संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- किष्किन्धातीर्थ और व्यासतीर्थकी महिमा * २४५
डालती हैं। इनकी समानता करनेवाली दूसरी कौन नदी है, जिन्हें महर्षि गौतमने सबको शरण देनेवाले भगवान् शंकरकी आराधना करके जटासहित प्राप्त किया था। ये सम्पूर्ण अभिलषित फलोंकी जननी और अमङ्गलोंका नाश करनेवाली हैं। ये समस्त संसारको पवित्र करनेमें समर्थ हैं। समस्त सरिताओंकी जननी गङ्गाका आज प्रत्यक्ष दर्शन हुआ। मैं मन, वाणी और शरीरद्वारा सदा ही इन शरणागतवत्सला गङ्गाजीकी शरण लेता हूँ।'
भगवान् श्रीरामका यह वचन सुनकर समस्त वानरोंने गङ्गाजीमें डुबकी लगायी और सम्पूर्ण लौकिक उपहारों तथा अनेक प्रकारके पुष्पोंद्वारा उनकी विधिवत् पूजा की। महाराज श्रीरामचन्द्रजीने श्रीमहादेवजीका यथावत् पूजन करके सर्वभावोपयुक्त वाक्योंद्वारा स्तवन किया। सम्पूर्ण वानरोंने भी प्रसन्न होकर नृत्य और गान किया। भगवान् श्रीरामने अपनी प्रिया जानकी तथा प्रेमी वानरोंके साथ सुखपूर्वक वह रात व्यतीत की। सबेरे उठकर भगवान् अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक गोदावरी देवीकी स्तुति करने लगे। फिर अपने भृत्यगणोंका सम्मान करके वे वहाँ अनिर्वचनीय आनन्दका अनुभव करने लगे। उस निर्मल प्रभातमें सूर्योदय होनेपर विभीषणने दशरथनन्दन श्रीरामसे कहा—'भगवन्! हमलोग इस तीर्थमें रहनेसे अभी तृप्त नहीं हुए। अतः कुछ समय और निवास करें। मेरा विचार है, चार रात और यहाँ ठहरें। फिर सब लोग साथ ही अयोध्या चलेंगे।' विभीषणकी बातका वानरोंने भी अनुमोदन किया। फिर भगवान् शिवकी पूजा करते हुए चार रात और ठहरे। वहाँ महादेवजी सिद्धेश्वरके नामसे प्रसिद्ध थे और उन्हींके प्रभावसे रावण अत्यन्त प्रबल हो गया था। इस प्रकार सब लोग अपने द्वारा स्थापित किये हुए शिवलिङ्गकी पूजा करते हुए पाँच दिनोंतक वहाँ ठहरे रहे। श्रीरामने अपने सम्पूर्ण सहायकोंके साथ शुद्धातिशुद्ध हृदयसे सम्पूर्ण शिवलिङ्गोंको मस्तक झुकाया। किष्किन्धानिवासी सभी वानरोंद्वारा सेवित होनेके कारण वह स्थान किष्किन्धातीर्थ कहलाया। वहाँ स्नान करनेमात्रसे बड़े-बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं। भगवान्ने गौतमी गङ्गाको भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और कहा—'माता गौतमी! मुझपर प्रसन्न होओ।' इस तरह बारंबार कहकर वे विस्मित चित्तसे गोदावरीको देखते और उन्हें प्रणाम करते जाते थे। तबसे विद्वान् पुरुष उस पुण्यमय तीर्थको किष्किन्धातीर्थ कहने लगे। जो इस प्रसङ्गका पाठ, स्मरण अथवा भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, उसके पापको भी यह तीर्थ हर लेता है। फिर जो लोग वहाँ स्नान और दान करते हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है।
उसके बाद व्यासतीर्थ और प्राचेतसतीर्थ हैं। उनका माहात्म्य बतलाता हूँ, सुनो। मेरे दस मानस पुत्र हुए, जो जगत्की सृष्टि करनेवाले थे। वे पृथ्वीका अन्त कहाँ है—इस बातका पता लगानेके लिये चले गये। तब मैंने पुनः अन्य पुत्रोंको उत्पन्न किया, किंतु वे भी अपने भाइयोंकी खोज करनेके लिये चले गये। जो पहलेके गये थे, वे तो गये ही थे; ये भी लौटकर नहीं आये। उस समय परम बुद्धिमान् दिव्य आङ्गिरस नामक मुनि उत्पन्न हुए, जो वेद-वेदाङ्गोंके तत्त्वको जाननेवाले और सम्पूर्ण शास्त्रमें प्रवीण थे। वे अङ्गिराकी आज्ञासे पिताको नमस्कार करके तपस्याके लिये उद्यत हुए। गुरुजनोंमें गौरवकी दृष्टिसे माताका स्थान सबसे ऊँचा है तो भी मातासे बिना पूछे ही आङ्गिरसोंने तपस्या करनेका निश्चय कर लिया। इससे कुपित होकर माताने अपने पुत्रोंको शाप दिया—'जो पुत्र मेरी अवहेलना करके तपस्यामें