संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
तो सही, तुम्हारे साथ निरन्तर रमण करते हुए अबतक मेरा कितना समय बीता है?'
**प्रम्लोचा बोली—**मुने! मेरे साथ आपके नौ सौ सात वर्ष, छः महीने और तीन दिन बीते हैं।
**ऋषिने कहा—**शुभे! क्या यह सत्य कहती हो अथवा परिहासकी बात है? मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि तुम्हारे साथ एक ही दिन रहा हूँ।
**प्रम्लोचा बोली—**ब्रह्मन्! आपके समीप मैं झूठ कैसे बोलूँगी। विशेषतः ऐसे अवसरपर, जब कि आप धर्म-मार्गका अनुसरण करते हुए पूछ रहे हैं।
अप्सराकी बात सुनकर मुनिको बड़ा कष्ट हुआ। वे स्वयं ही अपनी निन्दा करते हुए बोले—'हाय, मुझ दुराचारीको धिक्कार है। हाय, मेरी तपस्या नष्ट हो गयी। ब्रह्मवेत्ताओंका जो धन है, वह चला गया और मेरा विवेक भी छिन गया। जान पड़ता है, मनुष्योंको मोहमें डालनेके लिये ही किसीने युवती नारीकी सृष्टि की है। मुझे तो अपने मनको जीतकर क्षुधा-पिपासा, राग-द्वेष और जरा-मृत्यु—इन छहों ऊर्मियोंसे अतीत परब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। इसके विपरीत जिसने मेरी ऐसी दुर्गति की है, उस कामरूपी महान् ग्रहको धिक्कार है। यह काम नरकग्राममें ले जानेवाला मार्ग है। इसने आज मेरे सम्पूर्ण वेदोंके स्वाध्याय, व्रत और समस्त साधनोंपर पानी फेर दिया।'
इस प्रकार स्वयं ही अपनी निन्दा करके वे धर्मके ज्ञाता मुनि पास ही बैठी हुई उस अप्सरासे बोले—'पापिनी! तेरी जहाँ इच्छा हो, चली जा। तुझे जो करना था, उसे तूने पूरा कर लिया। मैं तुझे अपने क्रोधकी प्रचण्ड आगसे जो भस्म नहीं करता, इसमें एक कारण है—सत्पुरुषोंकी मैत्री सात पग एक साथ चलनेसे ही हो जाती है। मैं तो तेरे साथ चिरकालतक निवास कर चुका हूँ। अथवा तेरा क्या दोष है? तेरी क्या हानि करूँ? सारा दोष तो मेरा ही है, क्योंकि मैं ही ऐसा अजितेन्द्रिय निकला! तू तो इन्द्रका प्रिय करनेके लिये आयी थी और मेरी तपस्याका सत्यानाश कर चुकी। अपने कटाक्षके महामोहमय मन्त्रसे तूने मुझे घृणित बना दिया। अरी, अब जा! जा! चली जा!!'
इस प्रकार मुनिवर कण्डुने जब क्रोधपूर्वक उसे फटकारा, तब वह काँपती हुई आश्रमसे बाहर निकली और आकाशमार्गसे जाने लगी। उसके अङ्ग-अङ्गसे पसीनेकी बूँदें निकल रही थीं और वह वृक्षोंके पल्लवोंसे उन्हें पोंछती जाती थी। ऋषिने उसके उदरमें जो गर्भ स्थापित किया था, वह पसीनेके रूपमें ही बाहर निकल गया। वृक्षोंने उन स्वेद-बिन्दुओंको ग्रहण किया और वायुने इन सबको एकत्रित करके एक गर्भका रूप दिया। फिर चन्द्रमाने अपनी अमृतमयी किरणोंसे उस गर्भको धीरे-धीरे पुष्ट किया। उससे मारिषा नामकी कन्या उत्पन्न हुई, जो वृक्षोंकी पुत्री कहलायी। उसके नेत्र बड़े मनोहर थे। वही प्राचेतसोंकी पत्नी और दक्षकी जननी हुई।
इधर महर्षि कण्डु तपस्या क्षीण होनेपर श्रीविष्णुके निवास-स्थान पुरुषोत्तमक्षेत्रको गये। वहाँ सम्पूर्ण देवताओंसे सुशोभित श्रीहरिका दर्शन किया। ब्राह्मण आदि चारों वर्णों और आश्रमोंके लोग भगवान्की सेवामें उपस्थित थे। पुरुषोत्तमक्षेत्र और भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करके मुनिने अपनेको कृतकृत्य माना और वहाँ अपनी दोनों बाँहें ऊपर उठाकर एकाग्रचित्तसे ब्रह्मपारस्तोत्रका जप करते हुए वे भगवान्की आराधना करने लगे।