भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२६० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

चक्षुस्तीर्थका माहात्म्य

**ब्रह्माजी कहते हैं—**चक्षुस्तीर्थ रूप और सौभाग्य देनेवाला है। जहाँ भगवान् योगेश्वर गौतमीके दक्षिण-तटपर निवास करते हैं, वहाँ पर्वतके शिखरपर भौवन नगर विख्यात स्थान है। यहाँ क्षात्र-धर्मपरायण राजा भौवन निवास करते थे। उसी नगरमें वृद्धकौशिक नामके एक ब्राह्मण थे, जिनके वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ गौतम नामक पुत्र हुआ। गौतमकी एक वैश्यके साथ मित्रता हुई। वैश्यका नाम मणिकुण्डल था। इनमें एक दरिद्र और दूसरा धनी था तो भी दोनों एक-दूसरेके हितैषी थे। एक दिन गौतमने अपने धनी मित्र मणिकुण्डलसे एकान्तमें प्रेमपूर्वक कहा—‘मित्र! हमलोग धनका उपार्जन करनेके लिये पर्वतों और समुद्रोंकी यात्रा करें। यदि अनुकूल सुख न प्राप्त हुआ तो समझना चाहिये जवानी व्यर्थ गयी। धनके बिना सौख्य कैसे प्राप्त हो सकता है। अहो! निर्धन मनुष्यको धिक्कार है।’ कुण्डलने ब्राह्मणसे कहा—‘मेरे पिताने बहुत धन कमाया है। अब अधिक धन लेकर क्या करूँगा।’ तब ब्राह्मणने पुनः मणिकुण्डलसे कहा—‘जो धर्म, अर्थ, ज्ञान और भोगोंसे तृप्त हो जाय, ऐसा कौन पुरुष प्रशंसनीय माना जाता है। सखे! इन सबकी अधिकाधिक वृद्धि ही समस्त शरीरधारियोंको अभीष्ट होती है। जो प्राणी अपने ही व्यवसायसे जीवन-निर्वाह करते हैं, वे धन्य हैं। जो दूसरेके दिये हुए धनसे संतोष-लाभ करते हैं, वे कष्टसे ही जीते हैं। जो पुत्र अपने बाहुबलका आश्रय लेकर धनका उपार्जन करता है और पिताके धनको हाथसे नहीं छूता, वह संसारमें कृतार्थ होता है।’

धनाभिलाषी ब्राह्मणका यह कथन सुनकर वैश्यने उसे सत्य माना और घरसे रत्न लाकर गौतमको देते हुए कहा—‘मित्र! इस धनसे हमलोग सुखपूर्वक देश-देशान्तरोंमें भ्रमण करेंगे और धन कमाकर फिर अपने घरको लौट आयेंगे।’ वैश्य तो अपनी सद्भावनाके अनुसार सत्य ही कहता था, किंतु ब्राह्मण उसे धोखा दे रहा था। उसके मनमें पाप था। किंतु वैश्य उसे ऐसा नहीं समझता था। दोनोंने आपसमें सलाह की और माता-पिताको सूचना दिये बिना ही धन कमानेके लिये देश-देशान्तरमें चल दिये। ब्राह्मण सोचने लगा—‘जिस किसी उपायसे हो सके, वैश्यका धन ले लूँ। अहो, पृथ्वीपर सहस्रों सुन्दर नगर हैं, जहाँ कामकी अधिष्ठात्री देवी-जैसी अभीष्ट भोग प्रदान करनेवाली युवतियाँ हैं। यदि यत्नपूर्वक धन लाकर उनको दिया जाय तो वे सदा भोगी जा सकती हैं और वही जीवन सफल है। किस प्रकार वैश्यसे अपने हाथमें आये हुए धनको हड़पकर उसका इच्छानुसार उपभोग करूँ?’ यह सोचते हुए गौतमने मणिकुण्डलसे हँसते-हँसते कहा—‘पापसे ही जीवोंकी उन्नति होती है और वे मनोवाञ्छित सुख प्राप्त करते हैं। संसारमें धर्मात्मा लोग दुःखके ही भागी देखे जाते हैं। अतः एक मात्र दुःख ही जिसका फल है, उस धर्मसे क्या लाभ।’

**वैश्यने कहा—**ऐसी बात नहीं है। धर्ममें ही सुखकी स्थिति है। पापमें तो केवल दुःख, भय, शोक, दरिद्रता और क्लेश ही रहते हैं। जहाँ धर्म है, वहीं मुक्ति है। भला, अपना धर्म क्या नष्ट हो सकता है?* इस प्रकार विवाद करते हुए दोनोंमें यह शर्त लग गयी कि जिसका पक्ष श्रेष्ठ हो, वह


* नेत्युवाच ततो वैश्यः सुखं धर्मे प्रतिष्ठितम्।
पापे दुःखं भयं शोको दारिद्र्यं क्लेश एव च। यतो धर्मस्ततो मुक्तिः स्वधर्मः किं विनश्यति॥
(१७०। २६)

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