संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* कण्डुमुनिका चरित्र और मुनिपर भगवान् पुरुषोत्तमकी कृपा * २७५
देखकर प्रम्लोचाको बड़ा आश्चर्य हुआ। 'अहो, इनकी तपःशक्ति अद्भुत है!' यों कहकर वह बहुत प्रसन्न हुई। कण्डुमुनि स्नान, संध्या, जप, होम, स्वाध्याय, देवपूजन, व्रत, उपवास, नियम और ध्यान—सब छोड़कर रात-दिन उसीके साथ विहार करने लगे। इसीमें वे आनन्द मानते थे। उनका हृदय कामदेवके वशीभूत हो गया था। अतः वे अपनी तपस्याकी हानि नहीं समझ पाते थे। इस प्रकार कण्डुमुनि उसके साथ सांसारिक विषयभोगमें आसक्त हो सौसे कुछ अधिक वर्षोंतक मन्दराचलकी गुफामें पड़े रहे। एक दिन प्रम्लोचाने महाभाग कण्डुमुनिसे कहा—'ब्रह्मन्! अब मैं स्वर्गमें जाना चाहती हूँ। आप प्रसन्न होकर मुझे जानेकी आज्ञा दें।' मुनिका मन तो उसीमें आसक्त हो रहा था। उसके इस प्रकार पूछनेपर वे बोले—'कल्याणी! कुछ दिन और ठहरो।' तब उसने पुनः सौ वर्षोंसे कुछ अधिक कालतक उन कण्डुमुनिके साथ विषय भोगा। तदनन्तर उसने पुनः जानेकी आज्ञा माँगी, किंतु मुनिने स्वीकार नहीं किया। अतः उसे लगभग दो सौ वर्षोंतक और ठहरना पड़ा। वह जब-जब उनसे देवलोकमें जानेकी आज्ञा माँगती, तब-तब वे उसे यही उत्तर देते—कुछ दिन और ठहरो। प्रम्लोचा एक तो मुनिके शापसे डरती थी। दूसरे उसमें दक्षिणा नायिकाकी स्वाभाविक उदारता थी और तीसरे वह प्रणयभङ्गकी पीड़ाको जानती थी। इसलिये मुनिको छोड़ न सकी। महर्षि कामभोगमें आसक्त हो दिन-रात उसके साथ रमण करते रहे। किंतु तृप्ति न हुई। उसके प्रति नित्य नूतन प्रेम बढ़ता गया।
एक दिन कण्डुमुनि बड़ी उतावलीके साथ आश्रमसे बाहर जाने लगे। अप्सराने पूछा—'कहाँ चले?' मुनिने उत्तर दिया—'शुभे! दिन बीत चला है। संध्योपासन कर लूँ, नहीं तो कर्मका लोप हो जायगा।' प्रम्लोचाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने हँसकर पूछा—'सब धर्मोंके ज्ञाता महात्माजी! क्या आज ही आपका दिन बीता है? आपकी यह बात सुनकर किसको आश्चर्य न होगा।'
मुनि बोले—कल्याणी! अभी प्रातःकाल ही तो तुम इस नदीके सुन्दर तटपर आयी हो। उसी समय मैंने तुम्हें देखा, परिचय पूछा और तुम मेरे साथ आश्रममें आयी। अब वह दिन बीता है और यह संध्याका समय उपस्थित हुआ है। फिर यह परिहास किसलिये? सच्ची बात बताओ।
प्रम्लोचाने कहा—ब्रह्मन् ! यह ठीक है कि मैं प्रातःकालमें ही आयी थी; इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है। किंतु आज तबसे सैकड़ों वर्ष बीत गये।
यह सुनकर मुनिको बड़ा भय हुआ। उन्होंने विशाल नेत्रोंवाली अप्सरासे पूछा—'भीरु! बताओ