संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- पुत्रतीर्थकी महिमा * २१७
हो, वह मुझ-जैसे बालककी हत्या करे— इसमें कौन-सा यश और क्या पुरुषार्थ है?'
गर्भका बालक यों ही कहता रहा, किंतु इन्द्रने अपने वज्रसे उस बालकके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। सच है, क्रोधान्ध और लोभी मनुष्योंको किसीपर भी दया नहीं आती। इतनेपर भी गर्भस्थ बालककी मृत्यु नहीं हुई। सभी टुकड़े जीवित बालकोंके रूपमें परिणत हो गये और दुःखसे रोते हुए बोले—'क्यों मारते हो, हम तुम्हारे भाई हैं।' किंतु इन्द्रने एक न सुनी, उन खण्डोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले। वे भी जीवित होकर बोले—'इन्द्र! हमें न मारो। हम तुमपर विश्वास करते हैं, माताके गर्भमें पड़े हैं और तुम्हारे ही भाई हैं।' परंतु कौन सुनता था। जिनकी बुद्धि द्वेषसे नष्ट हो गयी है, उनके चित्तमें करुणाका एक कण भी नहीं रह जाता। गर्भके सभी टुकड़े हाथ-पैर तथा नूतन जीवसे युक्त हो गये! उनमें किसी प्रकारका विकार नहीं रह गया। उनकी संख्या एकसे बढ़कर उनचास हो गयी। यह देखकर इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। वे सब-के-सब रो रहे थे। इन्द्रने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—'मा रुत' (मत रोओ)। इनके ऐसा कहनेसे उनका नाम मरुत् हो गया। वे गर्भमें ही अत्यन्त बलवान् और महापराक्रमी हो गये थे। उन्होंने गर्भके भीतरसे ही मुनिवर अगस्त्यको, जिनके आश्रममें माता टिकी हुई थी, पुकारकर कहा—'मुने! हमारे पिता आपके भाई हैं। वे आपकी मैत्रीका बहुत आदर करते हैं। हम यह भी जानते हैं कि आपके मनमें हमलोगोंके प्रति बड़ा स्नेह है; तथापि आपके रहते हुए यह वज्रधारी इन्द्र ऐसे कार्यमें प्रवृत्त हुआ है, जिसे कोई चाण्डाल भी नहीं करता।' गर्भके बालकोंकी वह पुकार सुनकर अगस्त्य मुनि दौड़े हुए आये। उन्होंने दितिको जगाया। वे गर्भकी वेदनासे पीड़ित थीं। उस समय अगस्त्यने अत्यन्त कुपित होकर शचीपति इन्द्रको शाप दिया—'इन्द्र! संग्राममें शत्रु तुम्हारी पीठ देखेंगे।' दितिने भी गर्भमें समाये हुए इन्द्रको रोषपूर्वक शाप दिया—'तूने बच्चोंको मारकर कोई पुरुषार्थ नहीं किया है; अतः मैं शाप देती हूँ कि तू राज्यसे भ्रष्ट हो जायगा।' इसी समय वहाँ प्रजापति कश्यपजी भी आ पहुँचे। अगस्त्यके मुखसे इन्द्रकी यह कुत्सित चेष्टा सुनकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ।
कश्यपजीने कहा— बेटा! गर्भके बाहर निकलो। तुमने यह क्या पाप कर डाला। उत्तम कुलमें उत्पन्न पुरुष कभी पापमें मन नहीं लगाते।
पिताका आदेश सुनकर वज्रधारी इन्द्र गर्भसे बाहर निकले। उस समय लज्जाके मारे उनका मुँह नीचा हो रहा था। वे बोले—'पिताजी! जिस साधनसे मेरा कल्याण हो, वह बताइये। मैं उसे अवश्य करूँगा।' तब कश्यपजी लोकपालोंके साथ मेरे पास आये और सब बातें बताकर पूछने लगे—'दितिके गर्भकी शान्ति, गर्भस्थ बालकोंकी इन्द्रके साथ मित्रता, उन बालकोंकी नीरोगता, इन्द्रकी निर्दोषता तथा अगस्त्यके दिये हुए शापका क्रमशः उद्धार कैसे हो?' तब मैंने कश्यपसे कहा—'प्रजापते! तुम वसुओं, लोकपालों तथा इन्द्रको साथ लेकर शीघ्र ही गौतमी नदीके तटपर जाओ और वहाँ स्नान करके सबके साथ महादेवजीकी स्तुति करो। फिर शिवकी कृपासे सब कल्याण ही होगा।' 'अच्छा, ऐसा ही करूँगा' यों कहकर कश्यप मुनि गौतमी नदीके तटपर गये और देवेश्वर भगवान् शिवकी स्तुति करने लगे। समस्त दुःखोंको दूर करनेके लिये दो ही देवता समर्थ बताये गये हैं—एक तो परम पवित्र गौतमी नदी और दूसरे करुणानिधि शिव।