संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* तपस्तीर्थ, इन्द्रतीर्थ और वृषाकपि एवं अब्जकतीर्थकी महिमा * २२३
हुआ। एक पक्ष कहता था, जल श्रेष्ठ है और दूसरे पक्षके लोग अग्निकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करते थे। अग्निकी श्रेष्ठता बतलानेवाले अपनी युक्तियाँ इस प्रकार उपस्थित करते थे—'अग्निके बिना जीवन कहाँ रह सकता है, क्योंकि अग्नि ही जीवरूप है। आत्मा और हविष्य भी वही है। अग्निसे ही समस्त जगत्की उत्पत्ति होती है। अग्निने समस्त विश्वको धारण कर रखा है। अग्नि ही ज्योतिर्मय जगत् है। अतः अग्निसे बढ़कर दूसरा कोई भी अत्यन्त पावन देवता नहीं है। अग्निको ही अन्तर्ज्योति तथा परमज्योति कहते हैं। अग्निके बिना कोई भी वस्तु नहीं है। यह त्रिलोकी अग्निका धाम है। इसलिये पाँचों भूतोंमें अग्निसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है। नारीकी योनिमें पुरुष जो वीर्य स्थापित करता है और उसमें जो देह आदिके निर्माणकी शक्ति होती है, वह सब अग्निकी ही है। अग्नि देवताओंका मुख है; अतः उससे बड़ा कुछ भी नहीं है।'
दूसरे वेदवादी पुरुष जलको श्रेष्ठ मानते थे। उनका कहना था—'जलसे ही अन्नकी उत्पत्ति होती है तथा जलसे ही मनुष्य शुद्ध होता है। जलने ही सबको धारण कर रखा है, अतः जलको माता माना गया है। पुराणवेत्ताओंका कथन है कि जल ही तीनों लोकोंका जीवन है। जलसे ही अमृत उत्पन्न हुआ है और जलसे ही ओषधियाँ होती हैं।' इस प्रकार एक पक्ष अग्निको श्रेष्ठ कहता था और दूसरा पक्ष जलको। यों ही मीमांसा करते हुए एक-दूसरेके विरुद्ध तर्क उपस्थित करनेवाले वेदवादी ऋषि मेरे पास आकर बोले—'भगवन्! आप तीनों लोकोंके प्रभु हैं। बतलाइये, अग्नि श्रेष्ठ है या जल?' मैंने कहा—'दोनों ही इस जगत्में परम पूजनीय हैं। दोनोंसे जगत् उत्पन्न होता है। दोनोंसे हव्य-कव्य और अमृतका प्राकट्य होता है। दोनोंसे ही जीवन है। दोनों ही शरीरको धारण करनेवाले हैं। इनमें परस्पर कोई विशेषता नहीं है। दोनों समानरूपसे ही श्रेष्ठ माने गये हैं।'
मेरे कथनसे यह बात सिद्ध हुई कि दोनों ही श्रेष्ठ हैं, कोई एक नहीं; परंतु वे ऋषि ऐसा ही मानते थे कि इन दोनोंमेंसे एक ही श्रेष्ठ है। अतः उन्हें मेरी बातोंसे संतोष नहीं हुआ। तब वे क्षीरसागरमें शयन करनेवाले शङ्ख-चक्र-गदाधारी भगवान् विष्णुके पास गये और नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे उनकी स्तुति करने लगे।
ऋषि बोले—जो भविष्यमें होनेवाला है, जो जन्म ले चुका है तथा जो अभी गुहा (गर्भ)-में प्रविष्ट हुआ है, उस सम्पूर्ण भुवनको जो सदा अपनी ज्ञानदृष्टिमें रखते हैं, यह चित्र-विचित्र रूपोंवाली समस्त त्रिलोकी अन्तमें जिनके भीतर लीन होती है, जिन्हें महर्षिगण अक्षर, सनातन, अप्रमेय तथा वेदवेद्य बतलाते हैं, जिनकी शरणमें गये हुए प्राणी अपने अभीष्ट पदार्थको प्राप्त कर लेते हैं, उन परमार्थवस्तुरूप परमेश्वरकी हम शरण लेते हैं। जगन्निवास! महाभूतमय जगत्में जो भूत सबसे प्रधान और श्रीविष्णुका स्वरूप है, जिसे योगी भी नहीं जान पाते, उसीका प्रतिपादन करनेके लिये ये महर्षिगण यहाँ आये हुए हैं। आप यहाँ सत्यको प्रकट कर दें। जगदीश्वर! आप सम्पूर्ण देहधारियोंके अन्तरात्मा हैं। आप ही सब कुछ हैं। आपमें ही यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है तथापि कितने आश्चर्यकी बात है कि प्रकृतिसे प्रभावित होनेके कारण कोई कहीं भी आपकी सत्ताका अनुभव नहीं करते। वास्तवमें आप बाहर और भीतर सब ओर विद्यमान हैं। सम्पूर्ण विश्वके रूपमें आप ही सब ओर उपलब्ध हो रहे हैं।
ऋषियोंके इस प्रकार स्तुति करनेपर जगज्जननी