संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
ब्राह्मणका वेष बनाकर उसके पास गये और बोले—'दैत्यराज ! मैं याचक हूँ, मुझे मनोवाञ्छित वर दीजिये। मैंने सुना है—आप दाताओंके सिरमौर हैं। अतः आपके पास आया हूँ।' मयने उन्हें ब्राह्मण जानकर कहा—'दिया हुआ ही समझो। सामने याचकको पाकर दाता यह विचार नहीं करते कि थोड़ा दूँ या अधिक।' उसके यों कहनेपर इन्द्र बोले—'मैं तुम्हारे साथ मित्रता चाहता हूँ।' यह सुनकर मय दैत्यने कहा—'विप्रवर! ऐसे वरसे क्या लाभ। आपके साथ मेरा वैर तो है नहीं।' तब इन्द्रने अपने वास्तविक रूपको प्रकट किया। इन्द्रको पहचानकर मयके मनमें बड़ा विस्मय हुआ। 'सखे! यह क्या बात है? तुम तो वज्रधारी हो। तुम्हारे योग्य यह कार्य नहीं है।' इन्द्रने हँसकर मयको हृदयसे लगाया और कहा—'विद्वान् पुरुष किसी भी उपायसे अपने अभीष्ट कार्यकी सिद्धि करते हैं।' तबसे मयके साथ इन्द्रकी गहरी मैत्री हो गयी। मय सदाके लिये इन्द्रका हितैषी हो गया। उसने इन्द्रभवनमें जाकर सब बातें बतायीं, साथ ही इन्द्रको माया भी प्रदान की। इन्द्रने प्रसन्न होकर पूछा—'मय! बताओ, अब मुझे क्या करना चाहिये?'
मयने कहा—अगस्त्यके आश्रमपर जाओ। वहीं गर्भवती दिति रहती है। उसकी सेवा करते हुए आश्रममें कुछ दिन निवास करो; फिर अवसर देखकर वज्र हाथमें लिये दितिके गर्भमें प्रवेश कर जाओ और वज्रसे उस बढ़ते हुए गर्भके टुकड़े-टुकड़े कर डालो। इससे तुम्हारे उस शत्रुका अस्तित्व ही मिट जायगा।
इन्द्रने 'बहुत अच्छा' कहकर मयकी प्रशंसा की और विनीतकी भाँति माता दितिके पास गये। वहाँ जाकर दैत्यमाताकी सेवा-शुश्रूषामें लग गये। उनके मनमें क्या है, इस बातको दिति नहीं जानती थीं। उनके गर्भमें जो मुनिका अमोघ तेज था, वह किसीके लिये भी दुर्धर्ष था। इन्द्र गर्भके भीतर प्रवेश करनेकी इच्छासे अवसरकी प्रतीक्षा करते हुए बहुत समयतक वहाँ रहे। एक दिन दिति संध्याकालमें उत्तरकी ओर सिरहाना करके सो रही। इन्द्रने मनमें कहा—'यही अच्छा अवसर है।' यों कहकर वे वज्र हाथमें ले दितिके उदरमें प्रवेश कर गये। गर्भमें जो बालक था, वह आयुध लिये मारनेकी इच्छासे आये हुए इन्द्रको देखकर भी भयभीत न हुआ और बोला—'वज्रधारी इन्द्र! मैं तुम्हारा भाई हूँ। तुम मेरी रक्षा क्यों नहीं करते? क्या मुझे मारना चाहते हो? युद्धके बिना अन्य अवसरपर किसीको मारनेसे बढ़कर दूसरा कोई पातक नहीं है। मैं गर्भसे निकलूँ, तब मुझसे युद्ध कर लेना। यहाँ आकर इस प्रकार मारना तुम्हारे लिये उचित नहीं होगा। बड़े लोग विपत्तिमें पड़नेपर भी कुमार्गपर पैर नहीं रखते। मैंने न तो अभी विद्या पढ़ी है, न शस्त्र चलाना सीखा है और न आयुधोंका ही संग्रह किया है। तुम विद्वान् हो। तुम्हारे हाथमें वज्र शोभा पा रहा है। क्या मुझे मारते समय तुम्हें लज्जा नहीं आती? कुलीन पुरुष कभी भी कुत्सित कर्म नहीं करते। मुझे मारनेसे तुम्हें क्या मिलेगा, यश अथवा पुण्य? गर्भमें आये हुए प्राणी इच्छानुसार मारे जा सकते हैं, किंतु इसमें कौन-सा पुरुषार्थ है। भाई! यदि तुम्हें युद्धसे प्रेम है और मुझसे ही भिड़ना चाहते हो तो निःसंदेह चले आओ।' यों कहकर वह बालक भी इन्द्रकी ओर मुक्का तानकर खड़ा हो गया और बोला—'इन्द्र! मुझे मारनेसे तुम बालघाती, ब्रह्मघाती तथा विश्वासघाती कहलाओगे। यही तुम्हें फल मिलेगा। फिर किसलिये मुझे मारनेको उद्यत हुए हो। सम्पूर्ण चराचर जगत् जिसकी आज्ञाके अधीन चल रहा