संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- पुत्रतीर्थकी महिमा * २१५
अनेक गुणोंसे सम्पन्न, विश्वविजयी और जगद्वन्द्य हो तथा जिसके जन्म लेनेसे मैं संसारमें वीरजननी कहला सकूँ।' कश्यपजीने कहा—'देवि! मैं तुम्हें एक श्रेष्ठ व्रतका उपदेश करता हूँ, जो बारह वर्षोंतक पालन करनेके बाद फल देता है। उसके बाद आकर तुम्हारे मनके अनुकूल गर्भका आधान करूँगा, क्योंकि व्रत आदिके द्वारा निष्पाप हो जानेपर ही सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध होते हैं।'
पतिका यह वचन सुनकर दितिको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने कश्यपजीको नमस्कार करके उनके बताये हुए व्रतका विधिपूर्वक पालन किया। जो लोग तीर्थोंकी सेवा, सुपात्रोंको दान तथा व्रतका पालन आदि नहीं करते, वे अपनी अभीष्ट वस्तुओंको कैसे प्राप्त कर सकते हैं। दितिका व्रत पूरा होनेपर कश्यपजीने गर्भाधान किया और एकान्तमें अपनी प्रिय पत्नी दितिसे कहा—'शुचिस्मिते! तपस्वी मुनि भी विहित कर्मकी अवहेलना करनेसे मनोवाञ्छित पदार्थ नहीं पा सकते। अतः तुम्हें कोई निन्दित कर्म नहीं करना चाहिये। दोनों संध्याओंके समय सोना, कहीं जाना अथवा बाल खोले रहना निषिद्ध है। संध्याकाल भूतोंसे व्याप्त रहता है। अतः उस समय छींकना, जँभाई लेना तथा भोजन करना भी मना है। ये सब कार्य सदा ओटमें ही करने चाहिये। विशेषतः हँसना तो दूसरोंके सामने हो ही नहीं। संध्याकालमें कभी कमरेके भीतर न रहे। प्रिये! मूसल, ऊखल, सूप, पीढ़ा और ढक्कन आदिको दिन या रातमें कभी न लाँघना। उत्तरकी ओर सिरहाना करके तथा संध्याकालमें कभी न सोना। झूठ न बोलना। दूसरोंके घर न जाना। पतिके सिवा और किसी पुरुषपर कहीं भी दृष्टि न डालना। यदि निरन्तर इन नियमोंका पालन करती रहोगी तो तुम्हारा पुत्र त्रिभुवनके ऐश्वर्यका भागी होगा।' दितिने स्वामीके समक्ष प्रतिज्ञा की—'मैं इन नियमोंका ठीक-ठीक पालन करूँगी।' फिर कश्यपजी देवताओंके यहाँ चले गये। इधर दितिका पुण्यजनित बलवान् गर्भ दिनोंदिन बढ़ने लगा। इन सब बातोंको मय नामक दैत्य अपनी मायाके बलसे जानता था। उसकी इन्द्रसे मित्रता थी। दोनोंमें बड़ा प्रेम था। उसने इन्द्रके पास एकान्तमें जाकर विनयपूर्वक कहा—'दिति और दनुने विशेष अभिप्रायसे कश्यपजीको संतुष्ट किया है। दितिका गर्भ दिनोंदिन बढ़ता है, उसमें नाना प्रकारकी शक्तियाँ हैं।'
**नारदजीने पूछा—**देवेश्वर! महाबली मय नामक दैत्य तो नमुचिका प्रिय भ्राता है और नमुचि इन्द्रके हाथसे मारा गया था। फिर उसकी अपने भाईके शत्रुसे मित्रता कैसे हुई?
**ब्रह्माजी बोले—**पूर्वकालमें नमुचि दैत्योंका राजा था, उसका इन्द्रके साथ बड़ा भयंकर वैर हुआ। एक समयकी बात है—इन्द्र युद्ध छोड़कर कहीं जा रहे थे। यह देखकर दैत्यराज नमुचि भी उनके पीछे लग गया। उसे आगे देख इन्द्र भयसे व्याकुल हो गये और ऐरावत हाथीको छोड़कर समुद्रके फेनमें घुस गये। फिर वज्रमें फेन लपेटकर उस फेनसे ही इन्द्रने अपने शत्रुका संहार कर डाला। जब नमुचिकी मृत्यु हो गयी तब उसके छोटे भाई मयने अपने बड़े भाईके घातकका विनाश करनेके लिये बड़ी भारी तपस्या की। उसने अनेक प्रकारकी माया प्राप्त की, जो देवताओंके लिये अत्यन्त भयंकर थी। उसने सम्पूर्ण लोकोंको शरण देनेवाले भगवान् विष्णुसे भी वर प्राप्त किया। मय दानी और प्रियभाषी था। उसने इन्द्रको जीतनेके लिये अग्नि और ब्राह्मणोंका पूजन आरम्भ किया। वह याचकोंको मुँहमाँगी वस्तुएँ देने लगा। वन्दीजन सदा उसकी स्तुति करते थे। इन्द्रने वायुसे अपने मायावी शत्रु मयकी गति-विधि जान ली। तब वे