भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

* आपस्तम्बतीर्थ, शुक्लतीर्थ और श्रीविष्णुतीर्थकी महिमा * २२९

आश्रमपर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजी आये। शिष्योंसहित मुनीश्वर आपस्तम्बने अगस्त्यजीका पूजन किया और इस प्रकार पूछा—'मुनिवर! तीनों देवताओंमें कौन पूज्य है? अनादि और अनन्त कौन है तथा वेदोंमें किसका यशोगान किया गया है? महामुने! यही मेरा संशय है, इसे दूर करनेके लिये आप कुछ उपदेश करें।'

अगस्त्यजी बोले—धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धिमें शब्द प्रमाण बतलाया जाता है। उसमें भी वैदिक शब्द सबसे श्रेष्ठ प्रमाण है। वेदके द्वारा जिनका यशोगान होता है, वे परात्पर पुरुष परमात्मा हैं। जो मृत्युके अधीन होता है, उसे अपर (क्षर पुरुष) जानना चाहिये और जो अमृत है, उसे पर (अक्षर पुरुष) कहते हैं। अमृतके भी दो स्वरूप हैं— मूर्त और अमूर्त। जो अमूर्त (निराकार) है, उसे परब्रह्म जानना चाहिये और मूर्तको अपर ब्रह्म कहते हैं। गुणोंकी व्यापकताके अनुसार मूर्तके भी तीन भेद हैं— ब्रह्मा, विष्णु और शिव। ये एक होते हुए भी तीन कहलाते हैं। इन तीनों देवताओंका भी वेद्यतत्त्व एक ही है। उसे ही परब्रह्म कहते हैं। गुण और कर्मके भेदसे एककी ही अनेक रूपोंसे अभिव्यक्ति होती है। लोकोंका उपकार करनेके लिये एक ही ब्रह्मके तीन रूप हो जाते हैं। जो इस परमतत्त्वको जानता है, वही विद्वान् है; दूसरा नहीं। जो इन तीनोंमें भेद बतलाता है, उसे लिङ्गभेदी कहते हैं। उसके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है।* तीनों देवताओंके रूप एक-दूसरेसे भिन्न और पृथक्-पृथक् हैं। सम्पूर्ण साकार रूपोंमें पृथक्-पृथक् वेद प्रमाण हैं। जो निराकार तत्त्व है, वह एक है। वह उन तीनोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट माना गया है।

आपस्तम्ब बोले—इससे मैं किसी निर्णयपर नहीं पहुँच सका। इसमें जो रहस्यकी बात हो, उसे विचारकर बतलाइये।

अगस्त्यजीने कहा—यद्यपि इन देवताओंमें परस्पर कोई भेद नहीं है तथापि सुखस्वरूप शिवसे ही सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। मुने! पराभक्तिके साथ भगवान् शिवकी ही आराधना करो। दण्डकारण्यमें गौतमीके तटपर भगवान् शिव समस्त पापराशिका निवारण करते हैं।

महर्षि अगस्त्यकी यह बात सुनकर आपस्तम्ब मुनिको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने गङ्गामें जाकर स्नान किया और व्रतपालनका नियम लेकर भगवान् शंकरका स्तवन करना आरम्भ किया।

आपस्तम्ब बोले—जो काष्ठोंमें अग्नि, फूलोंमें सुगन्ध, बीजोंमें वृक्ष आदि, पत्थरोंमें सुवर्ण तथा सम्पूर्ण भूतोंमें आत्मरूपसे छिपे रहते हैं, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ। जिन्होंने खेल-खेलमें ही इस विश्वकी रचना की, जो तीनों लोकोंके भरण-पोषण करनेवाले तथा उसके रचयिता हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका स्वरूप है और जो सत्-असत्से परे हैं, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ। जिनका स्मरण करनेसे देहधारी जीवको दरिद्रताके महान् अभिशाप और रोग आदि स्पर्श नहीं करते तथा जिनकी शरणमें गये हुए मनुष्य अपनी अभीष्ट वस्तुको प्राप्त कर लेते हैं, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ। जिन्होंने पहले तीनों वेदोंमें वर्णित धर्मका साक्षात्कार करके उसमें ब्रह्मा आदि देवताओंको नियुक्त किया और इस प्रकार जिन्होंने दो शरीर धारण


* लोकानामुपकारार्थमाकृतित्रितयं भवेत्॥
यस्तत्त्वं वेत्ति परं स च विद्वान्न चेतरः। तत्र यो भेदमाचष्टे लिङ्गभेदी स उच्यते॥
प्रायश्चित्तं न तस्यास्ति यश्चैषां व्याहरेद् भिदम्॥ (१३०।११—१३)

७८- भरद्वाजके यज्ञमें यज्ञघ्नका प्रकट होना

२३० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


किये, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ। नमस्कार, मन्त्रोच्चारणपूर्वक हवन किया हुआ हविष्य तथा श्रद्धापूर्वक किया हुआ पूजन—ये सब जिनको प्राप्त होते हैं तथा सम्पूर्ण देवता जिनकी दी हुई हविको ग्रहण करते हैं, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ। जिनसे बढ़कर दूसरी कोई उत्तम वस्तु नहीं है, जिनसे बढ़कर अत्यन्त सूक्ष्म भी कोई नहीं है तथा जिनसे बढ़कर महान्-से-महान् वस्तु भी दूसरी नहीं है, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ। जिनकी आज्ञासे यह विचित्र, अचिन्त्य, नाना प्रकारका और महान् विश्व एक ही कार्यमें संलग्न हो निरन्तर परिचालित रहता है, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ। जिनमें ऐश्वर्य, सबका आधिपत्य, कर्तृत्व, दातृत्व, महत्त्व, प्रीति, यश और सौख्य—ये अनादि धर्म हैं, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ। जो सदा शरण लेने योग्य, सबके पूजनीय, शरणागतके प्रिय, नित्य कल्याणमय तथा सर्वस्वरूप हैं, उन भगवान् सोमनाथकी मैं शरण लेता हूँ।

इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर कहा—‘मुने! कोई वर माँगो।’ आपस्तम्बने कहा—‘मेरा और दूसरोंका कल्याण हो। जो मनुष्य यहाँ स्नान करके सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामी आपका दर्शन करें, वे अपनी समस्त अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त करें।’ भगवान् शिवने ‘एवमस्तु’ कहकर इसका अनुमोदन किया। तबसे वह तीर्थ आपस्तम्बके नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह अनादि अविद्यामय अन्धकारराशिका उन्मूलन करनेमें समर्थ है।

शुक्लतीर्थ मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाला है। उसके स्मरणमात्रसे सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति होती है। भरद्वाज नामसे विख्यात एक बड़े धर्मात्मा मुनि थे। उनकी पत्नीका नाम पैठीनसी था। वह पातिव्रत-धर्मका पालन करती हुई पतिके साथ गौतमीके तटपर निवास करती थी। एक बार मुनिने अग्नि और सोम देवताओंके लिये तथा इन्द्र और अग्नि देवताओंके लिये पुरोडाश (खीर) बनाया। पुरोडाश जब पक रहा था, तब धूँएसे एक पुरुष प्रकट हुआ, जो तीनों लोकोंको भयभीत करनेवाला था। उसने पुरोडाश खा लिया। यह देखकर मुनिने क्रोधपूर्वक पूछा—‘तू कौन है, जो मेरा यज्ञ नष्ट कर रहा है?’ ऋषिकी बात सुनकर राक्षसने उत्तर दिया—‘मेरा नाम हव्यघ्न (यज्ञघ्न) है। मैं संध्याका पुत्र हूँ। प्राचीनबर्हिष्का ज्येष्ठ पुत्र मैं ही हूँ। ब्रह्माजीने मुझे वरदान दिया है कि तुम सुखपूर्वक यज्ञोंका भक्षण करो। मेरा छोटा भाई कलि भी बलवान् और अत्यन्त भीषण है। मैं काला, मेरे पिता काले, मेरी माँ काली तथा मेरा छोटा भाई भी काला ही है। मैं कृतान्त बनकर यज्ञका नाश

७९- गोदावरीके जलका छींटा देनेसे यज्ञघ्नको गौरवर्णकी प्राप्ति

* आपस्तम्बतीर्थ, शुक्लतीर्थ और श्रीविष्णुतीर्थकी महिमा * २३१


और यूपका छेदन करूँगा।'

भरद्वाजने कहा—तुम मेरे यज्ञकी रक्षा करो, क्योंकि यह प्रिय एवं सनातन धर्म है। मैं जानता हूँ तुम यज्ञका नाश करनेवाले हो तो भी मेरा अनुरोध है कि तुम ब्राह्मणोंसहित मेरे यज्ञकी रक्षा करो।

यज्ञघ्ने कहा—भरद्वाज! तुम संक्षेपसे मेरी बात सुनो। पूर्वकालमें देवताओं और दानवोंके समीप ब्रह्माजीने मुझे शाप दिया। उस समय मैंने लोकपितामह ब्रह्माजीको प्रार्थना करके प्रसन्न किया। तब उन्होंने कहा—'जब श्रेष्ठ मुनि तुम्हारे ऊपर अमृतका छींटा दें, तब तुम शापसे मुक्त हो जाओगे। इसके सिवा और कोई उपाय नहीं है।' ब्रह्मन्! जब आप ऐसा करेंगे, तब आपकी जो-जो इच्छा होगी, वह सब पूर्ण होगी। यह बात कभी मिथ्या नहीं हो सकती।

भरद्वाजने फिर कहा—महामते! तुम मेरे सखा हो। अतः जिस उपायसे यज्ञकी रक्षा हो, वह बताओ। मैं उसे अवश्य करूँगा। देवताओं और दैत्योंने एकत्रित होकर कभी क्षीरसमुद्रका मन्थन किया था। उस समय बड़े कष्टसे उन्हें अमृत मिला। वही अमृत मुझे कैसे सुलभ हो सकता है। यदि तुम प्रेमवश प्रसन्न हो तो जो सुलभ वस्तु हो, वही माँगो। ऋषिकी यह बात सुनकर राक्षसने प्रसन्नतापूर्वक कहा—'गौतमी गङ्गाका जल अमृत है। सुवर्ण अमृत कहलाता है। गायका घी भी अमृत है और सोमको भी अमृत ही माना जाता है। इन सबके द्वारा मेरा अभिषेक करो। अथवा गङ्गाका जल, घी और सुवर्ण—इन तीनों वस्तुओंसे ही अभिषेक करो। सबसे उत्कृष्ट एवं दिव्य अमृत है—गौतमी गङ्गाका जल।'

यह सुनकर भरद्वाज मुनिको बड़ा संतोष हुआ। उन्होंने बड़े आदरके साथ गङ्गाका अमृतमय जल हाथमें लिया और उससे राक्षसका अभिषेक किया। इससे वह महाबली राक्षस शुक्ल वर्णका होकर प्रकट हुआ। जो पहले काला था, वह क्षणभरमें गोरा हो गया। प्रतापी भरद्वाजने सम्पूर्ण यज्ञ समाप्त करके ऋत्विजोंको विदा किया। इसके बाद राक्षसने पुनः भरद्वाजसे कहा—'मुने! अब मैं जाता हूँ। तुमने मुझे गौर वर्णका कर दिया। तुम्हारे इस तीर्थमें जो लोग स्नान, दान और पूजन आदि करें, उन सबके अभीष्ट फलोंकी सिद्धि हो। इसके स्मरणमात्रसे सब पाप नष्ट हो जायँ।' तबसे वह शुक्लतीर्थके नामसे विख्यात हुआ। दण्डकारण्यमें गौतमी गङ्गाके तटपर वह तीर्थ स्वर्गका खुला हुआ दरवाजा है। वहाँ गङ्गाजीके दोनों तटोंपर सात हजार तीर्थ हैं, जो सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं।

श्रीविष्णुतीर्थके नामसे जो विख्यात तीर्थ है, उसका वृत्तान्त सुनो। मुद्गलके पुत्र मौद्गल्य एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनकी पत्नीका नाम जाबाला

५९- लक्ष्मीतीर्थ और भानुतीर्थका माहात्म्य

२३२ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

था। वह उत्तम पुत्रोंकी जननी थी। मौद्गल्यके पिता मुद्गल ऋषि भी सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात थे। उनकी पत्नी भागीरथीके नामसे प्रसिद्ध थी। मौद्गल्य ऋषि प्रातःकाल ही गङ्गा-स्नान करते थे। यह उनका नित्यका कार्य था। गङ्गाके तटपर कुश, मिट्टी और शमीके फूलोंसे वे प्रतिदिन भगवान्‌का पूजन करते थे। गुरुके बताये हुए मार्गसे अपने हृदयकमलके भीतर वे प्रतिदिन भगवान् विष्णुका आवाहन करते थे। उनके आवाहन करते ही शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले लक्ष्मीपति जगन्नाथ गरुड़पर आरूढ़ हो तुरंत वहाँ आते थे। फिर मौद्गल्य ऋषिके द्वारा यत्नपूर्वक पूजित होनेपर वे कुछ कालतक उन्हें विचित्र-विचित्र कथाएँ सुनाया करते थे। कथा-वार्तामें जब तीसरे पहरका समय हो जाता, तब भगवान् विष्णु उनसे बार-बार कहते—'बेटा! अब अपने घर जाओ, तुम बहुत थक गये होगे।' इस प्रकार भगवान्‌के आग्रह करनेपर वे घर लौटते थे। उनके जानेपर भगवान् देवताओंके साथ अपने धामको लौटते थे। मौद्गल्य भी प्रतिदिन कुछ लेकर अपने घर आते और पत्नीको अपना उपार्जित धन देते थे। मौद्गल्यकी पत्नी जाबाला बड़ी पतिव्रता थी। उसके स्वामी शाक, फल अथवा मूल—जो कुछ भी ला देते, उसे ही लेकर वह उसका संस्कार करती और पहले अतिथियों, बालकों तथा अपने पतिको परोसती थी। इन सबको भोजन देकर वह पीछे स्वयं अन्न ग्रहण करती। जब सब लोग भोजन कर लेते तब मौद्गल्य मुनि प्रतिदिन रातमें प्रसन्नतापूर्वक श्रीविष्णुके मुखसे सुनी हुई कथाएँ सबको सुनाते थे। इस प्रकार बहुत समय व्यतीत होनेके बाद मौद्गल्य मुनिने पत्नी, पुत्र, भाई, बन्धु और माता-पिताके साथ उत्तम भोग भोगे और अन्तमें मोक्ष भी प्राप्त कर लिया। तबसे वह तीर्थ मौद्गल्यतीर्थ और श्रीविष्णुतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। वहाँका स्नान और दान भोग एवं मोक्ष देनेवाला है। यदि किसी तरह उस तीर्थके नामका श्रवण अथवा उसका स्मरण ही हो जाय तो भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं और वह मनुष्य पापोंसे मुक्त होकर सुखी हो जाता है। वहाँ गौतमीके दोनों तटोंपर ग्यारह हजार तीर्थ हैं, जो स्नान, दान और जप आदि करनेसे सब पदार्थ देनेवाले हैं।

लक्ष्मीतीर्थ और भानुतीर्थका माहात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं— नारद! विष्णुतीर्थके बाद लक्ष्मीतीर्थ है, जो लक्ष्मीकी वृद्धि और दरिद्रताका नाश करनेवाला है। उसका पवित्र इतिहास बतलाता हूँ, सुनो। पूर्वकालकी बात है—लक्ष्मी और दरिद्रा देवीमें संवाद हुआ। वे दोनों एक-दूसरीका विरोध करती हुई संसारमें आयीं। तीनों लोकोंमें कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जहाँ ये व्याप्त न हों। दोनों ही कहने लगीं—मैं बड़ी हूँ, मैं बड़ी हूँ। लक्ष्मीने युक्ति दी—'देहधारियोंका कुल, शील और जीवन मैं ही हूँ। मेरे बिना वे जीते हुए भी मृतकके समान हैं।' दरिद्राने भी तर्क उपस्थित किया—'मैं ही सबसे बड़ी हूँ। क्योंकि मुक्ति सदा मेरे ही अधीन है। जहाँ मैं हूँ, वहाँ काम, क्रोध, मद, लोभ और मात्सर्य—ये दोष कभी नहीं रहते। भय, उन्माद, ईर्ष्या और उद्दण्डताका भी अभाव रहता है।' दरिद्राकी बात सुनकर लक्ष्मीने प्रतिवाद किया—'मुझसे अलंकृत होनेपर सभी प्राणी सम्मानित होते हैं। निर्धन

* लक्ष्मीतीर्थ और भानुतीर्थका माहात्म्य * २३३

मनुष्य शिवके ही तुल्य क्यों न हो, सबके द्वारा तिरस्कृत होता रहता है। 'मुझे कुछ दीजिये' यह वाक्य मुँहसे निकालते ही बुद्धि, श्री, लज्जा, शान्ति और कीर्ति—ये शरीरके पाँच देवता तुरंत निकलकर चल देते हैं। गुण और गौरव तभीतक टिके रहते हैं, जबतक मनुष्य दूसरोंके सामने हाथ नहीं फैलाता। जब पुरुष याचक बन गया, तब कहाँ गुण और कहाँ गौरव। जीव तभीतक सबसे उत्तम, समस्त गुणोंका भंडार और सब लोगोंका वन्दनीय रहता है, जबतक वह दूसरेसे याचना नहीं करता। प्राणियोंके लिये निर्धनता सबसे बड़ा कष्ट और पाप है। क्योंकि निर्धन मनुष्यको न तो कोई आदर देता, न उससे बात करता और न उसका स्पर्श ही करता है।* अतः दरिद्रे ! मैं ही श्रेष्ठ हूँ। तू मेरी बात कान खोलकर सुन ले।'

लक्ष्मीका यह दर्पयुक्त वचन सुनकर दरिद्रा बोली—'लक्ष्मी! मैं बड़ी हूँ—यह बारंबार कहते तुझे लज्जा नही आती ? तू श्रेष्ठ पुरुषोंको छोड़कर सदा पापियोंमें ही रमती रहती है। जो तेरा विश्वास करता है, उसके साथ तू वञ्चना करती है। फिर बड़ी-बड़ी डीगें कैसे हाँक रही है। तेरे मिलनेपर मनुष्यको जैसा भारी पश्चात्ताप सहना पड़ता है, वैसा उसे सुख नहीं मिलता। मदिरा पीनेसे भी पुरुषको वैसा भयंकर नशा नहीं होता, जैसा तेरे समीप रहनेमात्रसे विद्वानोंको भी हो जाता है। लक्ष्मी! तू सदा प्रायः पापियोंके साथ ही क्रीड़ा करती है। मैं योग्य और धर्मशील पुरुषोंमें सदा निवास करती हूँ। भगवान् शिव और श्रीविष्णुके भक्त, कृतज्ञ, महात्मा, सदाचारी, शान्त, गुरुसेवा-परायण, साधु, विद्वान्, शूरवीर तथा पवित्र बुद्धिवाले श्रेष्ठ पुरुषोंमें मेरा निवास है। अतः श्रेष्ठता तो सदा मुझमें ही है। तेजस्वी ब्राह्मण, व्रतपरायण संन्यासी तथा निर्भय मनुष्योंके साथ मैं रहा करती हूँ। किंतु तू कहाँ रहती है—यह भी सुन ले। पापपरायण राजकर्मचारी, निष्ठुर, खल, चुगलखोर, लोभी, विकृताङ्ग, शठ, अनार्य, कृतघ्न, धर्मघाती, मित्रद्रोही, अनिष्टकारी तथा हृदयहीन मनुष्योंमें ही तेरा निवास है।

इस तरह विवाद करती हुई वे दोनों मेरे पास आयीं। मैंने उनकी बातें सुनीं और इस प्रकार कहा—'पृथ्वी तथा आप (जल)—ये दोनों देवियाँ मुझसे ही प्रकट हुई हैं। स्त्री होनेके कारण वे ही स्त्रीके विवादको समझ सकती हैं और कोई नहीं। उनमें भी जो कमण्डलुसे प्रकट होनेवाली नदियाँ हैं, वे श्रेष्ठ हैं। उन सरिताओंमें भी गौतमी देवी तो सर्वश्रेष्ठ हैं। अतः वे ही तुम्हारे विवादका निर्णय करेंगी। वे ही सबकी पीड़ाओंको हरनेवाली तथा सबके संदेहका निवारण करनेवाली हैं।' मेरे कहनेसे वे दोनों पृथ्वी और जलके पास गयीं और उन सबको साथ ले गौतमीदेवीके समीप पहुँचीं। भूदेवी और आपोदेवीने गौतमीसे लक्ष्मी और दरिद्राका विवाद स्पष्टरूपसे कह सुनाया। उन दोनोंके विवादको समस्त लोकपाल, पृथ्वी और जल—ये मध्यस्थकी भाँति सुन रहे थे।

उस समय गङ्गाने दरिद्रासे कहा—'ब्रह्मश्री,


* देहीति वचनद्वारा देहस्थाः पञ्च देवताः। सद्यो निर्गत्य गच्छन्ति धीश्रीह्रीशान्तिकीतयः ॥
तावद् गुणा गुरुत्वं च यावन्नार्थयते परम्। अर्थी चेत् पुरुषो जातः क्व गुणाः क्व च गौरवम् ॥
तावत्सर्वोत्तमो जन्तुस्तावत्सर्वगुणालयः। नमस्यः सर्वलोकानां यावन्नार्थयते परम् ॥
कष्टमेतन्महत्पापं निर्धनत्वं शरीरिणाम्। न मानयति नो वक्ति न स्पृशत्यधनं जनः ॥
(१३७।१०—१३)

८०- लक्ष्मी और दरिद्राके विवादमें गोदावरीके द्वारा दरिद्राकी भर्त्सना

२३४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

तपःश्री, यज्ञश्री, कीर्ति, धनश्री, यशःश्री, विद्या, प्रज्ञा, सरस्वती, भोगश्री, मुक्ति, स्मृति, लज्जा, धृति, क्षमा, सिद्धि, तुष्टि, पुष्टि, शान्ति, जल, पृथ्वी, अहंशक्ति, ओषधि, श्रुति, शुद्धि, रात्रि, द्युलोक, ज्योत्स्ना, आशीः, स्वस्ति, व्याप्ति, माया, उषा, शिवा आदि जो कुछ भी संसारमें विद्यमान है, वह सब लक्ष्मीके द्वारा व्याप्त है। ब्राह्मण, धीर, क्षमावान्, साधु, विद्वान्, भोगपरायण तथा मोक्षपरायण पुरुषोंमें जो-जो रमणीय अथवा सुन्दर है, वह सब लक्ष्मीका ही विस्तार है। अधिक सुननेसे क्या लाभ—समस्त जगत् लक्ष्मीमय ही है। जिस किसी व्यक्तिमें जो कुछ भी उत्कृष्ट वस्तु दिखायी देती है, वह सब लक्ष्मीमय है। लक्ष्मीसे शून्य कोई वस्तु नहीं है। दरिद्रे! क्या तू इन सुन्दरी लक्ष्मीदेवीके साथ स्पर्द्धा करती हुई लज्जित नहीं होती? जा, चली जा यहाँसे।'

तबसे गङ्गाका जल दरिद्राका शत्रु हो गया। तभीतक दरिद्रताका कष्ट उठाना पड़ता है, जबतक गङ्गाजीका सेवन न किया जाय। तबसे लक्ष्मीतीर्थ अलक्ष्मीनाशक हो गया। वहाँ स्नान और दान करनेसे मनुष्य लक्ष्मीवान् तथा पुण्यवान् होता है। महामते! वहाँ देवताओं तथा ऋषि-मुनियोंद्वारा सेवित छः हजार तीर्थ हैं, जो सब-के-सब सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं।

तदनन्तर विख्यात भानुतीर्थ है, जो मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला है। वहाँका वृत्तान्त महापातकोंका नाश करनेवाला है। उसे बतलाता हूँ, सुनो। शर्याति नामसे विख्यात एक परम धर्मात्मा राजा थे। उनकी स्त्रीका नाम स्थविष्ठा था। रानी इस भूतलपर अप्रतिम सुन्दरी थी। संयमी पुरुषोंमें श्रेष्ठ विश्वामित्रकुमार ब्रह्मर्षि मधुच्छन्दा राजा शर्यातिके पुरोहित थे। एक समयकी बात है—वीरवर राजा शर्याति अपने पुरोहितको साथ ले दिग्विजयके लिये निकले। सम्पूर्ण दिशाओंपर विजय पाकर लौटते समय राजाने मार्गमें सेनाका पड़ाव डाला। उस समय उन्होंने अपने पुरोहितको उदास देखकर पूछा—'विप्रवर! आप खिन्न क्यों हैं? मैंने पृथ्वीको जीता और बड़े-बड़े राजाओंपर विजय पायी, यह तो महान् हर्षका अवसर है। ऐसे समयमें आप दुःखी क्यों हैं? सच-सच बताइये।' तब मधुच्छन्दाने राजाको सम्बोधित करके कहा—'राजन्! जब एक पहर दिन रहेगा, तब हमलोग यात्रा करेंगे। इसीमें रात आधी बीत जायगी। उधर इस शरीरकी स्वामिनी मेरी प्रियतमा कामके वशीभूत होकर मेरी राह देखती है। उसका स्मरण करके मेरा शरीर सूखा जाता है। कामजनित विकार उत्पन्न होनेपर वह कमलके समान मुखवाली सुन्दरी जीवित तो मिलेगी न?'

यह सुनकर राजा हँस पड़े और पुरोहितसे बोले—'ब्रह्मन्! आप मेरे गुरु और मित्र हैं। फिर अपने-आपको क्यों विडम्बनामें डाल रहे हैं।

८१- पुरोहित-पत्नीको जीवित करनेके लिये राजा शर्यातिका अग्निमें प्रवेश

* लक्ष्मीतीर्थ और भानुतीर्थका माहात्म्य * २३५

संसारका सुख तो क्षणभङ्गुर है। उसमें आप-जैसे महात्माओंकी आस्था कैसी।' मधुच्छन्दा बोले— 'राजन्! जहाँ पति-पत्नी दोनों एक-दूसरेके अनुकूल रहते हैं, वहीं धर्म, अर्थ और कामकी वृद्धि होती है। अतः अपनी पत्नीके प्रति यह अनुराग दूषण नहीं, भूषण ही मानना चाहिये।'

तदनन्तर राजा विशाल सेनाके साथ अपने देशमें आये। उन्होंने पत्नीके प्रेमकी परीक्षा करनेके लिये नगरसे यह संदेश भेज दिया—'राजा शर्याति दिग्विजयके लिये गये थे। वहाँ एक राक्षस पुरोहितसहित राजाको मारकर रसातलमें चला गया।' दूतके मुखसे यह संदेश सुनकर रानी इसकी सत्यताका पता लगाने लगीं, किन्तु मधुच्छन्दाकी पत्नीने तुरंत प्राण त्याग दिये। यह एक अद्भुत बात हो गयी। दूतोंने उसकी मृत्युका हाल महाराजसे जाकर कहा। साथ ही रानियोंकी चेष्टा भी बतायी। इससे राजाको बड़ा विस्मय और दुःख हुआ; उन्होंने दूतोंसे कहा—'तुमलोग जाकर ब्राह्मणीके शरीरकी रक्षा करो और नगरमें यह बात फैला दो कि राजा अपने पुरोहितके साथ राजधानीमें आ रहे हैं।'

यों कहकर राजा चिन्तासे व्याकुल हो उठे। इसी समय आकाशवाणी हुई—'राजन्! इस पृथ्वीपर गौतमी गङ्गा सब प्रकारके संकटोंकी शान्ति करनेवाली तथा पावन हैं, वे आपका सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध करेंगी।' आकाशवाणी सुनकर शर्याति गौतमीके तटपर गये। उन्होंने ब्राह्मणोंको धन दिया, पितरों और द्विजोंको तृप्त किया और अपने पुरोहितको धनके साथ यह कहकर भेजा—'आप अन्य तीर्थोंमें जाकर धन-दान करें।' राजाका यह सब कार्य पुरोहित नहीं जानते थे। उनके चले जानेपर राजाने सेनाको भी भेज दिया और स्वयं अकेले ही गङ्गातटपर रह गये। उन्होंने गङ्गा, सूर्य तथा देवताओंको सुनाकर कहा—'यदि मैंने दान, होम और प्रजा-पालन किया हो तो इस सत्यके प्रभावसे वह पतिव्रता ब्राह्मणी मेरी आयु लेकर जीवित हो जाय।' यों कहकर राजा अग्निमें प्रवेश कर गये। उसी समय पुरोहितकी पत्नी जीवित हो गयी।

राजगुरु मधुच्छन्दाको जब यह बात मालूम हुई कि 'राजा अग्निमें प्रवेश कर गये, मेरी पतिव्रता पत्नी मरकर फिर जी उठी और उसीके लिये महाराजने अपने जीवनका परित्याग किया है,' तब उनका ध्यान अपने कर्तव्यकी ओर गया। उन्होंने सोचा—'मैं भी अग्निमें प्रवेश करके अपने प्रिय मित्रके पास जाऊँ अथवा यहीं रहकर तपस्या करूँ?' अन्तमें वे इस निश्चयपर पहुँचे कि 'मेरा कर्तव्य तथा पुण्यकार्य यही है कि पहले राजाको जीवित करूँ, उसके बाद प्रियाके पास जाऊँ।' यह विचारकर उन्होंने सूर्यदेवका स्तवन किया, क्योंकि उनके सिवा दूसरा कोई सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला नहीं है।

६०- खड्गतीर्थ और आत्रेयतीर्थकी महिमा

२३६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


मधुच्छन्दा बोले— मुक्तिस्वरूप, अमित तेजस्वी भगवान् सूर्यको नमस्कार है। ओंकारके अर्थभूत छन्दोमय देवको नमस्कार है। जो विरूप, सुरूप, त्रिगुण, त्रिमूर्ति, सृष्टि, पालन और संहारके हेतु तथा सबके प्रभु हैं, उन भगवान् सूर्यको नमस्कार है।

इस स्तोत्रसे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने कहा—'कोई वर माँगो।' मधुच्छन्दा बोले—'देवेश्वर! राजाका जीवनदान दीजिये। प्रिय वचन बोलनेवाली मेरी पत्नीको भी जीवित रखिये और मुझे तथा राजाके लिये भी उत्तम पुत्र प्रदान कीजिये।' जगदीश्वर भगवान् सूर्यने रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित राजा शर्यातिको जीवित करके दे दिया, ब्राह्मणकी पत्नीको भी जिलाया तथा और भी श्रेष्ठ एवं कल्याणमय वर प्रदान किये। तदनन्तर राजा प्रसन्न हो पुरोहितके साथ प्रियजनोंसे घिरे हुए सुखपूर्वक अपने देशको गये। उस स्थानपर तीन हजार गुणवान् तीर्थोंका निवास है। मुने! उसी समयसे उस स्थानका नाम भानुतीर्थ, मृतसंजीवनतीर्थ, शर्यातीर्थ और माधुच्छन्दसतीर्थ हो गया। वह स्मरणमात्रसे पापोंको दूर भगाता है। उन तीर्थोंमें किया हुआ स्नान और दान सम्पूर्ण यज्ञोंका फल देनेवाला है।


खड्गतीर्थ और आत्रेयतीर्थकी महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं— गौतमीके उत्तर-तटपर खड्गतीर्थ है, जहाँ स्नान और दान करनेसे मनुष्य मोक्षका भागी होता है। नारद! मैं वहाँका वृत्तान्त बतलाता हूँ। पैलूष नामसे विख्यात एक ब्राह्मण थे, जो कवषके पुत्र थे। वे कुटुम्बके भारसे विवश हो धनके लिये इधर-उधर दौड़ा करते थे, किंतु उन्हें कहींसे भी कुछ नहीं मिलता था। दैव तो अत्यन्त विमुख था ही, पुरुषार्थ भी निष्फल हो गया। इससे पैलूषको बड़ा वैराग्य हुआ। वे सोचने लगे—'यह तृष्णा मुझे बलपूर्वक पापकी ओर खींचती है। तृष्णे! तूने मेरे अज्ञानवश बड़ा अपकार किया है, किंतु अब तुझे दूरसे ही नमस्कार है।' यह सोचकर बुद्धिमान् पैलूषने मन-ही-मन विचार किया—'इस तृष्णाका नाश करनेके लिये क्या होना चाहिये?' फिर उन्होंने अपने पिता कवषसे पूछा—'तात! मैं ज्ञानरूपी खड्गसे क्रोध और लोभका तथा अत्यन्त दुस्तर संसारका कैसे छेदन करूँ? इसका उपाय बतलाइये।'

कवषने कहा— वैदिक श्रुतिका कथन है कि ईश्वरसे ज्ञानकी इच्छा करे; अतः तुम महादेवजीकी आराधना करो। उससे तुम्हें ज्ञान प्राप्त होगा।

'बहुत अच्छा' कहकर पैलूषने ज्ञान-प्राप्तिके उद्देश्यसे महेश्वरकी अर्चना की। इससे संतुष्ट होकर उन्होंने ब्राह्मणको ज्ञान प्रदान किया। ज्ञान प्राप्त होनेपर परम बुद्धिमान् कवषने इस प्रकार मुक्तिदायिनी गाथाका गान किया—'मनुष्यका पहला शत्रु है क्रोध। उसका फल तो कुछ भी नहीं है, उलटे वह शरीरका नाश करता है; अतः ज्ञानरूपी खड्गसे उसका नाश करके परम आनन्दको प्राप्त करे। नाना प्रकारकी तृष्णा बन्धनमें डालनेवाली माया है, वह पाप कराती है; अतः ज्ञानरूपी खड्गसे उसका नाश कर देनेपर मनुष्य सुखसे रहता है।* आसक्ति देवता आदिके लिये भी बहुत बड़ा अधर्म है। आत्मा असङ्ग है, उसके


* क्रोधस्तु प्रथमं शत्रुुर्निष्फलो देहनाशनः । ज्ञानखड्गेन तं छित्त्वा परं सुखमाप्नुयात् ॥
तृष्णा बहुविधा माया बन्धनी पापकारिणी । छित्त्वैतां ज्ञानखड्गेन सुखं तिष्ठति मानवः ॥
(१३९ । १३-१४)

८२- आत्रेयमुनिके द्वारा इन्द्रके ऐश्वर्यका दर्शन

  • खड्गतीर्थ और आत्रेयतीर्थकी महिमा * २३७

लिये भी आसक्ति महान् शत्रु है। ज्ञानरूपी खड्गसे इस आसक्तिका नाश करके शिव-सायुज्य प्राप्त करे। संशय महानाशका कारण है। वह धर्म और अर्थका भी विनाश करनेवाला है। उस संशयका नाश करके जीव अपने परम अभीष्टकी सिद्धि कर सकता है। आशा पिशाचीकी भाँति चित्तमें प्रवेश करती है और सम्पूर्ण सुखोंको भस्म कर डालती है। पूर्ण अहंता (अपरिच्छिन्न आत्मबोध)-रूपी खड्गसे उसका नाश करके जीवन्मुक्ति प्राप्त करनी चाहिये।'

तदनन्तर पैलूष ज्ञान प्राप्त करके गङ्गा-तटपर रहने लगे। ज्ञानरूपी खड्गसे उनका मोह नष्ट हो गया था, अतः उन्होंने मोक्ष प्राप्त कर लिया। तबसे वह स्थान खड्गतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। ज्ञानतीर्थ, कवषतीर्थ, पैलूषतीर्थ और सर्वकामदतीर्थ आदि छः हजार तीर्थ वहाँ वास करते हैं, जो पापराशिके नाशक और अभीष्ट वस्तुओंके दाता हैं।

उसके बाद आत्रेयतीर्थ है। उसीको अन्विन्द्रतीर्थ भी कहते हैं। वह बहुत ही उत्तम है। वह खोये हुए राज्यकी प्राप्ति करानेवाला है। उसका माहात्म्य बतलाता हूँ, सुनो। एक बार गौतमीके उत्तर-तटपर आत्रेय ऋषिने अनेकों ऋत्विज मुनियोंके साथ सत्र आरम्भ किया। उसमें हव्यवाहन अग्नि ही होता थे। इस प्रकार सत्र पूरा होनेपर महर्षिने माहेश्वरी इष्टिका अनुष्ठान किया। इससे अणिमा आदि आठ प्रकारके ऐश्वर्यकी प्राप्ति हुई तथा उनमें सर्वत्र आने-जानेकी शक्ति हो गयी। वे परम मनोहर इन्द्रभवन, स्वर्गलोक तथा रसातलमें अपनी तपस्याके प्रभावसे आने-जाने लगे। एक समय वे इन्द्रलोकमें गये। वहाँ उन्होंने देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रको देखा, जो अप्सराओंका उत्तम नृत्य देख रहे थे। सिद्ध और साध्यगण उनकी स्तुति कर रहे थे। वह सब देखकर पुनः अपने आश्रमपर लौट आये। कहाँ पवित्र गुणोंवाले रत्नोंसे भरी हुई अत्यन्त रमणीय इन्द्रपुरी और कहाँ श्रीहीन, सुवर्णरहित अपना आश्रम! यह देखकर ब्राह्मणको अपने आश्रमसे वैराग्य-सा हो गया। उनके मनमें शीघ्र ही देवताओंका राज्य प्राप्त करनेकी अभिलाषा हुई। तब उन्होंने अपनी प्रियासे कहा—'देवि! अब मैं उत्तम-से-उत्तम फल-मूल भी, चाहे वे कितने ही अच्छे ढंगसे क्यों न बने हों, नहीं खा सकता। मुझे तो स्वर्गलोकके अमृत, परम पवित्र भक्ष्य-भोजन, श्रेष्ठ आसन, स्तुति, दान, सुन्दर सभा, अस्त्र-शस्त्र, मनोहर वस्त्र, अमरावतीपुरी और नन्दनवनकी याद आती है।' यों कहकर महात्मा आत्रेयने तपस्याके प्रभावसे विश्वकर्माको बुलाया और इस प्रकार कहा—'महात्मन्! मैं इन्द्रका पद चाहता हूँ। आप शीघ्र ही यहाँ इन्द्रपुरीका निर्माण कीजिये। इसके विपरीत यदि आपने कोई बात मुँहसे निकाली तो मैं निश्चय ही आपको भस्म कर डालूँगा।'

८३- अपने मोहके कारण आत्रेयमुनिका लज्जित होना

२३८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

आत्रेयके यों कहनेपर प्रजापति विश्वकर्माने तत्काल ही वहाँ मेरुपर्वत, देवपुरी, कल्पवृक्ष, कल्पलता, कामधेनु, वज्र आदि मणियोंसे विभूषित, सुन्दर तथा अत्यन्त चित्रकारी किये हुए गृह बनाये। इतना ही नहीं, उन्होंने सर्वाङ्गसुन्दरी शचीकी भी आकृति बनायी, जो कामदेवकी विहारशाला-सी प्रतीत होती थी। क्षणभरमें सुधर्मा सभा, मनोहारिणी अप्सराएँ, उच्चैःश्रवा अश्व, ऐरावत हाथी, वज्र आदि अस्त्र और सम्पूर्ण देवताओंका निर्माण हो गया। अपनी पत्नीके मना करनेपर भी आत्रेयने शचीके समान रूपवाली उस स्त्रीको अपनी भार्या बना लिया। वज्र आदि अस्त्रोंको भी धारण किया। नृत्य और संगीत आदि सब कुछ वहाँ उसी तरहसे होने लगा, जिस प्रकार वह इन्द्रपुरीमें देखा गया था। स्वर्गलोकका सम्पूर्ण सुख पाकर मुनिवर आत्रेयका चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। आपातरमणीय विषयोंकी भी भला, किस पुरुषको अपेक्षा नहीं होती। दैत्यों और दानवोंने जब स्वर्गका वैभव पृथ्वीपर उतरा हुआ सुना, तब उन्हें बड़ा क्रोध हुआ। वे परस्पर कहने लगे—‘क्या कारण है कि इन्द्र स्वर्गलोकको छोड़कर पृथ्वीपर सुख भोगनेके लिये आया है? हमलोग अभी वृत्रासुरका वध करनेवाले उस इन्द्रसे युद्ध करनेके लिये चलें।’ ऐसा निश्चय करके असुरोंने वहाँ आकर महर्षि आत्रेयको और उनके द्वारा निर्मित इन्द्रपुरीको भी घेर लिया। फिर तो उनपर बड़े-बड़े शस्त्रोंकी मार पड़ने लगी। इससे भयभीत होकर आत्रेयने कहा—‘मैं इन्द्र नहीं हूँ। मेरी यह भार्या भी शची नहीं है। न तो यह इन्द्रपुरी है और न यहाँ इन्द्रका नन्दनवन है। वृत्रहन्ता, वज्रधारी और सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्र तो स्वर्गमें ही हैं। मैं तो वेदवेत्ता ब्राह्मण हूँ और ब्राह्मणोंके साथ ही गौतमीके तटपर निवास करता हूँ। दुर्देवकी प्रेरणासे मैंने यह कर्म कर डाला, जो न तो वर्तमान कालमें सुख देनेवाला है और न भविष्यमें ही।’

असुर बोले—मुनिश्रेष्ठ आत्रेय! यह इन्द्रका अनुकरण छोड़कर यहाँका सारा वैभव समेट लो, तभी तुम कुशलसे रह सकते हो; अन्यथा नहीं।

आत्रेयने कहा—‘मैं अग्निकी शपथ खाकर सच-सच कहता हूँ—आपलोग जैसा कहेंगे, वैसा ही करूँगा।’ दैत्योंसे यों कहकर वे पुनः विश्वकर्मासे बोले—‘प्रजापते! आपने मेरी प्रसन्नताके लिये जो इन्द्रपदका निर्माण किया था, इसका फिर उपसंहार कर लीजिये और ऐसा करके मुझ ब्राह्मण मुनिकी शीघ्र रक्षा कीजिये। मुझे फिर अपना वही आश्रम लौटा दीजिये, जहाँ मृग, पक्षी, वृक्ष और जल हैं। मुझे इन दिव्य भोगोंकी कोई आवश्यकता नहीं है। शास्त्रीय मर्यादाका उल्लङ्घन करके प्राप्त की हुई कोई भी वस्तु सुखद नहीं होती।’

६१- परुष्णीतीर्थ, नारसिंहतीर्थ, पैशाचनाशनतीर्थ, निम्नभेदतीर्थ और शङ्खह्रदतीर्थकी महिमा

* परुष्णीतीर्थ, नारसिंहतीर्थ, पैशाचनाशनतीर्थ, निम्नभेद-तीर्थ और शङ्खह्रदतीर्थकी महिमा * २३१

‘बहुत अच्छा’ कहकर प्रजापतिने उस इन्द्रपुरीके वैभवको समेट लिया। उस देशको निष्कण्टक बनाकर दैत्य फिर अपने स्थानको चले गये। विश्वकर्मा भी हँसते-हँसते अपने धामको पधारे। आत्रेय भी अपने शिष्यों और पत्नीके साथ गौतमी-तटपर रहते हुए तपस्यामें संलग्न हो गये। उनका जो यज्ञ चल रहा था, उसमें उन्होंने लज्जित होकर कहा—‘अहो! मोहकी कैसी महिमा है कि मेरे चित्तमें भी भ्रान्ति आ गयी। यह क्या मैंने महेन्द्रपद पाया और क्या-क्या उसके लिये किया।’

इस प्रकार लज्जित हुए आत्रेयसे देवताओंने कहा—‘महाबाहो! लज्जा छोड़ो। इससे तुम्हारी बड़ी ख्याति होगी। जो लोग इस आत्रेयतीर्थमें स्नान करेंगे, वे भविष्यमें इन्द्र होंगे और इसके स्मरणसे उन्हें सुखकी प्राप्ति होगी।’ यों कहकर देवता चले गये और आत्रेय मुनि भी बहुत संतुष्ट हुए।


परुष्णीतीर्थ, नारसिंहतीर्थ, पैशाचनाशनतीर्थ, निम्नभेद-तीर्थ और शङ्खह्रदतीर्थकी महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं— परुष्णी नामक तीर्थ तीनों लोकोंमें विख्यात है। उसके पापनाशक स्वरूपका वर्णन करता हूँ, सुनो। एक बार महर्षि अत्रिने ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजीकी आराधना की। उन तीनोंके संतुष्ट होनेपर महर्षिने कहा— ‘आपलोग मेरे पुत्र हों। साथ ही मेरे एक परम सुन्दरी कन्या भी हो।’ इस वरदानके अनुसार वे तीनों देवता उनके पुत्र हुए। महर्षिने जो कन्या उत्पन्न की, उसका नाम आत्रेयी हुआ। अत्रिके तीनों पुत्र क्रमशः दत्त, सोम और दुर्वासाके नामसे प्रसिद्ध हुए। अग्निसे अङ्गिराकी उत्पत्ति हुई थी। अङ्गारसे उत्पन्न होनेके कारण ही उन्हें अङ्गिरा कहते हैं। महर्षि अत्रिने अङ्गिरासे ही अपनी तेजस्वी कन्या आत्रेयीको ब्याह दिया। अङ्गिरामें अग्निकी तीव्रताका प्रभाव था। अतः वे आत्रेयीसे सदा परुष (कठोर) भाषण किया करते थे। आत्रेयी भी सदा पतिकी सेवामें संलग्न रहती थीं। आत्रेयीके गर्भसे महान् बलवान् और पराक्रमी आङ्गिरस नामक पुत्र हुए। अङ्गिरा आत्रेयीको प्रतिदिन कटु वचन सुनाते और आङ्गिरस नामवाले पुत्र सदा अपने पिताको शान्त किया करते थे। एक दिन आत्रेयी पतिके कठोर वाक्यसे उद्विग्न हो उठीं और दीनभावसे हाथ जोड़कर अपने श्वशुर अग्निदेवसे बोलीं— ‘भगवन् हव्यवाह! मैं अत्रिकी कन्या और आपके पुत्रकी पत्नी हूँ, पुत्रों और पतिकी सेवामें सदा संलग्न रहती हूँ; तो भी पतिदेव मुझे कटु वचन सुनाते और व्यर्थ ही रोषपूर्ण दृष्टिसे देखा करते हैं। सुरश्रेष्ठ! आप मेरे पति-देवताको समझा दें।

अग्नि बोले— कल्याणी! तुम्हारे पति अङ्गिरा ऋषि अङ्गारसे प्रकट हुए हैं। वे जिस प्रकार शान्त हो सकें, वैसी नीति बर्तनी चाहिये। तुम्हारे पति अङ्गिरा जब अग्निमें प्रवेश करें, तब तुम मेरी आज्ञासे जलरूप होकर उन्हें बहा ले जाना।

आत्रेयीने कहा— भगवन्! मैं उनकी कठोर बातें सह लूँगी, किंतु मेरे स्वामी अग्निमें प्रवेश न करें। जो स्त्रियाँ अपने स्वामीसे प्रतिकूल चलती हैं, उनके जीवनसे क्या लाभ। मैं तो इतना ही चाहती थी कि वे शान्तिमय वचन बोलें।

अग्नि बोले— जलमें, शरीरमें तथा स्थावर-जङ्गमरूप जगत्में सर्वत्र मेरा निवास है। मैं

२४० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

तुम्हारे पतिका नित्य आश्रय हूँ, क्योंकि मैं ही उनका जनक हूँ। जो मैं हूँ, वही वे भी हैं। यह जानकर तुम्हें चिन्ता नहीं करनी चाहिये। एक बात और है—जलको तो तुम माता समझो और अग्निको श्वशुर। इस बातका अपनी बुद्धिसे भलीभाँति निश्चय करके तुम विषाद न करो।

आत्रेयीने कहा—भगवन्! आप जलको माता कहते हैं और मैं आपके पुत्रकी पत्नी हूँ। जननी होकर फिर पत्नी कैसे रह सकूँगी, जलका रूप धारण करनेसे यह विरोध सामने आता है।

अग्नि बोले—स्त्री पहले तो पत्नी होती है। फिर स्वामीका भरण-पोषण करनेसे भार्या बनती है। पुत्रका जन्म देनेपर उसे जाया कहते हैं। इसी प्रकार अपने गुणोंके कारण वह कलत्र कहलाती है। भद्रे! तुम भी यही रूप धारण करती हो। अतः मेरी आज्ञाका पालन करो। जो एक बार पत्नीके गर्भमें आकर पुत्ररूपसे उत्पन्न हो चुका, वह वास्तवमें उसका पुत्र ही है और वह स्त्री भी जननी ही है। अतः वैदिक तत्त्वके विद्वान् कहते हैं कि पुत्र उत्पन्न हो जानेपर नारी पत्नी नहीं रह जाती।

श्वशुरके मुखसे यह वचन सुनकर आत्रेयीने अग्निरूपमें आये हुए अपने पतिको जलसे आप्लावित कर दिया। फिर वे दोनों पति-पत्नी गङ्गाजीके जलसे जा मिले। उस समय दोनोंके स्वरूप शान्त थे। जैसे लक्ष्मीके साथ श्रीविष्णु, उमाके साथ शंकर तथा रोहिणीके साथ चन्द्रमा हैं, उसी प्रकार वे दोनों शोभा पाने लगे। पतिको आप्लावित करती हुई आत्रेयीने जलमय शरीर धारण किया था, अतः वह परुष्णी नदीके नामसे विख्यात हुई और गङ्गामें जा मिली। उसमें स्नान करनेसे सौ गोदानोंका पुण्य प्राप्त होता है। आङ्गिरस नामवाले पुत्रने गङ्गा और परुष्णीके संगमपर बहुत-से यज्ञ किये। वहाँ स्नान-दान आदिसे जो पुण्य होता है, उसका वर्णन नहीं हो सकता।

गङ्गाके उत्तर-तटपर नारसिंह नामक विख्यात तीर्थ है, जो सबकी रक्षा करनेवाला है। उसके प्रभावका वर्णन करता हूँ, सुनो। पूर्वकालमें हिरण्यकशिपु नामक दैत्य हुआ था, जो बलवानोंमें श्रेष्ठ था। तपस्या और पराक्रमकी दृष्टिसे भी वह बहुत बढ़ा हुआ था। देवता भी उसे परास्त नहीं कर पाते थे। उसका पुत्र भगवान्‌का भक्त हुआ। उसके साथ द्वेष करनेके कारण हिरण्यकशिपुका अन्तःकरण मलिन हो गया था। उस समय भगवान् अपनी विश्वरूपताका परिचय देते हुए सभामण्डपके खंभेसे नरसिंहरूपमें प्रकट हुए और उस दैत्यका वध करके उन्होंने उसकी सेनाको भी मार भगाया। क्रमशः युद्धमें समस्त दैत्योंका संहार करके रसातलके शत्रुओंपर विजय पायी। उसके बाद वे स्वर्गलोकमें गये। वहाँ रहनेवाले दैत्योंको परास्त करके वे पुनः पृथ्वीपर आये। यहाँ पर्वत, समुद्र, नदी, ग्राम और वनोंमें नाना रूप धारण करके जो दैत्य निवास करते थे, उन सबका भगवान् नृसिंहने संहार कर डाला। आकाश, वायु तथा ज्योतिर्मय लोकमें पहुँचे हुए दैत्योंको भी जीवित नहीं छोड़ा। उनके नख वज्रपातसे भी कठोर थे। गर्दन और मुखपर बड़े-बड़े बाल थे। उनकी गर्जना सुनकर दैत्यपत्नियोंके गर्भ गिर जाते थे। उन्होंने समस्त राक्षसोंको परास्त किया। भयंकर सिंहनाद, प्रलयाग्निके समान दृष्टि, थप्पड़ और शरीरके धक्केसे समस्त असुरोंको चूर्ण कर डाला।

इस प्रकार अनेक दैत्योंका संहार करके नरसिंहजी गौतमीके तटपर गये, जो उन्हींके चरणकमलोंसे निकली हुई और मन तथा नेत्रोंको आनन्द देनेवाली थी। वहाँ दण्डकारण्यका स्वामी

८४- भगवान् नृसिंहके द्वारा आम्बर्यका वध

* परुष्णीतीर्थ, नारसिंहतीर्थ, पैशाचनाशनतीर्थ, निम्नभेद-तीर्थ और शङ्खह्रदतीर्थकी महिमा * २४१

आम्बर्य नामक दैत्य रहता था, जो देवताओंके लिये भी दुर्जय था। उसके पास बहुत बड़ी सेना थी। भगवान् नृसिंहका उस दैत्यके साथ अत्यन्त भयंकर एवं रोमाञ्चकारी युद्ध हुआ। श्रीहरिने गोदावरीके उत्तरतटपर अपने शत्रु का संहार कर डाला। वह स्थान तीनों लोकोंमें नारसिंहतीर्थके नामसे विख्यात हुआ। वहाँ किया हुआ स्नान-दान आदि पुण्यकार्य समस्त पापरूपी ग्रहोंका शमन, वृद्धावस्था और मृत्युका निवारण तथा सबकी रक्षा करनेवाला है। जैसे सम्पूर्ण देवताओंमें कोई भी भगवान् विष्णुके समान नहीं है, उसी प्रकार समस्त तीर्थोंमें नारसिंहतीर्थ अनुपम और सर्वोत्तम है। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य भगवान् नृसिंहका पूजन करे तो उसे स्वर्ग, मर्त्यलोक और पातालका भी कोई सुख दुर्लभ नहीं रहता। बिना श्रद्धा भी जिनका नाम लेनेपर समस्त पापोंका संहार हो जाता है, वे साक्षात् भगवान् नरसिंह ही जहाँ विराजमान हैं, उस तीर्थके सेवनसे प्राप्त होनेवाले फलका कौन वर्णन कर सकता है। जैसे नृसिंहजीसे बड़ा कहीं कोई देवता नहीं है, उसी प्रकार नृसिंहतीर्थके समान कहीं कोई तीर्थ नहीं है।

गङ्गाके उत्तर-तटपर पैशाचनाशनतीर्थ विख्यात है। नारद! वहाँ पूर्वकालमें एक ब्राह्मण पिशाच-योनिसे मुक्त हुआ था। सुयज्ञके पुत्र अजीगार्ति एक विख्यात ब्राह्मण थे। एक समय अकाल पड़नेपर कुटुम्ब-पालनके भारसे दुःखी एवं पीड़ित होकर उन्होंने अपने मझले पुत्र शुनःशेपको वधके लिये क्षत्रियके हाथ बेच दिया। उसके बदलेमें अजीगार्तिको बहुत धन मिला था। शुनःशेप ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ था। ऐसे पुत्रको भी अजीगार्तिने धनके लोभसे बेच डाला। आपत्तिमें पड़नेपर विद्वान् पुरुष भी कौन-सा पाप नहीं कर डालता। समय आनेपर अजीगार्तिकी मृत्यु हुई और वे नरकमें डाले गये। क्योंकि इस लोकमें पूर्वजन्मके किये हुए पापोंका भोगके बिना क्षय नहीं होता। अनेक पाप-योनियोंमें पड़नेके पश्चात् अजीगार्ति भयंकर आकारवाले पिशाच हुए। उन्हें निर्जल और निर्जन वनमें सूखे काठपर रहना पड़ता था। गर्मीमें जहाँ दावानल फैल जाता, वही यमराजके दूत उस प्रेतको डाल देते थे। कन्या, पुत्र, पृथ्वी, अश्व तथा गौओंका विक्रय करनेवाले मनुष्य महाप्रलय-कालतक नरकसे छुटकारा नहीं पाते*। अपने किये हुए पापोंके फलस्वरूप भयंकर यमदूतोंद्वारा नरकमें पकाये जानेपर वह प्रेत जोर-जोरसे रोने लगा।


* कन्यापुत्रमहीवाजिगवां विक्रयकारिणः। नरकान्न निवर्तन्ते यावदाभूतसंप्लवम् ॥
(१५०।९)

८५- पिशाचरूपी अजीगर्तिका अपने पुत्र शुनःशेपसे अपना दुःख निवेदन करना

२४२ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

एक दिन अजीगर्तिका मझला पुत्र शुनःशेप मार्गमें कहीं जा रहा था। उसने रोते हुए पिशाचकी कातर वाणी सुनी और पूछा—'आप कौन हैं, जो अत्यन्त दुःखी होकर रोते हैं? अजीगर्तने बड़े दुःखसे कहा—'मैं शुनःशेपका पिता हूँ। भारी पापकर्म करके भयानक प्रेतयोनिमें पड़ा हूँ। पहले तो बारंबार नरकोंमें यातनाएँ

सहता रहा और अब प्रेतयोनिको प्राप्त हुआ हूँ। जो-जो पापकर्म करनेवाले हैं, उन सबकी यही गति होती है।' यह सुनकर अजीगर्तिके पुत्रको बड़ा दुःख हुआ। उसने कहा—'पिताजी! मैं ही आपका पुत्र शुनःशेप हूँ। हाय, मेरे दोषसे आपकी यह दशा हुई! मुझे बेचनेके कारण आपको इस प्रकार नरकोंमें आना पड़ा है। अब मैं आपको स्वर्गमें पहुँचाऊँगा।' ऐसी प्रतिज्ञा करके उसने गङ्गाजीका चिन्तन किया और पिताको उत्तम लोक प्राप्त करानेकी चेष्टामें संलग्न हो वहाँसे चल दिया। उसने सोचा—'जो सम्पूर्ण

दुःखरूपी अग्निसे संतप्त हैं और मोहके महासागरमें डूब रहे हैं, उन देहधारियोंके लिये गङ्गाजीको छोड़कर तीनों लोकोंमें दूसरा कोई सहारा नहीं है। ऐसा निश्चय करके पिताका दुर्गतिसे उद्धार करनेकी कामना लेकर शुनःशेप पवित्र भावसे गौतमीके तटपर गया और वहाँ स्नान करके भगवान् विष्णु और शिवका स्मरण करते हुए उसने प्रेतरूपी दुःखी पिताको जल दिया। जलाञ्जलि देते ही अजीगर्तने पवित्र होकर परम पुण्यमय दिव्य शरीर धारण कर लिया और विमानपर बैठकर देवसमुदायसे सेवित वैकुण्ठधामको प्रस्थान किया। गङ्गा, भगवान् विष्णु, शिव और ब्रह्माजीके प्रभावसे अजीगर्ती हजारों सूर्योंके समान तेजस्वी रूप धारण करके वैकुण्ठधाममें रहने लगे। तबसे यह स्थान पैशाचनाशनतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसके स्मरणमात्रसे मनुष्योंके बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं। नारद! इस प्रकार मैंने तुमसे इस तीर्थका माहात्म्य सुनाया। यहाँ और भी तीन सौ तीर्थ हैं, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं।

निम्नभेद नामक तीर्थ सब पापोंका नाश करनेवाला है। वह गङ्गाके उत्तर-तटपर है। उसकी प्रसिद्धि तीनों लोकोंमें है। उसके स्मरणमात्रसे सम्पूर्ण पापोंका क्षय हो जाता है। वहीं वेदद्वीप है। उसके दर्शनसे मनुष्य वेदोंका विद्वान् होता है। एक समयकी बात है—परम धर्मात्मा राजा पुरूरवाने उर्वशी नामक अप्सराकी कामना की। मादक नेत्रोंवाली कामिनीको देखकर कौन पुरुष मोहमें नहीं पड़ता। उर्वशी राजाके स्थानपर गयी। उसने राजासे यह शर्त की कि मैं जबतक आपको नग्न न देखूँ, तभीतक आपके पास रह सकती हूँ। उसके रहनेकी यह अवधि स्वीकार करके राजाने उस रमणीया अप्सराको ग्रहण किया। एक दिन जब वह पलंगपर सोयी हुई थी, राजा पुरूरवा

* परुष्णीतीर्थ, नारसिंहतीर्थ, पैशाचनाशनतीर्थ, निम्नभेद-तीर्थ और शङ्खह्रदतीर्थकी महिमा * २४३

उठे। उसी समय उन्हें नग्न देखकर उर्वशी वहाँसे चली गयी। उसके जानेसे राजाको बड़ा दुःख हुआ। उनका अग्निहोत्र और भोजन छूट गया। वे न किसीकी बात सुनते थे और न किसीकी ओर देखते थे। मृतककी-सी अवस्थामें पड़े रहते थे। उस समय पुरोहितने युक्तियुक्त वचनोंद्वारा उन्हें समझाया—'राजन्! तुम तो बुद्धिमान् हो; क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि इन स्त्रियोंका हृदय भेड़ियोंकी तरह कठोर होता है। तुम शोक न करो। महाराज! इस संसारमें कौन ऐसा पुरुष है, जो कामिनियोंसे ठगा न गया हो। वञ्चना, क्रूरता, चञ्चलता और दुश्चरित्रता—ये जिन स्त्रियोंके स्वाभाविक दुर्गुण हैं, वे सुखदायिनी कैसे हो सकती हैं? कालने किसको नहीं मारा। याचक होनेपर किसको गौरव प्राप्त हुआ। धन-सम्पत्तिसे किसका मन भ्रान्त नहीं हुआ और युवती स्त्रियोंने किसको धोखा नहीं दिया।* राजन्! जिनका हृदय मदसे उन्मत्त रहता है, वे युवतियाँ स्वप्न और मायाके समान मिथ्या हैं। वे किसको सुख दे सकती हैं। यह जानकर तुम निश्चिन्त हो जाओ। महामते! भगवान् शंकर, विष्णु तथा गोदावरी नदीको छोड़कर तीनों लोकोंमें दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो दुःखियोंको शरण दे सके।'

पुरोहितका यह कथन सुनकर राजाने यत्नपूर्वक अपने दुःखको दूर किया। वे गोदावरीके मध्यभागमें (जहाँ रेत थी) रहकर भगवान् शिव, विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य, गङ्गा तथा अन्यान्य देवताओंकी आराधना करने लगे। जो विपत्तिमें पड़नेपर तीर्थों और देवताओंका सेवन नहीं करता, वह कालके वशमें पड़ा हुआ जीव किस दशाको प्राप्त होगा। राजा पुरूरवा एकमात्र भगवान्‌के शरण हो उत्सुकतापूर्वक गौतमीका सेवन करने लगे। संसारकी ओरसे उनका मन हट गया और भगवान्‌के भजनमें उनकी बड़ी श्रद्धा हो गयी। उन्होंने ऋत्विजोंको साथ लेकर बहुत दक्षिणावाले अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया। तबसे वह स्थान वेदद्वीप और यज्ञद्वीप कहलाने लगा। वहाँ सदा ही पूर्णिमाकी रातमें उर्वशी आया करती है। जो मनुष्य उस द्वीपकी प्रदक्षिणा करता है, उसके द्वारा समुद्रसहित पृथ्‍वीकी परिक्रमा हो जाती है। जो पुण्यात्मा वहाँ वेदों और यज्ञोंका स्मरण करता है, उसे वेदोंके स्वाध्याय और यज्ञोंके अनुष्ठानका फल मिलता है। उसको ऐलतीर्थ जानना चाहिये। वही पुरूरवस्-तीर्थ है। उसे ही वसिष्ठतीर्थ और निम्नभेदतीर्थ भी कहते हैं। राजा पुरूरवाके किसी भी कार्यमें कुछ भी निम्नता (न्यूनता) नहीं होती थी। एक ही कार्य उनसे निम्नश्रेणीका हुआ, यह कि वे सर्वथा उर्वशीमें आसक्त हो गये थे; परंतु गौतमी गङ्गा और महर्षि वसिष्ठने उनके इस निम्नत्वका भी भेदन कर दिया, इसलिये वह तीर्थ निम्नभेदके नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों प्रकारके अभीष्टकी सिद्धि देनेवाला है। जो निम्नभेदतीर्थमें स्नान करके इन देवताओंका दर्शन करता है, उसके इस लोक और परलोकमें कुछ भी निम्न नहीं होता। वह सब प्रकारसे उन्नतिको प्राप्त हो स्वर्गमें इन्द्रकी भाँति सुख भोगता है।

उसके आगे शङ्खह्रद नामक तीर्थ है। वहाँ शङ्ख और गदा धारण करनेवाले भगवान् निवास


* को नाम लोके राजेन्द्र कामिनीभिर्न वञ्चितः। वञ्चकत्वं नृशंसत्वं चञ्चलत्वं कुशीलता॥
इति स्वाभाविकं यासां ताः कथं सुखहेतवः। कालेन को न निहतः कोऽर्थी गौरवमागतः॥
श्रिया न भ्रामितः को वा योषिद्भिः को न खण्डितः।
(१५१।१३–१५)

६२- किष्किन्धातीर्थ और व्यासतीर्थकी महिमा

२४४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

करते हैं। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है। वहाँका इतिहास बतलाता हूँ, जो भोग और मोक्ष देनेवाला है। पूर्वकालमें सत्ययुगके आरम्भमें ब्रह्माण्डके भीतर अनेक रूपधारी राक्षस उत्पन्न हुए, जो सामवेदका गान करनेवाले थे। वे बलोन्मत्त राक्षस हाथमें आयुध धारण किये मुझे खा जानेके निमित्त आये। उस समय मैंने अपनी रक्षाके लिये जगद्गुरु भगवान् विष्णुको पुकारा। उन्होंने अपने चक्रसे राक्षसोंका संहार करके पातालको निष्कण्टक और स्वर्गको शत्रुशून्य बना दिया। फिर उन्होंने अत्यन्त हर्षमें भरकर शङ्ख बजाया, जिससे समस्त राक्षस नष्ट हो गये। श्रीविष्णुके शङ्खके प्रभावसे जिस स्थानपर यह घटना हुई, वह शङ्खतीर्थ कहलाया, जो मनुष्योंके लिये सब प्रकारसे कल्याणकारक, समस्त अभीष्ट वस्तुओंका दाता, स्मरणमात्रसे मङ्गलदायक, आयु और आरोग्यका जनक तथा लक्ष्मी और पुत्रकी वृद्धि करनेवाला है। उसके माहात्म्यके स्मरण अथवा पाठमात्रसे मनुष्य समस्त अभिलषित वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है।

किष्किन्धातीर्थ और व्यासतीर्थकी महिमा

**ब्रह्माजी कहते हैं—**किष्किन्धातीर्थ बहुत विख्यात है। वह मनुष्योंकी सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और समस्त पापोंको शान्त करनेवाला है। वहाँ भगवान् शंकर निवास करते हैं। नारद! उस तीर्थके स्वरूपका वर्णन करता हूँ, भक्तिपूर्वक सुनो। पूर्वकालमें दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामने किष्किन्धानिवासी वानरोंको साथ लेकर जब समस्त लोकोंको रुलानेवाले रावणको युद्धमें सेना और पुत्रोंसहित मार डाला, तब सीताको पुनः प्राप्त करके अपने भाई लक्ष्मण, महाबली वानर, बलवान् विभीषण और देवताओंके साथ वे स्वस्तिवाचनपूर्वक पुष्पकविमानसे अयोध्याकी ओर लौटे। पुष्पकविमान कुबेरका था। वह शीघ्रगामी और इच्छानुसार चलनेवाला था। भगवान् राम शत्रुओंका संहार करनेवाले और शरणार्थी पुरुषोंको शरण देनेवाले थे। उन्होंने विमानसे अयोध्या लौटते समय मार्गमें लोकपावनी गौतमी गङ्गाको देखा, जो समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली तथा मन और नेत्रोंके संतापका निवारण करनेवाली हैं। गङ्गाजीका दर्शन करके महाराज श्रीराम उनके तटपर उतरे और हनुमान् आदि सम्पूर्ण वानरोंको सम्बोधित करके हर्षगद्गद वाणीमें कहने लगे—'ये गौतमी गङ्गा सम्पूर्ण जीवोंकी जननी हैं। ये भोग तो देती ही हैं, मोक्ष भी दे सकती हैं। भयंकर पापोंका भी संहार कर

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डालती हैं। इनकी समानता करनेवाली दूसरी कौन नदी है, जिन्हें महर्षि गौतमने सबको शरण देनेवाले भगवान् शंकरकी आराधना करके जटासहित प्राप्त किया था। ये सम्पूर्ण अभिलषित फलोंकी जननी और अमङ्गलोंका नाश करनेवाली हैं। ये समस्त संसारको पवित्र करनेमें समर्थ हैं। समस्त सरिताओंकी जननी गङ्गाका आज प्रत्यक्ष दर्शन हुआ। मैं मन, वाणी और शरीरद्वारा सदा ही इन शरणागतवत्सला गङ्गाजीकी शरण लेता हूँ।'

भगवान् श्रीरामका यह वचन सुनकर समस्त वानरोंने गङ्गाजीमें डुबकी लगायी और सम्पूर्ण लौकिक उपहारों तथा अनेक प्रकारके पुष्पोंद्वारा उनकी विधिवत् पूजा की। महाराज श्रीरामचन्द्रजीने श्रीमहादेवजीका यथावत् पूजन करके सर्वभावोपयुक्त वाक्योंद्वारा स्तवन किया। सम्पूर्ण वानरोंने भी प्रसन्न होकर नृत्य और गान किया। भगवान् श्रीरामने अपनी प्रिया जानकी तथा प्रेमी वानरोंके साथ सुखपूर्वक वह रात व्यतीत की। सबेरे उठकर भगवान् अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक गोदावरी देवीकी स्तुति करने लगे। फिर अपने भृत्यगणोंका सम्मान करके वे वहाँ अनिर्वचनीय आनन्दका अनुभव करने लगे। उस निर्मल प्रभातमें सूर्योदय होनेपर विभीषणने दशरथनन्दन श्रीरामसे कहा—'भगवन्! हमलोग इस तीर्थमें रहनेसे अभी तृप्त नहीं हुए। अतः कुछ समय और निवास करें। मेरा विचार है, चार रात और यहाँ ठहरें। फिर सब लोग साथ ही अयोध्या चलेंगे।' विभीषणकी बातका वानरोंने भी अनुमोदन किया। फिर भगवान् शिवकी पूजा करते हुए चार रात और ठहरे। वहाँ महादेवजी सिद्धेश्वरके नामसे प्रसिद्ध थे और उन्हींके प्रभावसे रावण अत्यन्त प्रबल हो गया था। इस प्रकार सब लोग अपने द्वारा स्थापित किये हुए शिवलिङ्गकी पूजा करते हुए पाँच दिनोंतक वहाँ ठहरे रहे। श्रीरामने अपने सम्पूर्ण सहायकोंके साथ शुद्धातिशुद्ध हृदयसे सम्पूर्ण शिवलिङ्गोंको मस्तक झुकाया। किष्किन्धानिवासी सभी वानरोंद्वारा सेवित होनेके कारण वह स्थान किष्किन्धातीर्थ कहलाया। वहाँ स्नान करनेमात्रसे बड़े-बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं। भगवान्ने गौतमी गङ्गाको भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और कहा—'माता गौतमी! मुझपर प्रसन्न होओ।' इस तरह बारंबार कहकर वे विस्मित चित्तसे गोदावरीको देखते और उन्हें प्रणाम करते जाते थे। तबसे विद्वान् पुरुष उस पुण्यमय तीर्थको किष्किन्धातीर्थ कहने लगे। जो इस प्रसङ्गका पाठ, स्मरण अथवा भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, उसके पापको भी यह तीर्थ हर लेता है। फिर जो लोग वहाँ स्नान और दान करते हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है।

उसके बाद व्यासतीर्थ और प्राचेतसतीर्थ हैं। उनका माहात्म्य बतलाता हूँ, सुनो। मेरे दस मानस पुत्र हुए, जो जगत्की सृष्टि करनेवाले थे। वे पृथ्वीका अन्त कहाँ है—इस बातका पता लगानेके लिये चले गये। तब मैंने पुनः अन्य पुत्रोंको उत्पन्न किया, किंतु वे भी अपने भाइयोंकी खोज करनेके लिये चले गये। जो पहलेके गये थे, वे तो गये ही थे; ये भी लौटकर नहीं आये। उस समय परम बुद्धिमान् दिव्य आङ्गिरस नामक मुनि उत्पन्न हुए, जो वेद-वेदाङ्गोंके तत्त्वको जाननेवाले और सम्पूर्ण शास्त्रमें प्रवीण थे। वे अङ्गिराकी आज्ञासे पिताको नमस्कार करके तपस्याके लिये उद्यत हुए। गुरुजनोंमें गौरवकी दृष्टिसे माताका स्थान सबसे ऊँचा है तो भी मातासे बिना पूछे ही आङ्गिरसोंने तपस्या करनेका निश्चय कर लिया। इससे कुपित होकर माताने अपने पुत्रोंको शाप दिया—'जो पुत्र मेरी अवहेलना करके तपस्यामें

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प्रवृत्त हुए हैं, उन्हें किसी प्रकार सिद्धि नहीं प्राप्त होगी।' आङ्गिरसोंने अनेकों देशोंमें जाकर तपस्या की, किंतु उन्हें कहीं भी सिद्धि न मिली। वे सब इधर-उधर दौड़ते रहे, परंतु सभी स्थानोंमें कोई-न-कोई विघ्न आ जाता था। कहीं राक्षसोंसे, कहीं मनुष्योंसे, कहीं युवती स्त्रियोंसे और कहीं अपने शरीरके ही दोषसे तपस्यामें विघ्न पड़ जाता था। इस प्रकार भटकते हुए सब आङ्गिरस तपस्वियोंमें श्रेष्ठ अगस्त्यजीके पास गये और उन्हें नमस्कार करके विनीत भावसे बोले—'भगवन्! हम अनेक उपायोंसे बारंबार प्रयत्न करते हैं तो भी किस दोषसे हमारी तपस्या सिद्ध नहीं होती? आप तपस्यामें सबसे बढ़े-चढ़े हैं; अतः कोई उपाय हो तो बतायें। ब्रह्मन्! आप ज्ञानियोंमें भी ज्ञानी, वक्ताओंमें भी श्रेष्ठ वक्ता, संयमी पुरुषोंमें भी सबसे अधिक शान्त, दयावान्, प्रियकारी, क्रोधशून्य तथा द्वेषसे रहित हैं। अतः हमने जो पूछा है, उसे बताइये। जो अहंकारी, दयाहीन, गुरु-सेवारहित, असत्यवादी और क्रूर हैं, वे तत्त्वको नहीं जानते।'*

अगस्त्यने थोड़ी देरतक ध्यान किया, उसके बाद उन सब लोगोंसे धीरे-धीरे कहा—'आपलोग शान्तचित्त महात्मा हैं। ब्रह्माजीने आपको प्रजापति बनाया है। अबतक आपलोगोंकी तपस्या पूर्ण नहीं हुई—इसमें कोई-न-कोई कारण अवश्य है। आपलोग उस कारणका स्मरण करें। ब्रह्माजीने पहले जिन मानस पुत्रोंको उत्पन्न किया था, वे चले गये और बहुत सुखी हुए; परंतु जो उनकी खोजमें गये, वे ही फिर आङ्गिरस हुए हैं। वे ही आपलोग हैं, जो समय पाकर इस रूपमें आये हैं। आप धीरे-धीरे प्रयत्न करते रहें तो प्रजापतिसे भी बढ़-चढ़कर हो जायँगे—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। यहाँसे तपस्या करनेके लिये आप त्रिभुवनपावनी गङ्गाके तटपर जायँ। संसारमें शिववल्लभा गङ्गाके सिवा दूसरा कोई सिद्धिका उपाय नहीं है। वहाँ पावन प्रदेशमें आश्रमके भीतर ज्ञानद गुरुकी पूजा करें। वे आपलोगोंके सब संशयोंका निवारण करेंगे।'

तब आङ्गिरसोंने महर्षि अगस्त्यसे पूछा—'ज्ञानद किसको कहते हैं? ब्रह्मा, विष्णु, महेश, आदित्य, चन्द्रमा, अग्नि और वरुण—इनमें कौन ज्ञानद है?'

अगस्त्यजीने फिर कहा—'ज्ञानदका स्वरूप बतलाता हूँ' सुनो। जो जल है, वही अग्नि है। जो अग्नि है, वही सूर्य कहलाता है। जो सूर्य है, वही विष्णु है और जो विष्णु है, वही सूर्य। जो ब्रह्मा हैं, वही रुद्र हैं। जो रुद्र हैं, वही सब कुछ हैं। इस प्रकार जिसको एककी सर्वरूपताका ज्ञान हो, उसीको ज्ञानद कहते हैं। देशिक, प्रेरक, व्याख्याकार, उपाध्याय और शरीरका जनक आदि बहुत-से गुरु हैं; किंतु उनमें जो ज्ञानदाता गुरु है, वह सबसे बड़ा है। यहाँ उस ज्ञानकी बात कही गयी है, जिससे भेद-बुद्धिका नाश हो। एकमात्र अद्वितीय शिव ही सब कुछ हैं। विद्वान् ब्राह्मण उन्हींका इन्द्र, मित्र और अग्नि आदि अनेक नामोंसे वर्णन करते हैं। अनेक नाम और अनेक रूपोंमें जो भगवान्‌के तत्त्वका वर्णन किया जाता है, वह अज्ञानीजनोंका उपकार करनेके लिये है।'

मुनिका यह वचन सुनकर वे गाथा-गान करते हुए वहाँसे चले गये। उनमेंसे पाँच तो उत्तर-गङ्गाके तटपर गये और पाँच दक्षिण-गङ्गाके। वहाँ महर्षि अगस्त्यके बताये हुए देवताओंकी विधिपूर्वक पूजा करने लगे। विशेषतः आसनोंपर बैठकर वे तत्त्वका विचार किया करते थे। इससे


* साहंकारा दयाहीना गुरुसेवाविवर्जिताः। असत्यवादिनः क्रूरा न ते तत्त्वं विजानते॥
(१५८। १५)

६३- कुशतर्पण एवं प्रणीता-संगम-तीर्थकी महिमा

* कुशतर्पण एवं प्रणीता-संगम-तीर्थकी महिमा * २४७

उनके ऊपर समस्त देवता प्रसन्न हुए और बोले— 'विश्वयोनि ब्रह्माजीने युगके आदिमें जो स्रष्टाके पदकी कल्पना की थी, वह इसलिये कि अधर्मोंकी निवृत्ति हो, वेदोंकी स्थापना हो, सम्पूर्ण लोकोंका उपकार हो, धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धि हो तथा पुराण, स्मृति, वेद और धर्मशास्त्रोंके अर्थका ठीक-ठीक निश्चय हो। इसके अनुसार तुम सब लोगोंको जगत्-स्रष्टाका पद प्राप्त होगा। तुम सब उस पदके अनुरूप होओगे।' नारद! वे क्रमशः धीरे-धीरे प्रजापति होंगे। जब अधर्म बढ़ेगा, वेदोंका पराभव होगा और उनपर संकट आयेगा, उस समय वेदोंका उद्धार करनेके लिये वे भावी व्यास होंगे। गङ्गाका उत्तम तट ही उनकी तपस्याका उत्तम स्थान होगा और वहाँ शिव, विष्णु, मैं, सूर्य, अग्नि और जल—ये सब उपस्थित रहेंगे। इनसे बढ़कर पवित्र और इनसे श्रेष्ठ कहीं कुछ भी नहीं है। केवल परब्रह्म ही इन सबके आकारोंमें प्रकट हुआ है। सर्वस्वरूप शिव, जो व्यापक तथा सम्पूर्ण भावपदार्थोंका रूप धारण करनेवाले हैं, समस्त प्राणियोंपर कृपा करनेके लिये उस तीर्थमें विशेष रूपसे रहते हैं। उनके साथ सम्पूर्ण देवता भी निवास करते हैं। भगवान् शिव सबपर अनुग्रह करनेवाले हैं। वे आङ्गिरस धर्मव्यास और वेदव्यासके नामसे प्रसिद्ध होंगे। उनका तीर्थ भी व्यासतीर्थके नामसे ही तीनों लोकोंमें विख्यात है। व्यासतीर्थ बहुत ही उत्तम है। उसका जल पापरूपी कीचड़को धोनेवाला, मोहरूप अन्धकार और मदका नाश करनेवाला तथा मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला है।


कुशतर्पण एवं प्रणीता-संगम-तीर्थकी महिमा

**ब्रह्माजी कहते हैं—**नारद! कुशतर्पण एवं प्रणीता-संगम नामक तीर्थ सब लोकोंमें प्रसिद्ध हैं। वे भोग और मोक्ष देनेवाले हैं। मैं उनके पापहारी स्वरूपका वर्णन करता हूँ, सुनो। विन्ध्यपर्वतके दक्षिणभागमें सह्य नामक महान् पर्वत है। उसीके शाखा-पर्वतोंसे गोदावरी और भीमरथी आदि नदियाँ निकली हैं। वहीं विरजतीर्थ और एकवीरा नदी भी है। उस पर्वतकी महिमाका कोई वर्णन नहीं कर सकता। उसी सह्याद्रिके पावन प्रदेशमें जो वृत्तान्त घटित हुआ था, वह गोपनीयसे भी गोपनीय है; साक्षात् वेदमें उसका वर्णन है। उसे देवता, मुनि, पितर और असुर भी नहीं जानते। वही गुह्य रहस्य आज मैं तुम्हारी प्रसन्नताके लिये प्रकट करता हूँ, वह श्रवणमात्रसे सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है।

जो अव्यक्त एवं अक्षर परमात्मा है, उसे परम पुरुष जानना चाहिये। वही जब प्रकृतिसे संयुक्त होता है, तब क्षर एवं अपर कहलाता है। पुरुष पहले निराकारसे साकाररूपमें प्रकट हुआ। फिर उससे जलकी उत्पत्ति हुई। जलसे पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ। फिर जल और पुरुषसे कमल प्रकट हुआ। उस कमलसे मेरी उत्पत्ति हुई। मुने! पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये पाँच तत्त्व मुझसे पहले एक ही समयमें प्रकट हुए थे। मैंने उत्पन्न होनेपर सबसे पहले इन्हींको देखा और कोई स्थावर-जङ्गम भूत मेरे देखनेमें नहीं आये। उस समय वेद नहीं प्रकट हुए थे। दूसरी कोई वस्तु ही मैंने नहीं देखी। अधिक क्या कहूँ—जिनसे स्वयं मेरी उत्पत्ति हुई, उनको भी मैं न देख सका। उस समय मैं मौन बैठा था। इतनेमें ही

२४८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

उत्तम आकाशवाणी सुनायी दी—'ब्रह्मन्! तुम स्थावर और जङ्गम जगत्‌की सृष्टि करो।' नारद! यह आकाशवाणी सुनकर मैंने कहा—'कैसे सृष्टि करूँगा, कहाँ सृष्टि करूँगा और किस साधनसे इस जगत्‌की सृष्टि करूँगा?' आकाशवाणीने पुनः उत्तर दिया—'ब्रह्मन्! यज्ञ करो, इससे तुम्हें शक्ति प्राप्त होगी। यज्ञ ही विष्णु है—यह सनातन श्रुतिका कथन है। यज्ञ करनेवालोंके लिये इस लोक और परलोकमें कौन-सी वस्तु असाध्य है।' मैंने फिर पूछा—'कहाँ और किस वस्तुसे यज्ञ करूँ?' पुनः आकाशवाणी सुन पड़ी—'कर्मभूमिमें यज्ञेश्वर यज्ञपुरुषका यजन करो। स्वयं पुरुष ही तुम्हारे यज्ञके साधन होंगे। तुम उन्हींसे उनका यजन करो। यज्ञ, स्वाहा, स्वधा, मन्त्र, ब्राह्मण और हविष्य आदि सब कुछ श्रीहरि ही हैं। उन्हींसे सबकी प्राप्ति होती है।'

नारद! उस समय भागीरथी, नर्मदा, यमुना, तापी, सरस्वती, गौतमी, समुद्र, नद, सरोवर तथा अन्यान्य निर्मल सरिताएँ नहीं थीं। अतः मैंने पूछा—'कर्मभूमि कहाँ है?' आकाशवाणीसे उत्तर मिला—'मेरुगिरिके दक्षिण हिमालय, विन्ध्य और सह्यसे भी दक्षिण जो प्रदेश हैं, उन्हें कर्मभूमि कहते हैं। वह सबके लिये सर्वदा कल्याणका उदय करनेवाली है।' यह सुनकर मैंने मेरुगिरिको त्याग दिया और सह्यगिरिके समीप आकर सोचने लगा—'कहाँ ठहरूँ?' इतनेमें ही फिर आकाशवाणी हुई—'इधर आओ। यहीं रहो और बैठकर यज्ञका संकल्प करो। संकल्प करनेके बाद सम्पूर्ण वेद प्रकट होंगे। फिर वे जो कुछ भी कहें, वही करो।'

तदनन्तर इतिहास, पुराण तथा अन्य जो भी वाङ्मय शास्त्र है, वह मेरे मुखमें स्वतः आ गया और मुझे उसका स्मरण होने लगा। तत्काल ही सम्पूर्ण वेदार्थ भी मुझे ज्ञात हो गया। तब मैंने लोकविख्यात पुरुषसूक्तका स्मरण किया। वेदमें जो यज्ञकी सामग्री बतायी गयी थी, उसके अनुसार ही मैंने उसकी कल्पना की। वेदोक्त प्रकारसे ही यज्ञपात्र भी कल्पित हुए। मैंने जहाँ पवित्रता और संयमपूर्वक बैठकर यज्ञकी दीक्षा ग्रहण की, वह मेरे यज्ञका स्थान मेरे ही नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह ब्रह्मगिरि कहलाने लगा। ब्रह्मगिरिसे पूर्वकी ओर चौरासी हजार योजनतक मेरे यज्ञका स्थान है। उस भूमिके मध्यभागमें वेदी थी तथा दक्षिणभागमें गार्हपत्य-अग्निकी स्थापना हुई। इसी प्रकार एक ओर आहवनीय अग्निकी प्रतिष्ठा की गयी। श्रुतिमें यह कहा है कि बिना पत्नीके यज्ञ सिद्ध नहीं होता, इसलिये मैंने शरीरके दो भाग किये। पूर्वार्द्धसे मेरी पत्नी प्रकट हुई, जो यज्ञसिद्धिके लिये सहधर्मिणी बनी। उत्तरार्द्धसे मैं स्वयं पुरुषरूपमें स्थित हुआ। श्रुति भी कहती है 'अर्द्धो जाया'—पत्नी आधा अङ्ग है। नारद! मैंने वसन्त-ऋतुको उत्तम घृत बनाया। ग्रीष्मसे ईंधनका काम लिया। शरद्-ऋतुको हविष्य बनाया। वर्षाको कुशके स्थानमें रखा। सात छन्द सात परिधि हुए। कला, काष्ठा और निमेष—ये क्रमशः समिधा, पात्र और कुश माने गये। जो अनादि और अनन्त काल है, वही यूपके रूपमें कल्पित हुआ। इसके बाद पशु बाँधनेके लिये रस्सीकी आवश्यकता हुई। सत्त्व आदि तीनों गुण ही रस्सीकी जगह काम आये, किंतु उसमें बाँधनेके लिये पशुका अभाव था। तब मैंने आकाशवाणीसे कहा—'बिना पशुके यह यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता।' उत्तर मिला—'पुरुषसूक्तसे परमपुरुषकी स्तुति करो।'

'बहुत अच्छा'—कहकर मैंने अपने जन्मदाता देवाधि जनार्दनका भक्तिपूर्वक पुरुषसूक्तके मन्त्रोंद्वारा