भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* आपस्तम्बतीर्थ, शुक्लतीर्थ और श्रीविष्णुतीर्थकी महिमा * २२९

आश्रमपर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजी आये। शिष्योंसहित मुनीश्वर आपस्तम्बने अगस्त्यजीका पूजन किया और इस प्रकार पूछा—'मुनिवर! तीनों देवताओंमें कौन पूज्य है? अनादि और अनन्त कौन है तथा वेदोंमें किसका यशोगान किया गया है? महामुने! यही मेरा संशय है, इसे दूर करनेके लिये आप कुछ उपदेश करें।'

अगस्त्यजी बोले—धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धिमें शब्द प्रमाण बतलाया जाता है। उसमें भी वैदिक शब्द सबसे श्रेष्ठ प्रमाण है। वेदके द्वारा जिनका यशोगान होता है, वे परात्पर पुरुष परमात्मा हैं। जो मृत्युके अधीन होता है, उसे अपर (क्षर पुरुष) जानना चाहिये और जो अमृत है, उसे पर (अक्षर पुरुष) कहते हैं। अमृतके भी दो स्वरूप हैं— मूर्त और अमूर्त। जो अमूर्त (निराकार) है, उसे परब्रह्म जानना चाहिये और मूर्तको अपर ब्रह्म कहते हैं। गुणोंकी व्यापकताके अनुसार मूर्तके भी तीन भेद हैं— ब्रह्मा, विष्णु और शिव। ये एक होते हुए भी तीन कहलाते हैं। इन तीनों देवताओंका भी वेद्यतत्त्व एक ही है। उसे ही परब्रह्म कहते हैं। गुण और कर्मके भेदसे एककी ही अनेक रूपोंसे अभिव्यक्ति होती है। लोकोंका उपकार करनेके लिये एक ही ब्रह्मके तीन रूप हो जाते हैं। जो इस परमतत्त्वको जानता है, वही विद्वान् है; दूसरा नहीं। जो इन तीनोंमें भेद बतलाता है, उसे लिङ्गभेदी कहते हैं। उसके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है।* तीनों देवताओंके रूप एक-दूसरेसे भिन्न और पृथक्-पृथक् हैं। सम्पूर्ण साकार रूपोंमें पृथक्-पृथक् वेद प्रमाण हैं। जो निराकार तत्त्व है, वह एक है। वह उन तीनोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट माना गया है।

आपस्तम्ब बोले—इससे मैं किसी निर्णयपर नहीं पहुँच सका। इसमें जो रहस्यकी बात हो, उसे विचारकर बतलाइये।

अगस्त्यजीने कहा—यद्यपि इन देवताओंमें परस्पर कोई भेद नहीं है तथापि सुखस्वरूप शिवसे ही सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। मुने! पराभक्तिके साथ भगवान् शिवकी ही आराधना करो। दण्डकारण्यमें गौतमीके तटपर भगवान् शिव समस्त पापराशिका निवारण करते हैं।

महर्षि अगस्त्यकी यह बात सुनकर आपस्तम्ब मुनिको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने गङ्गामें जाकर स्नान किया और व्रतपालनका नियम लेकर भगवान् शंकरका स्तवन करना आरम्भ किया।

आपस्तम्ब बोले—जो काष्ठोंमें अग्नि, फूलोंमें सुगन्ध, बीजोंमें वृक्ष आदि, पत्थरोंमें सुवर्ण तथा सम्पूर्ण भूतोंमें आत्मरूपसे छिपे रहते हैं, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ। जिन्होंने खेल-खेलमें ही इस विश्वकी रचना की, जो तीनों लोकोंके भरण-पोषण करनेवाले तथा उसके रचयिता हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका स्वरूप है और जो सत्-असत्से परे हैं, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ। जिनका स्मरण करनेसे देहधारी जीवको दरिद्रताके महान् अभिशाप और रोग आदि स्पर्श नहीं करते तथा जिनकी शरणमें गये हुए मनुष्य अपनी अभीष्ट वस्तुको प्राप्त कर लेते हैं, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ। जिन्होंने पहले तीनों वेदोंमें वर्णित धर्मका साक्षात्कार करके उसमें ब्रह्मा आदि देवताओंको नियुक्त किया और इस प्रकार जिन्होंने दो शरीर धारण


* लोकानामुपकारार्थमाकृतित्रितयं भवेत्॥
यस्तत्त्वं वेत्ति परं स च विद्वान्न चेतरः। तत्र यो भेदमाचष्टे लिङ्गभेदी स उच्यते॥
प्रायश्चित्तं न तस्यास्ति यश्चैषां व्याहरेद् भिदम्॥ (१३०।११—१३)