संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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किये, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ। नमस्कार, मन्त्रोच्चारणपूर्वक हवन किया हुआ हविष्य तथा श्रद्धापूर्वक किया हुआ पूजन—ये सब जिनको प्राप्त होते हैं तथा सम्पूर्ण देवता जिनकी दी हुई हविको ग्रहण करते हैं, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ। जिनसे बढ़कर दूसरी कोई उत्तम वस्तु नहीं है, जिनसे बढ़कर अत्यन्त सूक्ष्म भी कोई नहीं है तथा जिनसे बढ़कर महान्-से-महान् वस्तु भी दूसरी नहीं है, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ। जिनकी आज्ञासे यह विचित्र, अचिन्त्य, नाना प्रकारका और महान् विश्व एक ही कार्यमें संलग्न हो निरन्तर परिचालित रहता है, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ। जिनमें ऐश्वर्य, सबका आधिपत्य, कर्तृत्व, दातृत्व, महत्त्व, प्रीति, यश और सौख्य—ये अनादि धर्म हैं, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ। जो सदा शरण लेने योग्य, सबके पूजनीय, शरणागतके प्रिय, नित्य कल्याणमय तथा सर्वस्वरूप हैं, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ।
इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर कहा—‘मुने! कोई वर माँगो।’ आपस्तम्बने कहा—‘मेरा और दूसरोंका कल्याण हो। जो मनुष्य यहाँ स्नान करके सम्पूर्ण जगत्के स्वामी आपका दर्शन करें, वे अपनी समस्त अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त करें।’ भगवान् शिवने ‘एवमस्तु’ कहकर इसका अनुमोदन किया। तबसे वह तीर्थ आपस्तम्बके नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह अनादि अविद्यामय अन्धकारराशिका उन्मूलन करनेमें समर्थ है।
शुक्लतीर्थ मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाला है। उसके स्मरणमात्रसे सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति होती है। भरद्वाज नामसे विख्यात एक बड़े धर्मात्मा मुनि थे। उनकी पत्नीका नाम पैठीनसी था। वह पातिव्रत-धर्मका पालन करती हुई पतिके साथ गौतमीके तटपर निवास करती थी। एक बार मुनिने अग्नि और सोम देवताओंके लिये तथा इन्द्र और अग्नि देवताओंके लिये पुरोडाश (खीर) बनाया। पुरोडाश जब पक रहा था, तब धूँएसे एक पुरुष प्रकट हुआ, जो तीनों लोकोंको भयभीत करनेवाला था। उसने पुरोडाश खा लिया। यह देखकर मुनिने क्रोधपूर्वक पूछा—‘तू कौन है, जो मेरा यज्ञ नष्ट कर रहा है?’ ऋषिकी बात सुनकर राक्षसने उत्तर दिया—‘मेरा नाम हव्यघ्न (यज्ञघ्न) है। मैं संध्याका पुत्र हूँ। प्राचीनबर्हिष्का ज्येष्ठ पुत्र मैं ही हूँ। ब्रह्माजीने मुझे वरदान दिया है कि तुम सुखपूर्वक यज्ञोंका भक्षण करो। मेरा छोटा भाई कलि भी बलवान् और अत्यन्त भीषण है। मैं काला, मेरे पिता काले, मेरी माँ काली तथा मेरा छोटा भाई भी काला ही है। मैं कृतान्त बनकर यज्ञका नाश