भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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पृष्ठ 245

* परुष्णीतीर्थ, नारसिंहतीर्थ, पैशाचनाशनतीर्थ, निम्नभेद-तीर्थ और शङ्खह्रदतीर्थकी महिमा * २४३

उठे। उसी समय उन्हें नग्न देखकर उर्वशी वहाँसे चली गयी। उसके जानेसे राजाको बड़ा दुःख हुआ। उनका अग्निहोत्र और भोजन छूट गया। वे न किसीकी बात सुनते थे और न किसीकी ओर देखते थे। मृतककी-सी अवस्थामें पड़े रहते थे। उस समय पुरोहितने युक्तियुक्त वचनोंद्वारा उन्हें समझाया—'राजन्! तुम तो बुद्धिमान् हो; क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि इन स्त्रियोंका हृदय भेड़ियोंकी तरह कठोर होता है। तुम शोक न करो। महाराज! इस संसारमें कौन ऐसा पुरुष है, जो कामिनियोंसे ठगा न गया हो। वञ्चना, क्रूरता, चञ्चलता और दुश्चरित्रता—ये जिन स्त्रियोंके स्वाभाविक दुर्गुण हैं, वे सुखदायिनी कैसे हो सकती हैं? कालने किसको नहीं मारा। याचक होनेपर किसको गौरव प्राप्त हुआ। धन-सम्पत्तिसे किसका मन भ्रान्त नहीं हुआ और युवती स्त्रियोंने किसको धोखा नहीं दिया।* राजन्! जिनका हृदय मदसे उन्मत्त रहता है, वे युवतियाँ स्वप्न और मायाके समान मिथ्या हैं। वे किसको सुख दे सकती हैं। यह जानकर तुम निश्चिन्त हो जाओ। महामते! भगवान् शंकर, विष्णु तथा गोदावरी नदीको छोड़कर तीनों लोकोंमें दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो दुःखियोंको शरण दे सके।'

पुरोहितका यह कथन सुनकर राजाने यत्नपूर्वक अपने दुःखको दूर किया। वे गोदावरीके मध्यभागमें (जहाँ रेत थी) रहकर भगवान् शिव, विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य, गङ्गा तथा अन्यान्य देवताओंकी आराधना करने लगे। जो विपत्तिमें पड़नेपर तीर्थों और देवताओंका सेवन नहीं करता, वह कालके वशमें पड़ा हुआ जीव किस दशाको प्राप्त होगा। राजा पुरूरवा एकमात्र भगवान्‌के शरण हो उत्सुकतापूर्वक गौतमीका सेवन करने लगे। संसारकी ओरसे उनका मन हट गया और भगवान्‌के भजनमें उनकी बड़ी श्रद्धा हो गयी। उन्होंने ऋत्विजोंको साथ लेकर बहुत दक्षिणावाले अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया। तबसे वह स्थान वेदद्वीप और यज्ञद्वीप कहलाने लगा। वहाँ सदा ही पूर्णिमाकी रातमें उर्वशी आया करती है। जो मनुष्य उस द्वीपकी प्रदक्षिणा करता है, उसके द्वारा समुद्रसहित पृथ्‍वीकी परिक्रमा हो जाती है। जो पुण्यात्मा वहाँ वेदों और यज्ञोंका स्मरण करता है, उसे वेदोंके स्वाध्याय और यज्ञोंके अनुष्ठानका फल मिलता है। उसको ऐलतीर्थ जानना चाहिये। वही पुरूरवस्-तीर्थ है। उसे ही वसिष्ठतीर्थ और निम्नभेदतीर्थ भी कहते हैं। राजा पुरूरवाके किसी भी कार्यमें कुछ भी निम्नता (न्यूनता) नहीं होती थी। एक ही कार्य उनसे निम्नश्रेणीका हुआ, यह कि वे सर्वथा उर्वशीमें आसक्त हो गये थे; परंतु गौतमी गङ्गा और महर्षि वसिष्ठने उनके इस निम्नत्वका भी भेदन कर दिया, इसलिये वह तीर्थ निम्नभेदके नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों प्रकारके अभीष्टकी सिद्धि देनेवाला है। जो निम्नभेदतीर्थमें स्नान करके इन देवताओंका दर्शन करता है, उसके इस लोक और परलोकमें कुछ भी निम्न नहीं होता। वह सब प्रकारसे उन्नतिको प्राप्त हो स्वर्गमें इन्द्रकी भाँति सुख भोगता है।

उसके आगे शङ्खह्रद नामक तीर्थ है। वहाँ शङ्ख और गदा धारण करनेवाले भगवान् निवास


* को नाम लोके राजेन्द्र कामिनीभिर्न वञ्चितः। वञ्चकत्वं नृशंसत्वं चञ्चलत्वं कुशीलता॥
इति स्वाभाविकं यासां ताः कथं सुखहेतवः। कालेन को न निहतः कोऽर्थी गौरवमागतः॥
श्रिया न भ्रामितः को वा योषिद्भिः को न खण्डितः।
(१५१।१३–१५)