संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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प्रवृत्त हुए हैं, उन्हें किसी प्रकार सिद्धि नहीं प्राप्त होगी।' आङ्गिरसोंने अनेकों देशोंमें जाकर तपस्या की, किंतु उन्हें कहीं भी सिद्धि न मिली। वे सब इधर-उधर दौड़ते रहे, परंतु सभी स्थानोंमें कोई-न-कोई विघ्न आ जाता था। कहीं राक्षसोंसे, कहीं मनुष्योंसे, कहीं युवती स्त्रियोंसे और कहीं अपने शरीरके ही दोषसे तपस्यामें विघ्न पड़ जाता था। इस प्रकार भटकते हुए सब आङ्गिरस तपस्वियोंमें श्रेष्ठ अगस्त्यजीके पास गये और उन्हें नमस्कार करके विनीत भावसे बोले—'भगवन्! हम अनेक उपायोंसे बारंबार प्रयत्न करते हैं तो भी किस दोषसे हमारी तपस्या सिद्ध नहीं होती? आप तपस्यामें सबसे बढ़े-चढ़े हैं; अतः कोई उपाय हो तो बतायें। ब्रह्मन्! आप ज्ञानियोंमें भी ज्ञानी, वक्ताओंमें भी श्रेष्ठ वक्ता, संयमी पुरुषोंमें भी सबसे अधिक शान्त, दयावान्, प्रियकारी, क्रोधशून्य तथा द्वेषसे रहित हैं। अतः हमने जो पूछा है, उसे बताइये। जो अहंकारी, दयाहीन, गुरु-सेवारहित, असत्यवादी और क्रूर हैं, वे तत्त्वको नहीं जानते।'*
अगस्त्यने थोड़ी देरतक ध्यान किया, उसके बाद उन सब लोगोंसे धीरे-धीरे कहा—'आपलोग शान्तचित्त महात्मा हैं। ब्रह्माजीने आपको प्रजापति बनाया है। अबतक आपलोगोंकी तपस्या पूर्ण नहीं हुई—इसमें कोई-न-कोई कारण अवश्य है। आपलोग उस कारणका स्मरण करें। ब्रह्माजीने पहले जिन मानस पुत्रोंको उत्पन्न किया था, वे चले गये और बहुत सुखी हुए; परंतु जो उनकी खोजमें गये, वे ही फिर आङ्गिरस हुए हैं। वे ही आपलोग हैं, जो समय पाकर इस रूपमें आये हैं। आप धीरे-धीरे प्रयत्न करते रहें तो प्रजापतिसे भी बढ़-चढ़कर हो जायँगे—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। यहाँसे तपस्या करनेके लिये आप त्रिभुवनपावनी गङ्गाके तटपर जायँ। संसारमें शिववल्लभा गङ्गाके सिवा दूसरा कोई सिद्धिका उपाय नहीं है। वहाँ पावन प्रदेशमें आश्रमके भीतर ज्ञानद गुरुकी पूजा करें। वे आपलोगोंके सब संशयोंका निवारण करेंगे।'
तब आङ्गिरसोंने महर्षि अगस्त्यसे पूछा—'ज्ञानद किसको कहते हैं? ब्रह्मा, विष्णु, महेश, आदित्य, चन्द्रमा, अग्नि और वरुण—इनमें कौन ज्ञानद है?'
अगस्त्यजीने फिर कहा—'ज्ञानदका स्वरूप बतलाता हूँ' सुनो। जो जल है, वही अग्नि है। जो अग्नि है, वही सूर्य कहलाता है। जो सूर्य है, वही विष्णु है और जो विष्णु है, वही सूर्य। जो ब्रह्मा हैं, वही रुद्र हैं। जो रुद्र हैं, वही सब कुछ हैं। इस प्रकार जिसको एककी सर्वरूपताका ज्ञान हो, उसीको ज्ञानद कहते हैं। देशिक, प्रेरक, व्याख्याकार, उपाध्याय और शरीरका जनक आदि बहुत-से गुरु हैं; किंतु उनमें जो ज्ञानदाता गुरु है, वह सबसे बड़ा है। यहाँ उस ज्ञानकी बात कही गयी है, जिससे भेद-बुद्धिका नाश हो। एकमात्र अद्वितीय शिव ही सब कुछ हैं। विद्वान् ब्राह्मण उन्हींका इन्द्र, मित्र और अग्नि आदि अनेक नामोंसे वर्णन करते हैं। अनेक नाम और अनेक रूपोंमें जो भगवान्के तत्त्वका वर्णन किया जाता है, वह अज्ञानीजनोंका उपकार करनेके लिये है।'
मुनिका यह वचन सुनकर वे गाथा-गान करते हुए वहाँसे चले गये। उनमेंसे पाँच तो उत्तर-गङ्गाके तटपर गये और पाँच दक्षिण-गङ्गाके। वहाँ महर्षि अगस्त्यके बताये हुए देवताओंकी विधिपूर्वक पूजा करने लगे। विशेषतः आसनोंपर बैठकर वे तत्त्वका विचार किया करते थे। इससे
* साहंकारा दयाहीना गुरुसेवाविवर्जिताः। असत्यवादिनः क्रूरा न ते तत्त्वं विजानते॥
(१५८। १५)