भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२२६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


गङ्गा बहती हैं। वहीं चलकर आप दीन-दुःखियोंकी पीड़ा दूर करनेवाले जगदीश्वर श्रीविष्णु अथवा शिवकी आराधना करें। दुःखके समुद्रमें डूबनेवाले अनाथ मनुष्योंको श्रीशिव तथा श्रीविष्णु अथवा गङ्गाके सिवा दूसरा कोई कहीं भी शरण देनेवाला नहीं है। अतः एकाग्रचित्त होकर पूर्ण प्रयत्न करके आप इनको संतुष्ट करें। मेरे साथ रहकर भक्ति, स्तोत्र तथा तपस्याके द्वारा इनकी आराधना करें। तत्पश्चात् भगवान् शिव और विष्णुके प्रसादसे आप कल्याणके भागी होंगे। बिना जाने किया हुआ कर्म कर्मनिष्ठ पुरुषको एकगुना फल देता है। उसके विधि-विधान और तत्त्वको अच्छी प्रकार जानकर करनेसे सौ-गुना फल मिलता है और पत्नीके साथ उसका अनुष्ठान करनेसे वही कर्म अनन्त फल देनेवाला होता है*। गृहस्थ पुरुषके सब कार्योंमें यहाँ पत्नी ही सहायता करनेवाली है। उसके सहयोग बिना छोटे-से-छोटे कार्य भी सिद्ध नहीं होते। नाथ! पुरुष अकेले जो कर्म करता है, उसका आधा फल ही उसे मिलता है। किंतु पत्नीके साथ जो कर्म किया जाता है, उसका पूरा फल पुरुषको प्राप्त होता है। सुना जाता है—दण्डकारण्यमें सरिताओंमें श्रेष्ठ गौतमी गङ्गा बहती हैं। वे समस्त पापोंका नाश करनेवाली तथा सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंको देनेवाली हैं। अतः मेरे साथ वहाँ चलिये और महान् फलदायक पुण्यकर्मका अनुष्ठान कीजिये। इससे आप संग्राममें अपने शत्रुओंका संहार करके महान् सुखके भागी होंगे।

‘अच्छा, ऐसा ही करूँगा’ यों कहकर अपने गुरु बृहस्पति और पत्नी शचीको साथ ले इन्द्र जगज्जननी गौतमीके तटपर गये। दण्डकारण्यके भीतर उनकी पावन धाराका दर्शन करके इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने देवाधिदेव शिवकी प्रसन्नताके लिये तपस्या करनेका विचार किया। पहले गङ्गामें स्नान करके उन्होंने हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा एकमात्र भगवान् शिवके शरण होकर उनका स्तवन आरम्भ किया।

**इन्द्र बोले—**जो अपनी मायासे सम्पूर्ण चराचर जगत्की सृष्टि, रक्षा और संहार करते हैं, किंतु उसमें आसक्त नहीं होते, जो एक, स्वतन्त्र तथा अद्वैत चिदानन्दस्वरूप हैं, वे पिनाकधारी भगवान् शंकर हमपर प्रसन्न हों। वेदान्तके रहस्योंको भलीभाँति जाननेवाले सनकादि मुनि भी जिनके तत्त्वको ठीक-ठीक नहीं जानते, वे सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंके दाता अन्धकासुरविनाशक पार्वतीपति भगवान् शिव हमपर प्रसन्न हों। जब पाप, दरिद्रता, लोभ, याचना, मोह और विपत्ति आदि अनन्त सांसारिक दुःख प्रकट हुए, उनका प्रभाव फैलने लगा और उनसे सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया, तब यह सब अवस्था देखकर देवेश्वर महादेवजी बड़े चकित हुए और देवी पार्वतीसे बोले—‘लोकेश्वरि! यह सम्पूर्ण जगत् नष्ट होना चाहता है। तुम इसकी रक्षा करो। लोकमाता उमा! तुम सबको शरण देनेवाली, उत्तम ऐश्वर्यसे युक्त, परम कल्याणमयी तथा सम्पूर्ण जगत्की प्रतिष्ठा हो। वरदायिनि! तुम्हारी जय हो। तुम भोग, समाधि, परम मुक्ति, स्वाहा, स्वधा, स्वस्ति, अनादि सिद्धि, वाणी, बुद्धि तथा अजर-अमर हो। मेरी आज्ञाके अनुसार तीनों लोकोंमें विद्या आदि रूपसे तुम रक्षा करती हो। तुमने ही प्रकृतिरूपसे इस विचित्र त्रिलोकीकी सृष्टि की है।' शंकरजीके यों कहनेपर उनकी प्राणवल्लभा भगवती उमा उनका आलिङ्गन करके प्रेमालाप करने लगीं और थककर भगवान्के


* अज्ञात्वैकगुणं कर्म फलं दास्यति कर्मिणः। ज्ञात्वा शतगुणं तत्स्याद् भार्यया च तदक्षयम् ॥
(१२९।५९)