संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- चक्षुस्तीर्थका माहात्म्य * २६१
दूसरेका धन ले ले। वे बोले—'अब चलकर हम दोनों किसीसे पूछें—धर्मात्मा प्रबल होता है या अधर्मी? वेदसे लोकका ही मत श्रेष्ठ है, क्योंकि लोकमें ही धर्मसे सुख होता है।' इस प्रकार विवाद करके दोनों सब लोगोंसे पूछने लगे कि 'पृथ्वीपर धर्म प्रबल है या अधर्म?' यह प्रश्न सामने आनेपर कोई बोले—'जो धर्मके अनुसार चलते हैं, उन्हें दुःख भोगना पड़ता है और बड़े-बड़े पापी मनुष्य सुखी हैं।' यह निर्णय सुनकर वैश्यने अपना सारा धन ब्राह्मणको दे दिया। मणिमान् धर्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ था। वह बाजी हार जानेपर भी धर्मकी ही प्रशंसा करता रहा। ब्राह्मणने मणिमान्से पूछा—'क्या तुम अब भी धर्मकी प्रशंसा करते हो?' वैश्य बोला—'हाँ।' ब्राह्मण फिर कहने लगा—'वैश्य! मैंने तुम्हारा सारा धन जीत लिया, फिर भी निर्लज्जकी तरह धर्मकी बात क्यों करते हो? देखो, स्वेच्छाचारी होनेपर भी मैंने ही धर्मको जीता है।'
ब्राह्मणकी बात सुनकर वैश्यने मुसकराते हुए कहा—'सखे! जैसे धान्योंमें पुलाक (पैया) और पंखधारी चिड़ियोंमें छोटी मक्खियाँ होती हैं, वैसे ही मैं उन मनुष्योंको भी सारहीन मानता हूँ, जिनमें धर्म नहीं होता। चारों पुरुषार्थोंमें पहले धर्मका नाम आता है। अर्थ और काम उसके बाद आते हैं। वह धर्म मुझमें मौजूद है। फिर तुम कैसे कहते हो कि मैंने जीत लिया।' यह सुनकर ब्राह्मणने पुनः वैश्यसे कहा—'अब दोनों हाथोंकी बाजी लगायी जाय।' वैश्य बोला—'ठीक है।' फिर दोनोंने जाकर पहलेकी ही भाँति लौकिक मनुष्योंसे पूछा, निर्णय ज्यों-का-त्यों रहा। ब्राह्मण बोला—'फिर मेरी विजय हुई।' यों कहकर उसने वैश्यके दोनों हाथ काट डाले और पूछा—'अब धर्मको कैसा मानते हो?' ब्राह्मणके इस प्रकार आक्षेप करनेपर वैश्यने कहा—'मेरे प्राण कण्ठतक आ जायँ तो भी मैं धर्मको ही श्रेष्ठ मानता रहूँगा। धर्म ही देहधारियोंकी माता, पिता, सुहृद् और बन्धु है।' इस तरह दोनोंका विवाद चलता रहा। ब्राह्मण धनवान् हो गया और वैश्य धनके साथ-साथ दोनों बाँहोंसे भी हाथ धो बैठा। इस तरह भ्रमण करते हुए दोनों गौतमी गङ्गाके तटपर आ पहुँचे। जहाँ योगेश्वर श्रीहरिका निवासस्थान है, वहाँ आनेपर फिर दोनोंमें विवाद आरम्भ हो गया। वैश्य गङ्गा, योगेश्वर और धर्मकी ही प्रशंसा करता था। इससे ब्राह्मणको बड़ा क्रोध हुआ। वह वैश्यपर आक्षेप करते हुए बोला—'धन चला गया। दोनों हाथ कट गये। अब केवल तुम्हारे प्राण बाकी हैं। यदि फिर मेरे मतके विपरीत कोई बात मुँहसे निकालोगे तो मैं तलवारसे तुम्हारा सिर काट लूँगा।' वैश्य हँस पड़ा। उसने पुनः गौतमको चुनौती देते हुए कहा—'मैं तो धर्मको ही बड़ा मानता हूँ; तुम्हारी जैसी इच्छा हो, कर लो। जो ब्राह्मण, गुरु, देवता, वेद, धर्म और भगवान् विष्णुकी निन्दा करता है, वह पापाचारी मनुष्य पापरूप है। वह स्पर्श करने योग्य नहीं है। धर्मको दूषित करनेवाले उस दुराचारी पापात्माका परित्याग कर देना चाहिये।'* तब ब्राह्मणने कुपित होकर कहा—'यदि तुम धर्मकी प्रशंसा करते हो तो हम दोनोंके प्राणोंकी बाजी लग जाय।' वैश्यने कहा—'ठीक है।' फिर दोनोंने साधारण लोगोंसे पूछा, किंतु लोगोंने पहले-ही-जैसा उत्तर दिया।
* धर्ममेव परं मन्ये यथेच्छसि तथा कुरु। ब्राह्मणांश्च गुरून् देवान् वेदान् धर्मं जनार्दनम्॥
यस्तु निन्दयते पापो नासौ स्पृश्योऽथ पापकृत्। उपेक्षणीयो दुर्वृत्तः पापात्मा धर्मदूषकः॥
(१७०।४५-४६)