संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* परुष्णीतीर्थ, नारसिंहतीर्थ, पैशाचनाशनतीर्थ, निम्नभेद-तीर्थ और शङ्खह्रदतीर्थकी महिमा * २४१
आम्बर्य नामक दैत्य रहता था, जो देवताओंके लिये भी दुर्जय था। उसके पास बहुत बड़ी सेना थी। भगवान् नृसिंहका उस दैत्यके साथ अत्यन्त भयंकर एवं रोमाञ्चकारी युद्ध हुआ। श्रीहरिने गोदावरीके उत्तरतटपर अपने शत्रु का संहार कर डाला। वह स्थान तीनों लोकोंमें नारसिंहतीर्थके नामसे विख्यात हुआ। वहाँ किया हुआ स्नान-दान आदि पुण्यकार्य समस्त पापरूपी ग्रहोंका शमन, वृद्धावस्था और मृत्युका निवारण तथा सबकी रक्षा करनेवाला है। जैसे सम्पूर्ण देवताओंमें कोई भी भगवान् विष्णुके समान नहीं है, उसी प्रकार समस्त तीर्थोंमें नारसिंहतीर्थ अनुपम और सर्वोत्तम है। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य भगवान् नृसिंहका पूजन करे तो उसे स्वर्ग, मर्त्यलोक और पातालका भी कोई सुख दुर्लभ नहीं रहता। बिना श्रद्धा भी जिनका नाम लेनेपर समस्त पापोंका संहार हो जाता है, वे साक्षात् भगवान् नरसिंह ही जहाँ विराजमान हैं, उस तीर्थके सेवनसे प्राप्त होनेवाले फलका कौन वर्णन कर सकता है। जैसे नृसिंहजीसे बड़ा कहीं कोई देवता नहीं है, उसी प्रकार नृसिंहतीर्थके समान कहीं कोई तीर्थ नहीं है।
गङ्गाके उत्तर-तटपर पैशाचनाशनतीर्थ विख्यात है। नारद! वहाँ पूर्वकालमें एक ब्राह्मण पिशाच-योनिसे मुक्त हुआ था। सुयज्ञके पुत्र अजीगार्ति एक विख्यात ब्राह्मण थे। एक समय अकाल पड़नेपर कुटुम्ब-पालनके भारसे दुःखी एवं पीड़ित होकर उन्होंने अपने मझले पुत्र शुनःशेपको वधके लिये क्षत्रियके हाथ बेच दिया। उसके बदलेमें अजीगार्तिको बहुत धन मिला था। शुनःशेप ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ था। ऐसे पुत्रको भी अजीगार्तिने धनके लोभसे बेच डाला। आपत्तिमें पड़नेपर विद्वान् पुरुष भी कौन-सा पाप नहीं कर डालता। समय आनेपर अजीगार्तिकी मृत्यु हुई और वे नरकमें डाले गये। क्योंकि इस लोकमें पूर्वजन्मके किये हुए पापोंका भोगके बिना क्षय नहीं होता। अनेक पाप-योनियोंमें पड़नेके पश्चात् अजीगार्ति भयंकर आकारवाले पिशाच हुए। उन्हें निर्जल और निर्जन वनमें सूखे काठपर रहना पड़ता था। गर्मीमें जहाँ दावानल फैल जाता, वही यमराजके दूत उस प्रेतको डाल देते थे। कन्या, पुत्र, पृथ्वी, अश्व तथा गौओंका विक्रय करनेवाले मनुष्य महाप्रलय-कालतक नरकसे छुटकारा नहीं पाते*। अपने किये हुए पापोंके फलस्वरूप भयंकर यमदूतोंद्वारा नरकमें पकाये जानेपर वह प्रेत जोर-जोरसे रोने लगा।
* कन्यापुत्रमहीवाजिगवां विक्रयकारिणः। नरकान्न निवर्तन्ते यावदाभूतसंप्लवम् ॥
(१५०।९)