भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२२४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

दैवी वाक् (आकाशवाणी)-ने कहा—'तुमलोग तपस्या, भक्ति और नियमके साथ दोनोंकी आराधना करो। जिसकी आराधनासे पहले सिद्धि प्राप्त हो, वही भूत सबसे श्रेष्ठ कहा जायगा।' 'बहुत अच्छा' कहकर सम्पूर्ण लोकमान्य महर्षि वहाँसे चल दिये। वे थक गये थे। उनका अन्तःकरण खिन्न हो रहा था। उन्होंने उत्तम वैराग्यका आश्रय लिया और तपस्या करनेका दृढ़ संकल्प लेकर वे सब लोग त्रिभुवनको पवित्र करनेवाली जगज्जननी गौतमीके तटपर आये और जलदेवता तथा अग्निदेवताकी पृथक्-पृथक् पूजा करनेको उद्यत हुए। जो अग्निके पूजक थे, वे जलके पूजनमें प्रवृत्त हुए। उस समय वहाँ वेदमाता दैवी वाणी सरस्वतीने फिर कहा—'जलसे ही शुद्धि होती है। जो अग्निके पूजक हैं, वे विचार तो करें—बिना जलका पूजन कैसा। जल होनेपर ही मनुष्य सब कर्मोंके अनुष्ठानका अधिकारी होता है। वेदवेत्ता पुरुष जबतक शीतल जलमें श्रद्धापूर्वक स्नान नहीं कर लेता, तबतक अपवित्र, मलिन एवं शुभ कर्मका अनधिकारी रहता है। इसलिये जल सबसे श्रेष्ठ है। उसे माताकी पदवी दी गयी है। अतः जल ही श्रेष्ठ है।'

वेदवादी ऋषियोंने यह आकाशवाणी सुनी। इससे उन्हें निश्चय हो गया कि जल ही श्रेष्ठ है। जिस तीर्थमें यह ऋषिसत्र सम्पन्न हुआ, उसे तपस्तीर्थ और सत्रतीर्थ भी कहते हैं। अग्नीतीर्थ और सारस्वततीर्थ भी उसीके नाम हैं। वहाँ चौदह सौ पुण्यदायक तीर्थोंका निवास है। उनमें किया हुआ स्नान और दान स्वर्ग एवं मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला है। जहाँ आकाशवाणीने ऋषियोंका संदेह निवारण किया था, वहाँ सरस्वती नामकी नदी प्रकट हुई, जो गङ्गामें मिली है। सरस्वती और गङ्गाके संगमका माहात्म्य बतलानेमें कौन मनुष्य समर्थ हो सकता है।

गौतमी-तटपर इन्द्रतीर्थके नामसे जो प्रसिद्ध तीर्थ है, वही वृषाकपितीर्थ भी है। उसे ही फेना-संगम, हनुमत्तीर्थ तथा अब्जकतीर्थ भी कहते हैं। वहाँ भगवान् त्रिविक्रमका निवास है। उस तीर्थमें स्नान और दान करनेसे संसारमें लौटना नहीं पड़ता। अब वहाँका वृत्तान्त बतलाते हैं। गङ्गाके दक्षिण और उत्तर-तटपर इन्द्रेश्वरतीर्थ है। पूर्वकालमें नमुचि नामक दैत्य देवराज इन्द्रका प्रबल शत्रु था। वह मदसे उन्मत्त रहता था। एक बार इन्द्रके साथ उसका युद्ध हुआ। इन्द्रने फेनसे उसका मस्तक काट डाला। वह वज्ररूपधारी फेन शत्रु्का मस्तक काटनेके पश्चात् गङ्गाके दक्षिण-तटपर गिरा और पृथ्वीको छेदकर रसातलमें समा गया। रसातलमें जो गङ्गाजीका जल है, वह सम्पूर्ण विश्वको पवित्र करनेवाला है। वज्रने पृथ्वीको छेदकर जो मार्ग बना दिया था, उसी मार्गसे वह पातालगङ्गाका जल पृथ्वीके ऊपर निकल आया। उसीको फेना नदी कहते हैं। गङ्गाजीके साथ जो उसका पवित्र संगम हुआ है, वह सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात है। गङ्गा-यमुनाके संगमकी भाँति वह भी समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नान करनेमात्रसे हनुमान्जीकी उपमाता, जिनका मुख बिलावका-सा हो गया था, उस संकटसे मुक्त हुई थीं। उस तीर्थको मार्जारीतीर्थ और हनुमत्तीर्थ भी कहते हैं। उसका उपाख्यान पहले कहा जा चुका है। अब वृषाकपि और अब्जकतीर्थकी कथा सुनो। हिरण्य नामसे विख्यात एक दैत्योंका पूर्वज था, वह तपस्या करके सम्पूर्ण देवताओंसे अजेय हो गया था। हिरण्य बड़ा भयंकर दैत्य था। उसका बलवान् पुत्र महाशनिके नामसे विख्यात था। वह भी देवताओंके लिये सदा दुर्जय था। उसकी स्त्रीका नाम पराजिता था। एक बार महापराक्रमी महाशनिने युद्धके मुहानेपर ऐरावतसहित