संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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तुम्हारे पतिका नित्य आश्रय हूँ, क्योंकि मैं ही उनका जनक हूँ। जो मैं हूँ, वही वे भी हैं। यह जानकर तुम्हें चिन्ता नहीं करनी चाहिये। एक बात और है—जलको तो तुम माता समझो और अग्निको श्वशुर। इस बातका अपनी बुद्धिसे भलीभाँति निश्चय करके तुम विषाद न करो।
आत्रेयीने कहा—भगवन्! आप जलको माता कहते हैं और मैं आपके पुत्रकी पत्नी हूँ। जननी होकर फिर पत्नी कैसे रह सकूँगी, जलका रूप धारण करनेसे यह विरोध सामने आता है।
अग्नि बोले—स्त्री पहले तो पत्नी होती है। फिर स्वामीका भरण-पोषण करनेसे भार्या बनती है। पुत्रका जन्म देनेपर उसे जाया कहते हैं। इसी प्रकार अपने गुणोंके कारण वह कलत्र कहलाती है। भद्रे! तुम भी यही रूप धारण करती हो। अतः मेरी आज्ञाका पालन करो। जो एक बार पत्नीके गर्भमें आकर पुत्ररूपसे उत्पन्न हो चुका, वह वास्तवमें उसका पुत्र ही है और वह स्त्री भी जननी ही है। अतः वैदिक तत्त्वके विद्वान् कहते हैं कि पुत्र उत्पन्न हो जानेपर नारी पत्नी नहीं रह जाती।
श्वशुरके मुखसे यह वचन सुनकर आत्रेयीने अग्निरूपमें आये हुए अपने पतिको जलसे आप्लावित कर दिया। फिर वे दोनों पति-पत्नी गङ्गाजीके जलसे जा मिले। उस समय दोनोंके स्वरूप शान्त थे। जैसे लक्ष्मीके साथ श्रीविष्णु, उमाके साथ शंकर तथा रोहिणीके साथ चन्द्रमा हैं, उसी प्रकार वे दोनों शोभा पाने लगे। पतिको आप्लावित करती हुई आत्रेयीने जलमय शरीर धारण किया था, अतः वह परुष्णी नदीके नामसे विख्यात हुई और गङ्गामें जा मिली। उसमें स्नान करनेसे सौ गोदानोंका पुण्य प्राप्त होता है। आङ्गिरस नामवाले पुत्रने गङ्गा और परुष्णीके संगमपर बहुत-से यज्ञ किये। वहाँ स्नान-दान आदिसे जो पुण्य होता है, उसका वर्णन नहीं हो सकता।
गङ्गाके उत्तर-तटपर नारसिंह नामक विख्यात तीर्थ है, जो सबकी रक्षा करनेवाला है। उसके प्रभावका वर्णन करता हूँ, सुनो। पूर्वकालमें हिरण्यकशिपु नामक दैत्य हुआ था, जो बलवानोंमें श्रेष्ठ था। तपस्या और पराक्रमकी दृष्टिसे भी वह बहुत बढ़ा हुआ था। देवता भी उसे परास्त नहीं कर पाते थे। उसका पुत्र भगवान्का भक्त हुआ। उसके साथ द्वेष करनेके कारण हिरण्यकशिपुका अन्तःकरण मलिन हो गया था। उस समय भगवान् अपनी विश्वरूपताका परिचय देते हुए सभामण्डपके खंभेसे नरसिंहरूपमें प्रकट हुए और उस दैत्यका वध करके उन्होंने उसकी सेनाको भी मार भगाया। क्रमशः युद्धमें समस्त दैत्योंका संहार करके रसातलके शत्रुओंपर विजय पायी। उसके बाद वे स्वर्गलोकमें गये। वहाँ रहनेवाले दैत्योंको परास्त करके वे पुनः पृथ्वीपर आये। यहाँ पर्वत, समुद्र, नदी, ग्राम और वनोंमें नाना रूप धारण करके जो दैत्य निवास करते थे, उन सबका भगवान् नृसिंहने संहार कर डाला। आकाश, वायु तथा ज्योतिर्मय लोकमें पहुँचे हुए दैत्योंको भी जीवित नहीं छोड़ा। उनके नख वज्रपातसे भी कठोर थे। गर्दन और मुखपर बड़े-बड़े बाल थे। उनकी गर्जना सुनकर दैत्यपत्नियोंके गर्भ गिर जाते थे। उन्होंने समस्त राक्षसोंको परास्त किया। भयंकर सिंहनाद, प्रलयाग्निके समान दृष्टि, थप्पड़ और शरीरके धक्केसे समस्त असुरोंको चूर्ण कर डाला।
इस प्रकार अनेक दैत्योंका संहार करके नरसिंहजी गौतमीके तटपर गये, जो उन्हींके चरणकमलोंसे निकली हुई और मन तथा नेत्रोंको आनन्द देनेवाली थी। वहाँ दण्डकारण्यका स्वामी