भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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पृष्ठ 227
  • तपस्तीर्थ, इन्द्रतीर्थ और वृषाकपि एवं अब्जकतीर्थकी महिमा * २२५

इन्द्रको परास्त किया और उन्हें ले जाकर अपने पिताको सौंप दिया। इन्द्रपर विजय पानेके बाद महाशनिने वरुणको जीतनेके लिये उनपर आक्रमण किया; किंतु वरुण बड़े बुद्धिमान् थे, उन्होंने महाशनिको अपनी कन्या ब्याह दी। इधर तीनों लोक बिना इन्द्रके हो गये। तब सब देवताओंने मिलकर सलाह की कि 'भगवान् विष्णु ही पुनः इन्द्रको दे सकते हैं; क्योंकि वे ही दैत्योंके हन्ता हैं। मन्त्रद्रष्टा भी वे ही हैं। अतः वे दूसरेको भी इन्द्र बना देंगे।'

ऐसा निश्चय करके सब देवता भगवान् विष्णुके पास गये और उन्हें सब हाल कह सुनाया। भगवान् विष्णुने कहा—'महादैत्य महाशनि मेरे लिये अवध्य है।' यों कहकर वे महाशनिके श्वशुर वरुणके पास गये और उन्हें इन्द्रके पराभवका समाचार बतलाते हुए बोले—'तुम्हें ऐसा यत्न करना चाहिये, जिससे इन्द्र पुनः अपने पदपर लौट आयें।' भगवान् विष्णुके आदेशसे वरुण शीघ्र ही वहाँ गये। दैत्यने विनयपूर्वक अपने श्वशुरसे वहाँ पधारनेका कारण पूछा। वरुणने कहा—'महाबाहो! कुछ दिन पहले तुमने इन्द्रको परास्त करके रसातलमें बंदी बना लिया है। वे देवताओंके राजा हैं। उन्हें लौटा दो। यदि शत्रुको बाँधकर फिर छोड़ दिया जाय तो वह सत्पुरुषोंके लिये महान् कारण होता है।' 'बहुत अच्छा' कहकर दैत्यराज महाशनिने ऐरावतसहित इन्द्रको लौटा दिया और उनसे यह बात कही—'इन्द्र! आजसे तुम शिष्य हुए और मेरे श्वशुर वरुणजी तुम्हारे गुरु हुए; क्योंकि इन्होंने तुम्हें मुक्ति दिलायी है। अब तुम वरुणके प्रति स्वामिभाव रखकर स्वयं भृत्यका-सा बर्ताव करना, नहीं तो फिर तुम्हें बाँधकर रसातलके कारागृहमें डाल दूँगा।'

इस प्रकार इन्द्रको फटकारकर उसने बारंबार हँसते हुए कहा—'जाओ, जाओ; वरुणजीका सदा आदर करना।' इन्द्र अपने घर आये। वे अपमानपूर्ण लज्जासे काले पड़ गये थे। उन्होंने शत्रुद्वारा तिरस्कृत होनेकी सारी बातें इन्द्राणीको कह सुनायीं और पूछा—'सुमुखि! शत्रुने मुझसे इस तरह कठोर बातें कहीं और मेरे साथ ऐसा अनुचित बर्ताव किया। इससे मेरे हृदयमें आग लग रही है। तुम्हीं बताओ—कैसे अपने हृदयको शीतल करूँ?'

इन्द्राणीने कहा—बलसूदन! मैं दानवोंकी उत्पत्ति, पराजय, माया, वरदान तथा मृत्यु—सब जानती हूँ। महाशनिको तपस्यासे ही यह शक्ति प्राप्त हुई है। तपस्यासे कुछ भी असाध्य नहीं है। यज्ञ-कर्मसे कोई बात असम्भव नहीं है। जगन्नाथ भगवान् विष्णु तथा विश्वनाथ शिवकी भक्तिसे कोई भी कार्य ऐसा नहीं है, जो सिद्ध न हो सके। १ प्राणनाथ! मैंने और भी एक बहुत सुन्दर बात सुन रखी है। कारण कि स्त्रियाँ ही स्त्रियोंके स्वभावको जानती हैं। प्रभो! भूमि तथा जलकी अधिष्ठात्री देवियोंके द्वारा कोई भी कार्य असाध्य नहीं है। तपस्या अथवा यज्ञ आदि उन्हीं दोनोंके सहयोगसे होते हैं। उसमें भी जो तीर्थभूमि हो, वहीं आप चलें। उस स्थानपर भगवान् विष्णु तथा शिवकी पूजा करके सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ प्राप्त कर लेंगे। मैंने यह भी सुना है कि जो स्त्रियाँ पतिव्रता हैं, वे ही सब कुछ जानती हैं। उन्होंने ही चराचर जगत्‌को धारण कर रखा है। २ पृथ्वीपर सबसे सारभूत स्थान है दण्डकवन। वहाँ जगज्जननी


१- नासाध्यमस्ति तपसो नासाध्यं यज्ञकर्मणः। नासाध्यं लोकनाथस्य विष्णोर्भक्त्या हरस्य च॥ (१२९।५०)
२- श्रुतमस्ति पुनश्चेदं स्त्रियो याश्च पतिव्रताः। ता एव सर्वं जानन्ति धृतं ताभिश्चराचरम्॥ (१२९।५४)