भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* यम, आग्नेय, कपोत और उलूक-तीर्थकी महिमा * २१९

करें। देववन्द्य! संतानकी प्राप्ति संसारमें दुर्लभ है। विशेषतः माताके लिये पुत्रका होना और भी प्रिय है। पुत्र भी यदि गुणवान्, धनवान् और आयुष्मान् हुआ, तब तो कहना ही क्या है। इहलोक और परलोकमें उत्तम फलकी इच्छा रखनेवाले सभी प्राणियोंको गुणवान् पुत्रकी प्राप्ति सदा ही अभीष्ट है। अतः यहाँ स्नान करनेसे इस दुर्लभ फलकी प्राप्ति हो सके—ऐसा अनुग्रह कीजिये।

भगवान् शंकर बोले—निःसंतान होना बहुत बड़े पापका फल है। स्त्री या पुरुष—कोई भी यदि निःसंतान हो तो यहाँ स्नान करनेमात्रसे उसके इस दोषका नाश हो जाता है। जो इस स्तोत्रका पाठ करेगा, उसे यहाँ स्नान करनेका फल प्राप्त होगा। जो तीन मासतक यहाँ स्नान और दान करता है, उसे पुत्रकी प्राप्ति होती है। पुत्रहीन स्त्री यहाँ स्नान करके पुत्र पा सकती है। ऋतुस्नाता स्त्री यदि यहाँ आकर स्नान करे तो उसे अनेकों पुत्र प्राप्त होते हैं। वह तीन महीनेके भीतर ही गर्भवती हो जाती है। जो पितृदोषसे तथा धन अपहरण करनेके दोषसे पुत्र-लाभसे वञ्चित हैं, उनके लिये यह गौतमी नदी परम उद्धारका कारण है। यहाँ पितरोंको पिण्डदान देने, तर्पण करने तथा कुछ सुवर्ण-दान करनेसे निश्चय ही पुत्र होता है। जो धरोहर हड़प लेते, रत्नोंकी चोरी करते तथा पितरोंका श्राद्ध-कर्म छोड़ देते हैं, उनके वंशकी वृद्धि नहीं होती।* जो पाप करके उसका प्रायश्चित्त किये बिना ही मर जाते हैं, उन सबकी यही गति होती है। जो तीर्थोंका सेवन करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं, उन्हें श्रेष्ठ संतानकी प्राप्ति होती है। जो दिति और गङ्गाके संगममें स्नान करके अनादि, अपार, अजय, सच्चिदानन्दमय, लिङ्गस्वरूप, ज्योतिर्मय तथा अनामय महादेव भगवान् सिद्धेश्वरका अनेक उपचारोंसे भक्तिपूर्वक पूजन करता है, चतुर्दशी और अष्टमीको इस स्तोत्रद्वारा स्तुति करता है तथा यहाँ गङ्गाके तटपर ब्राह्मणोंको अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्ण देता और भोजन कराता है, उसे अनेक पुत्र प्राप्त होते हैं। वह सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंको प्राप्त करके अन्तमें भगवान् शिवके धाममें जाता है। जो इस स्तोत्रके द्वारा कहीं भी मेरी छः महीने स्तुति करता है, उसे पुत्र प्राप्त होता है। यदि उसकी स्त्री वन्ध्या हो तो भी वह निःसंदेह पुत्रवती होती है।

तबसे उस तीर्थका नाम पुत्रतीर्थ हो गया। वहाँ स्नान-दान आदि करनेसे समस्त कामनाओंकी पूर्ति होती है। मरुद्गणोंके साथ मैत्री होनेके कारण उसे मित्रतीर्थ भी कहते हैं। यहाँ स्नान करनेसे इन्द्र निष्पाप हुए थे, इसलिये वह इन्द्रतीर्थ या शक्रतीर्थ भी कहलाता है। जहाँ इन्द्रको अपनी खोयी हुई लक्ष्मी प्राप्त हुई, वह कमलातीर्थ कहलाया। ये सब तीर्थ समस्त अभीष्ट पदार्थोंको देनेवाले हैं। भगवान् शिव यह कहकर कि 'यहाँ सब कामनाएँ पूर्ण होंगी' अन्तर्धान हो गये और कश्यप आदि सब लोग कृतकृत्य होकर जैसे आये थे, वैसे लौट गये।

यम, आग्नेय, कपोत और उलूक-तीर्थकी महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं— यमतीर्थ पितरोंकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है। वह प्रत्यक्ष और परोक्ष—सब प्रकारकी अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है। सम्पूर्ण देवता और मुनि उस तीर्थका सेवन करते हैं। मैं उसके प्रभावका वर्णन करता हूँ, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। एक बलवान् कपोत था, जो


* ये न्यासाद्यपहर्तारो रत्नापह्रवकारकाः। श्राद्धकर्मविहीनाश्च तेषां वंशो न वर्द्धते॥ (१२४।१३०)