संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
अनुह्लादके नामसे विख्यात था। उसकी पत्नी हेति नामकी यक्षिणी थी, जो इच्छानुसार रूप धारण कर सकती थी। अनुह्लाद मृत्युके पुत्रका पुत्र था और हेति मृत्युकी पुत्रीकी पुत्री थी। समयानुसार उन दोनोंके भी अनेक पुत्र-पौत्र हुए। पक्षियोंका राजा उलूक अनुह्लादका प्रबल शत्रु था। गङ्गाके उत्तर-तटपर कपोतका आश्रम था और दक्षिण किनारे पक्षिराज उलूक रहता था। उलूक भी अपने पुत्र-पौत्रोंके साथ निवास करता था। कपोत और उलूक दोनों बहुत समयतक एक-दूसरेके विरोधी होकर युद्ध करते रहे। दोनों ही अपने पुत्र-पौत्रोंको साथ लेकर लड़ते थे। यह बलवान् शत्रुओंके साथ बलवानोंका युद्ध था। उनमेंसे उलूक अथवा कपोत—किसीकी भी जय-पराजय नहीं होती थी। कपोतने यमराज तथा अपने पितामह मृत्युकी आराधना करके याम्यास्त्र प्राप्त किया, अतः वह सबसे अधिक शक्तिशाली हो गया। इसी प्रकार उलूक भी अग्निकी आराधना करके अत्यन्त बलवान् हो गया। वर पाकर दोनों ही उन्मत्त हो गये थे, अतः फिर उनमें बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया। उसमें उलूकने कपोतके ऊपर आग्नेयास्त्रका प्रहार किया। कपोतने भी उलूकपर यमपाश तथा यमदण्डका प्रयोग किया। कपोतकी स्त्री हेति बड़ी पतिव्रता थी। उस महायुद्धमें अपने स्वामीके निकट अग्निको प्रज्वलित देख वह दुःखसे विह्वल हो गयी। विशेषतः पुत्रोंको अग्निसे आवृत देख उसकी व्याकुलता और भी बढ़ गयी। उसने अग्निदेवके पास जाकर नाना प्रकारकी उक्तियोंसे स्तवन करना आरम्भ किया।
हेति बोली—जिनका रूप और दान प्रत्यक्ष है, सम्पूर्ण पदार्थ जिनके आत्मस्वरूप हैं और देवता जिनके द्वारा हवनीय पदार्थोंका भोजन करते हैं, उन यज्ञभोक्ता स्वाहापति अग्निको मैं नमस्कार करती हूँ। जो देवताओंके मुख, देवताओंके हविष्यको वहन करनेवाले, देवताओंके होता और देवताओंके दूत हैं, उन आदिदेव भगवान् अग्निकी मैं शरण लेती हूँ। जो शरीरके भीतर प्राणरूपमें स्थित हैं और बाहर अन्नदातारूपमें विद्यमान हैं तथा जो यज्ञके साधन हैं, उन धनंजय (अग्निदेव)-की मैं शरण लेती हूँ।*
अग्नि बोले—पतिव्रते! मेरा यह अस्त्र अमोघ है; अतः जिस लक्ष्यपर इसका विश्राम हो सके, उसको बताओ।
कपोतीने कहा—अग्निदेव! आपका अस्त्र मुझपर ही विश्राम करे, मेरे पुत्र और पतिपर नहीं। मुझे मारकर आप सत्यवादी हों। आपको नमस्कार है।
अग्निदेवने कहा—पतिव्रते! तुम्हारे सुवचन और पतिभक्तिसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ। तुम्हारे स्वामी और पुत्रोंका अनिष्ट नहीं होगा। मैं उनकी रक्षाका वचन देता हूँ। यह मेरा आग्नेयास्त्र तुम्हारे पतिको, पुत्रोंको तथा तुमको भी नहीं जलायेगा; अतः तुम सुखपूर्वक लौट जाओ।
इसी बीचमें उलूकीने भी अपने पतिको देखा।
* रूपं न दानं न परोक्षमस्ति यस्यात्मभूतं च पदार्थजातम्।
अश्नन्ति हव्यानि च येन देवाः स्वाहापतिं यज्ञभुजं नमस्ये॥
मुखभूतं च देवानां देवानां हव्यवाहनम्। होतारं चापि देवानां देवानां दूतमेव च॥
तं देवं शरणं यामि आदिदेवं विभावसुम्।
अन्तःस्थितः प्राणरूपो बहिश्चान्नप्रदो हि यः। यो यज्ञसाधनं यामि शरणं तं धनंजयम्॥
(१२५।१५—१७)