भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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  • तपस्तीर्थ, इन्द्रतीर्थ और वृषाकपि एवं अब्जकतीर्थकी महिमा *
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आधे शरीरमें लग गयीं तथा अपने हाथकी अंगुलियोंसे पसीनेका जल पोंछकर फेंका। उस जलसे पहले धर्मका प्रादुर्भाव हुआ। उसके बाद लक्ष्मी प्रकट हुईं। फिर दान, उत्तम वृष्टि, सत्त्व, सरोवर, धान्य, पुष्प, फल, शस्त्र, शास्त्र, गृहोपयोगी अस्त्र, तीर्थ, वन तथा चराचर जगत्का आविर्भाव हुआ। देवि! यह सब पापरहित सृष्टि थी। भगवती उमा! तुम्हारे प्रभावसे संसारमें प्रचुर सुखकी वृद्धि हुई। सदा सब ओर मङ्गलमय कृत्य शोभा पाने लगे। जगदम्ब! तुम सम्पूर्ण जगत्की स्वामिनी हो और हम भयसे डरे हुए हैं। अतः तुम हमारी रक्षा करो। कोई तर्क करते-करते मोहित हो जाते हैं और कोई उसीमें लीन रहते हैं। परन्तु हम तो शिव और शक्तिके सुन्दर अद्वैत रूपको सर्वदा नमस्कार करते हैं।

इस प्रकार स्तुति करनेवाले इन्द्रके समक्ष भगवान् शंकर प्रकट हुए और बोले—'देवराज! तुम क्या चाहते हो? अपना अभीष्ट मनोरथ कहो।' इन्द्रने कहा—'भगवन्! मेरा बलवान् शत्रु महाशनि, जो देखनेमें वज्रके समान भयंकर है, मुझे बाँधकर रसातल ले गया था। वहाँ उसने अनेक बार मेरा तिरस्कार किया और वचनरूपी बाणोंसे बींधता रहा। मेरा यह प्रयत्न उसीका वध करनेके लिये है। आप मुझे वह शक्ति प्रदान कीजिये, जिससे शत्रुकां नाश कर सकूँ। जिसने मेरा अपमान किया है, उसका नाश करनेपर ही मैं अपना नया जन्म मानूँगा। विजय और लक्ष्मीकी अपेक्षा कीर्ति ही श्रेष्ठ है।' यह सुनकर शिवने इन्द्रसे कहा—'अकेले मेरे द्वारा तुम्हारे शत्रुकां वध नहीं हो सकता। अतः तुम अविनाशी भगवान् जनार्दनकी भी आराधना करो। शची भी ऐसा ही करें। भगवान् नारायण तीनों लोकोंके एकमात्र आश्रय हैं। उनकी अनन्य चित्तसे उपासना करो।'

भगवान् शिवकी आज्ञासे इन्द्र गङ्गाजीके दक्षिण-तटपर मुनीश्वर आपस्तम्बके पास गये और उनको साथ लेकर फेना तथा गङ्गाके पवित्र संगमपर भाँति-भाँतिके वैदिक मन्त्रों एवं तपस्याके द्वारा भगवान् जनार्दनकी स्तुति करने लगे। उनकी स्तुतिसे भगवान् विष्णुको बड़ी प्रसन्नता हुई और वे प्रत्यक्ष प्रकट होकर बोले—'इन्द्र! तुम्हें क्या वरदान दूँ?' वे बोले—'मुझे एक ऐसा वीर दीजिये, जो मेरे शत्रुकां वध कर सके।' भगवान्ने कहा—'दे दिया।' फिर तो शिव, गङ्गा तथा विष्णुके प्रसादसे जलके भीतरसे एक पुरुष प्रकट हुआ। उसने भगवान् शिव और विष्णु दोनोंके स्वरूप धारण किये थे। उसके हाथमें चक्र भी था और त्रिशूल भी। उसने रसातलमें जाकर इन्द्रशत्रु महाशनिका वध किया। उसका नाम अब्जक और वृषाकपि हुआ। वह इन्द्रका सखा बन गया। इन्द्र स्वर्गमें रहते हुए भी प्रतिदिन वृषाकपिके पास आते थे। उन्हें अन्यत्र आसक्त देख शचीके हृदयमें प्रणयकोपका उदय हुआ।

तब इन्द्रने हँसकर उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—'प्रिये! मैं अपने शरीरकी शपथ खाकर कहता हूँ—मित्रवर वृषाकपिके सिवा और किसीके घर नहीं जाता। अतः तुम्हें मुझपर संदेह नहीं करना चाहिये। तुम पतिव्रता और मेरी प्रियतमा हो। धर्म करने तथा उचित सलाह देनेमें मेरी सदा सहायता करती हो। साथ ही संतानवती और कुलीन भी हो। फिर तुम्हारे सिवा दूसरी कौन स्त्री मेरी प्रियतमा हो सकती है। तुम्हारे ही उपदेशसे मैं महानदी गौतमी गङ्गाके तटपर गया और वहाँ भगवान् विष्णु, शिव तथा मित्र वृषाकपिके प्रसादसे दुःखसागरके पार हुआ और अब यहाँ राज्यसे च्युत न होनेवाला इन्द्र हूँ। यह