संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* राजा सगरका चरित्र तथा इक्ष्वाकुवंशके मुख्य-मुख्य राजाओंका परिचय * २५
दिये। बाहुकी पत्नी यादवी गर्भवती थीं। वे भी राजाका सहगमन करनेको प्रस्तुत हो गयीं। उन्हें उनकी सौतने पहलेसे ही जहर दे रखा था। उन्होंने वनमें चिता बनायी और उसपर आरूढ़ हो पतिके साथ भस्म हो जानेका विचार किया। भृगुवंशी और्वमुनिको उनकी दशापर बड़ी दया आयी। उन्होंने रानीको चितामें जलनेसे रोक दिया। उन्हींके आश्रममें वह गर्भ जहरके साथ ही प्रकट हुआ। वही महाराज सगर हुए। और्वने बालकके जातकर्म आदि संस्कार किये, वेद-शास्त्र पढ़ाये तथा आग्नेय अस्त्र भी प्रदान किया, जो देवताओंके लिये भी दुःसह है। उसीसे सगरने हैहयवंशी क्षत्रियोंका विनाश किया और लोकमें बड़ी भारी कीर्ति पायी। तदनन्तर उन्होंने शक, यवन, काम्बोज, पारद तथा पह्लवगणोंका सर्वनाश करनेके लिये उद्योग किया। वीरवर महात्मा सगरकी मार पड़नेपर वे सभी महर्षि वसिष्ठकी शरणमें गये और उनके चरणोंपर गिर पड़े। तब महातेजस्वी वसिष्ठने कुछ शर्तके साथ उन्हें अभय-दान दिया और राजा सगरको रोका। सगरने अपनी प्रतिज्ञा तथा गुरुके वचनका विचार करके केवल उनके धर्मका निराकरण किया और उनके वेष बदल दिये। शकोंके आधे मस्तकको मूूँड़कर विदा कर दिया। यवनों और काम्बोजोंका सारा सिर मुँड़ा दिया। पारदोंके सारे केश उड़ा दिये।
धर्मविजयी राजा सगरने इस पृथ्वीको जीतकर अश्वमेध-यज्ञकी दीक्षा ली और अश्वको देशमें विचरनेके लिये छोड़ा। वह अश्व जब पूर्व-दक्षिण समुद्रके तटपर विचर रहा था, उस समय किसीने उसको चुरा लिया और पृथ्वीके भीतर छिपा दिया। राजाने अपने पुत्रोंसे उस प्रदेशको खुदवाया। महासागरकी खुदाई होते समय उन्होंने वहाँ आदिपुरुष भगवान् विष्णुको जो हरि, कृष्ण और प्रजापति नामसे भी प्रसिद्ध हैं, महर्षि कपिलके रूपमें शयन करते देखा। जागनेपर उनके नेत्रोंके तेजसे वे सभी जलकर भस्म हो गये। केवल चार ही बचे, जिनके नाम हैं—बर्हिकेतु, सुकेतु, धर्मरथ