संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 249, कुल 434 में से
संदर्भ में पढ़ें* कुशतर्पण एवं प्रणीता-संगम-तीर्थकी महिमा * २४७
उनके ऊपर समस्त देवता प्रसन्न हुए और बोले— 'विश्वयोनि ब्रह्माजीने युगके आदिमें जो स्रष्टाके पदकी कल्पना की थी, वह इसलिये कि अधर्मोंकी निवृत्ति हो, वेदोंकी स्थापना हो, सम्पूर्ण लोकोंका उपकार हो, धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धि हो तथा पुराण, स्मृति, वेद और धर्मशास्त्रोंके अर्थका ठीक-ठीक निश्चय हो। इसके अनुसार तुम सब लोगोंको जगत्-स्रष्टाका पद प्राप्त होगा। तुम सब उस पदके अनुरूप होओगे।' नारद! वे क्रमशः धीरे-धीरे प्रजापति होंगे। जब अधर्म बढ़ेगा, वेदोंका पराभव होगा और उनपर संकट आयेगा, उस समय वेदोंका उद्धार करनेके लिये वे भावी व्यास होंगे। गङ्गाका उत्तम तट ही उनकी तपस्याका उत्तम स्थान होगा और वहाँ शिव, विष्णु, मैं, सूर्य, अग्नि और जल—ये सब उपस्थित रहेंगे। इनसे बढ़कर पवित्र और इनसे श्रेष्ठ कहीं कुछ भी नहीं है। केवल परब्रह्म ही इन सबके आकारोंमें प्रकट हुआ है। सर्वस्वरूप शिव, जो व्यापक तथा सम्पूर्ण भावपदार्थोंका रूप धारण करनेवाले हैं, समस्त प्राणियोंपर कृपा करनेके लिये उस तीर्थमें विशेष रूपसे रहते हैं। उनके साथ सम्पूर्ण देवता भी निवास करते हैं। भगवान् शिव सबपर अनुग्रह करनेवाले हैं। वे आङ्गिरस धर्मव्यास और वेदव्यासके नामसे प्रसिद्ध होंगे। उनका तीर्थ भी व्यासतीर्थके नामसे ही तीनों लोकोंमें विख्यात है। व्यासतीर्थ बहुत ही उत्तम है। उसका जल पापरूपी कीचड़को धोनेवाला, मोहरूप अन्धकार और मदका नाश करनेवाला तथा मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाला है।
कुशतर्पण एवं प्रणीता-संगम-तीर्थकी महिमा
**ब्रह्माजी कहते हैं—**नारद! कुशतर्पण एवं प्रणीता-संगम नामक तीर्थ सब लोकोंमें प्रसिद्ध हैं। वे भोग और मोक्ष देनेवाले हैं। मैं उनके पापहारी स्वरूपका वर्णन करता हूँ, सुनो। विन्ध्यपर्वतके दक्षिणभागमें सह्य नामक महान् पर्वत है। उसीके शाखा-पर्वतोंसे गोदावरी और भीमरथी आदि नदियाँ निकली हैं। वहीं विरजतीर्थ और एकवीरा नदी भी है। उस पर्वतकी महिमाका कोई वर्णन नहीं कर सकता। उसी सह्याद्रिके पावन प्रदेशमें जो वृत्तान्त घटित हुआ था, वह गोपनीयसे भी गोपनीय है; साक्षात् वेदमें उसका वर्णन है। उसे देवता, मुनि, पितर और असुर भी नहीं जानते। वही गुह्य रहस्य आज मैं तुम्हारी प्रसन्नताके लिये प्रकट करता हूँ, वह श्रवणमात्रसे सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है।
जो अव्यक्त एवं अक्षर परमात्मा है, उसे परम पुरुष जानना चाहिये। वही जब प्रकृतिसे संयुक्त होता है, तब क्षर एवं अपर कहलाता है। पुरुष पहले निराकारसे साकाररूपमें प्रकट हुआ। फिर उससे जलकी उत्पत्ति हुई। जलसे पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ। फिर जल और पुरुषसे कमल प्रकट हुआ। उस कमलसे मेरी उत्पत्ति हुई। मुने! पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये पाँच तत्त्व मुझसे पहले एक ही समयमें प्रकट हुए थे। मैंने उत्पन्न होनेपर सबसे पहले इन्हींको देखा और कोई स्थावर-जङ्गम भूत मेरे देखनेमें नहीं आये। उस समय वेद नहीं प्रकट हुए थे। दूसरी कोई वस्तु ही मैंने नहीं देखी। अधिक क्या कहूँ—जिनसे स्वयं मेरी उत्पत्ति हुई, उनको भी मैं न देख सका। उस समय मैं मौन बैठा था। इतनेमें ही