्ट करो। यदि स्वामी संतुष्ट हो गये तो तुम सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लोगी।

'बहुत अच्छा' कहकर दितिने सब प्रकारसे कश्यपजीको संतुष्ट किया। तब प्रजापति भगवान् कश्यपने दितिसे कहा-'सुव्रते! तुम्हें क्या दूँ? तुम कोई अभीष्ट वर माँगो।' यह सुनकर दितिने स्वामीसे कहा—'नाथ! मुझे ऐसा पुत्र दीजिये, जो